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निर्णायक भूमि स्वामित्व

  • 23 Feb 2021
  • 10 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्र ने कई राज्य सरकारों द्वारा मॉडल बिल ऑन कंक्लूसिव लैंड टाइटलिंग (Model Bill on Conclusive Land Titling) पर अपनी प्रतिक्रिया भेजने में विफलता के बाद चेतावनी दी है कि उनके साथ समझौते को सही मान लिया जाएगा। यह विधेयक नीति आयोग (NITI Aayog) द्वारा तैयार किया गया था।

The-Framework

प्रमुख बिंदु

भूमि स्वामित्व:

  • यह वैयक्तिक और सरकार द्वारा भूमि तथा संपत्ति के अधिकारों के साथ कुशलता से व्यापार करने के लिये कार्यान्वित कार्यक्रमों का वर्णन करने हेतु इस्तेमाल किया जाने वाला सामान्य शब्द है।

भारत में भूमि स्वामित्व की वर्तमान प्रणाली:

  • प्रणाली के विषय में:
    • भारत वर्तमान में अनुमानित भूमि स्वामित्व प्रणाली का अनुसरण करता है, जिसके अनुसार भूमि रिकॉर्ड को पिछले लेन-देन के विवरण के माध्यम से निर्धारित किया जाता है।
  • स्वामित्व:
    • इसे वर्तमान कब्ज़े के आधार पर प्रमाणित किया जाता है।
  • पंजीकरण:
    • भूमि जैसे- उत्तराधिकारी का आँकड़ा, बंधक, पट्टे आदि का पंजीकरण वास्तव में लेन-देन संबंधी पंजीकरण है।
    • भूमि के कागज़ात धारण करना सरकार या कानूनी ढाँचे के अंतर्गत मालिकाना हक की गारंटी नहीं देता है।

निर्णायक भूमि स्वामित्व:

  • निर्णयात्मक भूमि स्वामित्व के विषय में:
    • इस प्रणाली के अंतर्गत भूमि रिकॉर्ड वास्तविक स्वामित्व को निर्दिष्ट करते हैं।
  • स्वामित्व:
    • स्वामित्व सरकार द्वारा दिया जाता है जो इसकी सत्यता की ज़िम्मेदारी लेती है।
  • विवाद निपटान:
    • एक बार स्वामित्व दिये जाने के बाद किसी भी अन्य दावेदार को स्वामित्व धारक की जगह सरकार के साथ अपने विवादों को निपटाना होगा।
  • मुआवज़ा: 
    • सरकार विवादों के मामले में दावेदारों को मुआवज़ा दे सकती है, लेकिन स्वामित्व धारक को स्वामित्व खोने का कोई खतरा नहीं होगा।

निर्णायक भूमि स्वामित्व की आवश्यकता और लाभ:

  • मुकदमेबाज़ी में कमी:
    • निर्णायक प्रणाली की वजह से भूमि से संबंधित मुकदमेबाज़ी काफी कम हो जाएगी।
      • भारत में वर्ष 2007 के विश्व बैंक (World Bank) के अध्ययन ‘विकास को बढ़ाने और गरीबी को कम करने के लिये भूमि नीतियाँ’ के अनुसार सभी लंबित अदालती मामलों में से दो-तिहाई मामले भूमि संबंधी हैं।
      • नीति आयोग ने अनुमान लगाया है कि भूमि या अचल संपत्ति पर विवादों को हल करने के लिये अदालतों में औसतन 20 साल लग सकते हैं।
  • जोखिम में कमी:
    • एक बार निर्णायक स्वामित्व मिलने के बाद जो निवेशक व्यावसायिक गतिविधियों के लिये ज़मीन खरीदना चाहते हैं, वे निरंतर जोखिम का सामना किये बिना ऐसा कर पाएंगे। इससे उनके स्वामित्व पर न तो सवाल उठाया जा सकता है और न ही उनका पूरा निवेश बेकार हो सकता है।
      • भूमि स्वामित्व वर्तमान में लेन-देन पर आधारित हैं, इसलिये लोगों को लेन-देन के रिकॉर्ड की पूरी शृंखला रखनी पड़ती है और इस शृंखला में किसी भी बिंदु पर विवाद स्वामित्व में अस्पष्टता का कारण बनता है।
  • ब्लैक मार्केटिंग में कमी:
    • भूमि के लेन-देन में स्वामित्व संबंधी अस्पष्टता के कारण एक ब्लैक मार्केट का निर्माण हो जाता है, जिसकी वजह से सरकार करों से वंचित हो जाती है।
  • विकास की गति:
    • भूमि विवाद और भूमि स्वामित्व की अस्पष्टता भी बुनियादी ढाँचे के विकास तथा आवास निर्माण में बाधा पैदा उत्पन्न करती है, जिससे इनके निर्माण में देरी होती है। शहरों में नगरीय स्थानीय निकाय संपत्ति करों पर निर्भर होते हैं जिन्हें केवल तभी वसूला जा सकता है जब कोई स्पष्ट स्वामित्व डेटा उपलब्ध हो।
    • वर्तमान में अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में लंबे समय से चल रहे अदालती मामले निवेश के लिये बाधा पैदा करते हैं।
  • आसान ऋण सुविधा:
    • ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी आवश्यकता और भी अधिक है। कृषि ऋण तक पहुँच भूमि को जमानत (Collateral) के रूप में उपयोग करने की क्षमता पर निर्भर करता है।
    • भूमि पर अपने स्वामित्व को साबित करने और बैंकों से औपचारिक ऋण प्राप्त करने में अक्षम होने के कारण छोटे तथा सीमांत किसानों को अक्सर बेईमान साहूकारों की दया पर छोड़ दिया जाता है जिससे वे कर्ज़ के जाल में फँस जाते हैं।

