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भारतीय राजनीति

राजनीति का अपराधीकरण

  • 04 Nov 2022
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, राजनीति का अपराधीकरण।

मेन्स के लिये:

राजनीति के अपराधीकरण के कारण, प्रभाव और समाधान।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में उत्तर प्रदेश के दो विधायकों को आपराधिक आरोपों में दोषी ठहराया गया था, लेकिन उनमें से केवल एक को अयोग्य घोषित किया गया है और उसकी सीट को राज्य के विधानसभा सचिवालय द्वारा रिक्त घोषित किया गया है।

राजनीति का अपराधीकरण:

  • परिचय:
    • इसका अर्थ राजनीति में अपराधियों की भागीदारी से है, जिसमें अपराधी चुनाव लड़ सकते हैं और संसद तथा राज्य विधायिका के सदस्य के रूप में चुने जा सकते हैं।
    • यह मुख्य रूप से राजनेताओं और अपराधियों के बीच साँठगाँठ के कारण होता है।

आपराधिक छवि के उम्मीदवारों की अयोग्यता के कानूनी पहलू:

  • भारतीय संविधान में संसद या विधानमंडल का चुनाव लड़ने वाले किसी आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्ति की अयोग्यता के विषय में उपबंध नहीं किया गया है।
  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में विधानमंडल का चुनाव लड़ने के लिये किसी व्यक्ति को अयोग्य घोषित करने के मानदंडों का उल्लेख है।
    • इस अधिनियम की धारा 8 (अर्थात कुछ अपराधों के लिये दोषसिद्धि के संबंध में अयोग्यता) के तहत दो साल से अधिक की जेल की सज़ा पाने वाला व्यक्ति जेल की अवधि समाप्त होने के बाद छह साल तक चुनाव नहीं लड़ सकता है।
  • अयोग्यता के खिलाफ संरक्षण:
    • RPA की धारा 8(4) के तहत वर्ष 2013 तक विधानमंडल सदस्य तत्काल अयोग्यता से बच सकते थे।
      • इस प्रावधान के अनुसार, संसद या राज्य विधानमंडल के सदस्य तीन महीने के लिये अयोग्य नहीं होंगे।
      • यदि इस अवधि के दौरान दोषी विधानमंडल सदस्य अपील या पुनरीक्षण आवेदन करता है, तो अपील के निपटारे तक यह प्रभावी नहीं होगा।
    • वर्ष 2013 में ‘लिली थॉमस बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 8(4) को असंवैधानिक ठहरा कर इसे निरस्त कर दिया था।
    • आरपीए की धारा 8(4) के तहत विधायक वर्ष 2013 तक तत्काल अयोग्यता से बच सकते हैं।
      • प्रावधान के अनुसार संसद सदस्य या राज्य के विधायक तीन महीने के लिये अयोग्य नहीं होंगे।
      • यदि उस अवधि के भीतर दोषी विधायक अपील या पुनरीक्षण आवेदन दायर करता है, तो यह अपील या आवेदन के निपटारे तक प्रभावी नहीं होगा।
    • लिली थॉमस बनाम भारत संघ, 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने खंड (4) को असंवैधानिक करार दिया, इस प्रकार सांसदों द्वारा प्राप्त सुरक्षा को हटा दिया गया।
  • सर्वोच्च न्यायालय की संबंधित शक्ति:
    • सुप्रीम कोर्ट के पास न केवल सज़ा देने बल्कि किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि पर भी रोक लगाने की शक्ति है। कुछ दुर्लभ मामलों में अपीलकर्त्ता को चुनाव लड़ने में सक्षम बनाने के लिये दोषसिद्धि पर रोक लगाई गई है।
    • हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस तरह की रोक बहुत दुर्लभ और विशेष कारणों से होनी चाहिये। आरपीए स्वयं चुनाव आयोग (EC) के माध्यम से एक उपाय प्रदान करता है। अधिनियम की धारा 11 के तहत चुनाव आयोग कारणों को रिकॉर्ड कर सकता है और किसी व्यक्ति की अयोग्यता की अवधि को हटा सकता है या कम कर सकता है।
  • राजनीति के अपराधीकरण का कारण:
    • प्रवर्तन की कमी: कानूनों और निर्णयों के प्रवर्तन की कमी के कारण कई कानूनों और न्यायालयी निर्णयों ने ज़्यादा मदद नहीं की है।
    • निहित स्वार्थ: राजनीतिक दलों द्वारा चुने गए उम्मीदवारों के संपूर्ण आपराधिक इतिहास का प्रकाशन बहुत प्रभावी नहीं हो सकता है, क्योंकि मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा जाति या धर्म जैसे सामुदायिक हितों से प्रभावित होकर मतदान करता है।
  • बाहुबल और धन का उपयोग:
    • गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के पास अक्सर धन और संपदा काफी अधिक मात्रा में होती है, इसलिये वे दल के चुनावी अभियान में अधिक-से-अधिक पैसा खर्च करते हैं और उनकी राजनीति में प्रवेश करने तथा जीतने की संभावना बढ़ जाती है।
    • इसके अलावा कभी-कभी मतदाताओं के पास कोई विकल्प नहीं बचता है, क्योंकि सभी प्रतिस्पर्द्धी उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि होती है।

