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श्रम संहिता: इसमें निहित समस्याएँ

  • 06 Aug 2019
  • 7 min read

संदर्भ

हाल ही में केंद्र सरकार ने 44 श्रमिक नियमों को 4 संहिताओं से प्रतिस्थापित करने की पेशकश की। ये चार संहिताएँ हैं: वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता तथा पेशागत सुरक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य व कार्य शर्त संहिता।

  • इस संबंध में ऐसे बहुत से प्रश्न है जिनके जवाब अभी तक नहीं मिल पाए हैं, उदाहरण के तौर पर क्या ये संहिताएँ श्रमिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करती हैं? क्या ये श्रमिकों के गरिमापूर्ण जीवन स्तर को बनाए रख सकती है?
  • यहाँ यह निर्देशित करने की ज़रुरत है कि वास्तविक श्रमिक नियमों को दशकों के संघर्ष के बाद बनाया गया था ताकि श्रमिकों की गरिमा को सुनिश्चित किया जा सके। ऐसे में ये नए बदलाव कितने सार्थक और प्रभावी साबित होंगे यह विचारणीय है।

संहिताओं की उपयोगिता एवं लाभ

किसी भी देश की आर्थिक प्रगति के लिये उद्योगों का विकास होना आवश्यक है विशेषकर विनिर्माण क्षेत्र में, जो अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक श्रमिक गहन होता है। यदि श्रम कानूनों में बाज़ार और श्रमिकों के ज़रुरी हितों का ध्यान नहीं रखा जाता है तो ऐसे उद्योगों का सीमित विकास ही हो पाता है। यदि कानून अधिक श्रमिकोन्मुख होते हैं तो जहाँ एक ओर उद्योगों के कार्यकरण एवं उत्पादन के प्रभावित होने की संभावना बढ़ जाती है वहीं दूसरी ओर यदि श्रम कानूनों को निजी क्षेत्र को ध्यान में रखकर बनाया जाता है तो श्रमिकों का शोषण होने की संभावना बनी रहती है। इसी विचार को आधार बनाकर प्रायः श्रम कानूनों का निर्माण किया जाता है।

संहिताओं के साथ समस्याएँ

  • ये संहिताएँ श्रमिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और उनके गरिमापूर्ण जीवन स्तर की विरोधी हैं।
  • वास्तविक श्रम कानून को दशकों के संघर्ष के बाद बनाया गया था ताकि श्रम करने वाले लोगों की गरिमा सुनिश्चित की जा सके।
  • श्रम मंत्रालय ने न्यूनतम वेतन स्तर 178 रुपए करने का प्रस्ताव रखा है जो कि किसी प्रस्तावित मानदंड या अनुमान की विधि से विहीन है।
    • यह पूँजी और निवेश को भी आकर्षित करने हेतु राज्यों के मध्य प्रतिस्पर्द्धा को बढावा दे सकता है।
    • इसे ‘भुखमरी वेतन’ कहा जा रहा है, जबकि मंत्रालय की स्वयं की समिति ने न्यूनतम वेतन 375 रुपए करने का सुझाव दिया था।
  • श्रमबल का 95 प्रतिशत हिस्सा जो कि असंगठित है, इन संहिताओं द्वारा उपेक्षित है जबकि इन्हें कानूनी सुरक्षा की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
  • इनमें यह सुनिश्चित नहीं किया गया है कि एक नियोक्ता, कर्मचारी या उद्यम से संबंधित निर्णयों हेतु प्रावधान कौन करेगा?
  • न्यूनतम वेतन अधिनियम प्रावधान करता है कि प्रशिक्षुओं को कर्मचारी नहीं माना जाएगा।
    • साक्ष्यों से यह जानकारी प्राप्त होती है कि प्रशिक्षु अनुबंध के तहत कार्य करते हैं तथा वे स्थाई कर्मचारी भी होते है।
  • संहिता में ‘15 वर्ष से कम उम्र कर्मचारी’ के बारे में एक प्रावधान है जिसका तात्पर्य बाल श्रम को वैध करने से संबंधित हो सकता है। अर्थात् स्पष्टता का अभाव है।
  • वेतन संहिता श्रम के संविदात्मक रूप को खत्म करने की जगह उसे वैध और प्रोत्साहित करती है।
  • वेतन संहिता ने ‘वसूली योग्य अग्रिम राशि’ के प्रावधान को पुनः शामिल किया है जो कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित बलपूर्वक और बंधुआ मज़दूरी से जुडा हुआ है। अतः अग्रिम भुगतान द्वारा पीड़ित एवं संवेदनशील प्रवासी श्रमिक कार्य से बंध जाएंगे।
  • संहिता में 8 घंटे के कार्यदिवस को समाप्त कर दिया गया है तथा ओवरटाइम बढ़ाने से संबंधित कई प्रावधान जोड़े गए है।
  • यह नियोक्ताओं को बोनस भुगतान में टाल मटोल का अवसर भी प्रदान करता है।

निष्कर्ष

सुरक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएँ और कार्यस्‍थलों में कामकाज की बेहतर स्थितियाँ श्रमिकों के कल्‍याण के साथ ही देश के आर्थिक विकास के लिये भी पहली शर्त होती है। देश का स्‍वस्‍थ कार्यबल अधिक उत्‍पादक होगा और कार्यस्‍थलों में सुरक्षा के बेहतर इंतजाम होने से दुर्घटनाओं में कमी आएगी जो कर्मचारियों के साथ ही नियोक्‍ताओं के लिये भी फायदेमंद रहेगा। हालाँकि यहाँ इस बात पर भी गौर किये जाने की आवश्यकता है कि अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से श्रमिक अधिकारों में वृद्धि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। लेकिन आर्थिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि यदि श्रमिक अधिकार एवं उनकी समस्याओं को एक उचित मंच प्रदान नहीं किया जाएगा तो धीरे-धीरे यह नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करेगा। इसके अतिरिक्त किसी भी लोकतांत्रिक देश में प्रत्येक व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार होता है, कुछ विशेष मामलों को छोड़कर औद्योगिक संस्थान भी इसके दायरे में आते हैं। इसी विचार के आधार पर श्रमिक संगठनों एवं हड़ताल को वैधानिक मान्यता दी जाती रही है।

स्रोत: द हिंदू

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