समावेशी भूमि स्वामित्व पर मॉडल विधेयक:

  • राज्य सरकारों को शक्ति:
    • इस विधेयक से राज्य सरकारों को अचल संपत्तियों के स्वामित्व के पंजीकरण प्रणाली की स्थापना करने, प्रशासन और प्रबंधन के लिये आदेश जारी करने की शक्ति मिलेगी।
  • भूमि प्राधिकारी:
    • प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा भूमि प्राधिकरण की स्थापना की जाएगी। यह प्राधिकरण मौजूदा रिकॉर्ड और दस्तावेज़ों के आधार पर भूमि स्वामित्व की एक मसौदा सूची तैयार करने तथा प्रकाशित करने के लिये एक स्वामित्व पंजीकरण अधिकारी (Title Registration Officer) की नियुक्ति करेगा।
      • यह संपत्ति में रुचि रखने वाले सभी संभावित दावेदारों को एक वैध नोटिस जारी करेगा, जिसके बाद इन दावेदारों को एक निर्धारित अवधि के भीतर अपने दावे या आपत्तियाँ दर्ज करनी होंगी।
    • यदि विवादित दावे प्राप्त होते हैं तो TRO सभी संबंधित दस्तावेज़ों को सत्यापित करेगा और मामले को हल करने के लिये भूमि विवाद समाधान अधिकारी (Land Dispute Resolution Officer) को संदर्भित कर देगा।
      • हालाँकि अदालतों में पूर्व के लंबित विवादों को इस तरह से हल नहीं किया जा सकता है।
    • सभी विवादित दावों पर विचार करने और उन्हें हल करने के बाद भूमि प्राधिकरण द्वारा स्वामित्व का रिकॉर्ड प्रकाशित किया जाएगा।
  • भूमि स्वामित्व अपीलीय न्यायाधिकरण:
    • इन स्वामित्वों और TRO तथा LDRO के फैसलों को तीन साल की अवधि के बाद भूमि स्वामित्व अपीलीय न्यायाधिकरण (Land Titling Appellate Tribunal) के समक्ष चुनौती दी जा सकती है। इस न्यायाधिकरण को कानून के तहत स्थापित किया जाएगा।
    • स्वामित्व के रिकॉर्ड (Record of Title) में प्रविष्टियों को तीन साल की अवधि के बाद स्वामित्व का निर्णायक प्रमाण माना जाएगा।
  • उच्च न्यायालय की विशेष पीठ:
    • भूमि स्वामित्व अपीलीय न्यायाधिकरण द्वारा पारित आदेशों के खिलाफ अपील से निपटने के लिये उच्च न्यायालय (High Court) की एक विशेष पीठ गठित की जाएगी।

चुनौतियाँ:

  • सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दशकों से भूमि रिकॉर्ड अपडेट नहीं किये गए हैं, खासकर ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में।
  • भूमि रिकॉर्ड अक्सर वर्तमान भूमि मालिक के दादा-दादी के नाम पर होते हैं, जिसमें विरासत का कोई सबूत नहीं होता है।
  • अद्यतन रिकॉर्ड पर आधारित न होने के कारण भूमि स्वामित्व का निर्णय करना और भी अधिक समस्याएँ पैदा कर सकता है।

आगे की राह

  • सामुदायिक भागीदारी के साथ व्यापक ग्राम-स्तरीय सर्वेक्षण भूमि स्वामित्व प्रक्रिया के लिये काफी महत्त्वपूर्ण है। मौजूदा रिकॉर्ड्स और उपग्रहों के माध्यम से प्राप्त सूचना की तुलना में स्थानीय सर्वेक्षण अधिक विश्वसनीय हो सकता है।
  • यह आवश्यक है कि देश में शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के लिये भूमि रिकॉर्ड की एक एकीकृत प्रणाली स्थापित की जाए, जिसमें कृषि, बुनियादी अवसंरचना, आवासीय और औद्योगिक भूमि आदि व्यापक क्षेत्रों को शामिल किया जाए। 

स्रोत: द हिंदू

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