राजनीति के अपराधीकरण के प्रभाव:

  • स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत के विरुद्ध: यह एक उपयुक्त उम्मीदवार का चुनाव करने के संबंध में मतदाताओं की पसंद को सीमित करता है।
    • यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लोकाचार के खिलाफ है जिससे लोकतंत्र का आधार माना जाता है।
  • सुशासन पर प्रभाव: प्रमुख समस्या यह है कि कानून तोड़ने वाले कानून बनाने वाले बन जाते हैं, इससे सुशासन सुनिश्चित करने में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की प्रभावकारिता प्रभावित होती है।
    • लोकतांत्रिक व्यवस्था में ये अस्वस्थ प्रवृत्तियाँ भारत के राज्य संस्थानों की प्रकृति और इसके निर्वाचित प्रतिनिधियों की गुणवत्ता की खराब छवि को दर्शाती हैं।
  • लोक सेवकों की सत्यनिष्ठा पर प्रभाव: इससे चुनाव के दौरान और बाद में काले धन का प्रचलन भी बढ़ता है, जो बदले में समाज में भ्रष्टाचार को बढ़ाता है और लोक सेवकों के कामकाज को प्रभावित करता है।
  • सामाजिक विषमता का कारण बनना: इससे समाज में हिंसा की संस्कृति का प्रसार होता है और युवाओं के भविष्य के खिलवाड़ के साथ शासन प्रणाली के रूप में लोकतंत्र में लोगों के विश्वास को कम करता है।

आगे की राह

  • चुनावों का राज्य वित्तपोषण: चुनाव सुधार पर बनी विभिन्न समितियों (दिनेश गोस्वामी, इंद्रजीत समिति) ने राज्य द्वारा चुनावी खर्च वहन किये जाने की सिफारिश की, जिससे काफी हद तक चुनावों में काले धन के उपयोग पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी और परिणामस्वरूप राजनीति के अपराधीकरण को सीमित किया जा सकेगा।
  • चुनाव आयोग को सुदृढ़ बनाना: एक स्वच्छ चुनावी प्रक्रिया हेतु राजनीतिक पार्टियों के मामलों को विनियमित करना आवश्यक है, जिसके लिये निर्वाचन आयोग (Election Commission) को मज़बूत करना ज़रूरी है।
  • जागरूक मतदाता: मतदाताओं को चुनाव के दौरान धन, उपहार जैसे अन्य प्रलोभनों के प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता है।
  • न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका: भारत के राजनीतिक दलों की राजनीति के अपराधीकरण और भारतीय लोकतंत्र पर इसके बढ़ते हानिकारक प्रभावों को रोकने के प्रति अनिच्छा को देखते हुए यहाँ के न्यायालयों को अब गंभीर आपराधिक प्रवृत्ति वाले उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने जैसे फैसले पर विचार करना चाहिये।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)  

प्रश्न: अक्सर कहा जाता है कि 'राजनीति' और 'नैतिकता' एक साथ नहीं चलते हैं। इस संबंध में आपकी क्या राय है? दृष्टांतों के साथ अपने उत्तर की पुष्टि कीजिये। (मुख्य परीक्षा, 2013)

प्रश्न. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत संसद या राज्य विधानमंडल के सदस्य के चुनाव से उत्पन्न विवादों को तय करने के लिये प्रक्रियाओं पर चर्चा कीजिये। ऐसे कौन से आधार हैं जिन पर किसी भी उम्मीदवार का चुनाव शून्य घोषित किया जा सकता है? निर्णय के विरुद्ध पीड़ित पक्ष के पास क्या उपाय उपलब्ध है? केस कानूनों का संदर्भ लीजिये। (मुख्य परीक्षा, 2022)

स्रोत: द हिंदू

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