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कॉर्पोरेट ऋण, अर्थव्यवस्था की गति को सुस्त करने के लिये ज़िम्मेदार

  • 16 Sep 2017
  • 3 min read

चर्चा में क्यों ?

भारत की आर्थिक वृद्धि दर को इसके तीन वर्ष के निम्न स्तर पर लाने के लिये नकदी की कमी और जीएसटी के लागू होने को लेकर फैली भ्रम की स्थिति को दोषी माना गया था, लेकिन थॉमसन रायटर के आँकड़ों (Thomson Reuters) से पता चलता है कि इसकी असली वज़ह कॉर्पोरेट ऋण थी।   

क्या होता है कॉर्पोरेट ऋण ? 

  • कॉर्पोरेट ऋण बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा लिये गए ऋण को कहा जाता है। कॉर्पोरेट एक बड़ी कंपनी या समूह को कहते हैं। 

क्या कहा गया है थामसन रायटर रिपोर्ट में ?

  • थॉमसन रायटर के आँकड़ों के अनुसार भारत का कॉर्पोरेट ऋण मार्च के अंत तक पिछले सात वर्षों के उच्च स्तर पर पहुँच गया है। यह रिपोर्ट या आँकड़ा हालिया वार्षिक आय पर आधारित है।
  • इस रिपोर्ट के अनुसार भारत की प्रत्येक पाँच बड़ी कम्पनियों में से एक कंपनी की आय अपना ब्याज चुकाने भर की नहीं हुई थी। 
  • $500 मिलियन से अधिक बाज़ार पूंजी वाली 288 कंपनियों, जिसमें भारत की अधिकांश बड़ी कंपनियाँ शामिल हैं, का कुल ऋण ₹18 खरब ($281अरब ) तक पहुँच गया है।
  • इसमें soured loans मार्च के अंत तक कुल कर्ज़ का 12 प्रतिशत था। 
  • 513 भारतीय कंपनियों में से बीस फीसदी से अधिक का ब्याज कवर एक फीसदी से भी कम था।  

इसका प्रभाव 

  • कॉर्पोरेट ऋण का असर जीडीपी के आँकड़ों पर दिखने लगा है। निजी निवेश की मापक सकल पूंजी निर्माण दर जो एक वर्ष पहले 31 फीसदी और एक दशक पहले 38 फीसदी थी, जून के तिमाही में जीडीपी के 30 प्रतिशत से नीचे चली गई है।
  • 31 अगस्त को ज़ारी सरकार के आँकड़ों के अनुसार जीडीपी की वार्षिक वृद्धि गिरकर 5.7% पर आ गई है। 2014 के बाद से भारत की यह अब तक की सबसे निम्न विकास दर है।  
  • कंपनियों का कर्ज़ बढ़ते रहने से उन्हें आगे और कर्ज़ नहीं मिल पा रहा है जिससे उनके कारोबार पर असर पड़ रहा है और देश की अर्थव्यवस्था भी सुस्त हो रही है।
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