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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

कार्बन डेटिंग

  • 16 May 2023
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

कार्बन डेटिंग, ASI, ज्ञानवापी मस्जिद, शिवलिंग, कार्बन-14, उपासना स्थल अधिनियम, 1991

मेन्स के लिये:

संरचना की आयु निर्धारित करने हेतु कार्बन डेटिंग और अन्य तरीके

चर्चा में क्यों?

हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (Archeological Survey of India- ASI) को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर स्थित 'शिवलिंग' की कार्बन डेटिंग करने की अनुमति दी।

  • याचिकाकर्त्ताओं ने ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर संबंधित वस्तु के "शिवलिंग" होने का दावा किया है। इस दावे को मुस्लिम पक्ष द्वारा विवादित माना गया है और कहा गया है कि यह वस्तु "फव्वारे" का हिस्सा है।
  • इसने वाराणसी ज़िला न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत संरचना की कार्बन डेटिंग सहित वैज्ञानिक जाँच की याचिका खारिज कर दी गई थी।

कार्बन डेटिंग: 

  • परिचय: 
    • कार्बन डेटिंग कार्बनिक पदार्थों यानी जो वस्तुएँ कभी जीवित थीं, की आयु का पता लगाने के लिये व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली विधि है।
    • सजीव वस्तुओं में विभिन्न रूपों में कार्बन होता है।
    • डेटिंग पद्धति इस तथ्य पर आधारित है कि कार्बन-14 (C-14) रेडियोधर्मी है और उचित दर पर इसका क्षय होता है।
      • C-14 कार्बन का समस्थानिक है जिसका परमाणु भार 14 है।
      • वायुमंडल में कार्बन का सबसे प्रचुर समस्थानिक C-12 है।
      • वायुमंडल में C-14 की बहुत कम मात्रा मौजूद होती है।
        • वातावरण में C-12 की तुलना में C-14 का अनुपात लगभग स्थिर है और ज्ञात है।
  • हाफ लाइफ:
    • प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से पौधे कार्बन प्राप्त करते हैं, जबकि जानवर इसे मुख्य रूप से भोजन के माध्यम से प्राप्त करते हैं। इस तथ्य के कारण कि पौधे और जानवर अपना कार्बन पर्यावरण से प्राप्त करते हैं, वे भी वातावरण में मौजूद कार्बन के लगभग बराबर अनुपात में C-12 एवं C-14 प्राप्त करते हैं।
    • जब पौधे का जीवन चक्र समाप्त हो जाता है तब वातावरण के साथ उसका संपर्क बंद हो जाता है। चूँकि C-12 स्थिर होता है, रेडियोधर्मी C-14 को आधा होने में जितना समय लगता है उसे 'अर्द्ध-जीवन/हाफ लाइफ' कहते हैं और यह समय लगभग 5,730 वर्ष होता है।
    • किसी पौधे अथवा पशु का जीवन समाप्त होने के बाद उसके अवशेषों में C-12 से C-14 के परिवर्तित होते अनुपात को मापा जा सकता है और इसका उपयोग उक्त जीव की मृत्यु के अनुमानित समय का आकलन करने के लिये किया जा सकता है।
  • निर्जीव वस्तुओं की आयु का निर्धारण: 
    • कार्बन डेटिंग को सभी परिस्थितियों में लागू नहीं किया जा सकता। उदाहरण के लिये इसका उपयोग चट्टानों जैसी निर्जीव वस्तुओं की आयु निर्धारित करने के लिये नहीं किया जा सकता है।
    • साथ ही कार्बन डेटिंग से 40,000-50,000 वर्ष से अधिक पुरानी वस्तुओं की आयु का पता नहीं लगाया जा सकता है।
    • ऐसा इसलिये है क्योंकि हाफ लाइफ के 8-10 चक्रों के बाद C-14 की मात्रा लगभग बहुत कम हो जाती है जिसके विषय में पता नहीं लगाया जा सकता है।
    • निर्जीव वस्तुओं की आयु निर्धारित करने के लिये कार्बन के बजाय उसमें मौजूद अन्य रेडियोधर्मी तत्त्वों के क्षय को काल निर्धारण पद्धति का आधार बनाया जा सकता है।
      • इन्हें रेडियोमीट्रिक काल निर्धारण विधि कहा जाता है। इनमें से कई तत्त्वों की  हाफ लाइफ अरबों वर्षों से अधिक की होती है जो वैज्ञानिकों को बहुत पुरानी वस्तुओं की आयु का विश्वसनीय रूप से अनुमान लगाने में मदद करती है।

निर्जीव वस्तुओं के आयु निर्धारण के लिये रेडियोमीट्रिक विधि: 

  • पोटेशियम-आर्गन और यूरेनियम-थोरियम-लेड: चट्टानों की डेटिंग के लिये आमतौर पर नियोजित दो तरीके पोटेशियम-आर्गन डेटिंग और यूरेनियम-थोरियम-लेड डेटिंग हैं।
    • पोटेशियम के रेडियोधर्मी समस्थानिक का आर्गन में क्षय हो जाता है और उनका अनुपात चट्टानों की आयु के बारे में जानकारी प्रदान करने में मदद कर सकता है।
    • यूरेनियम और थोरियम में कई रेडियोधर्मी समस्थानिक होते हैं और इन सभी का स्थिर लेड परमाणु में क्षय हो जाता है। किसी भी वस्तु/सामग्री में मौजूद इन तत्त्वों के अनुपात को माप कर उसकी आयु के बारे में अनुमान लगाने के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आना: यह निर्धारित करने के तरीके भी हैं कि कोई वस्तु कितने समय तक सूर्य के प्रकाश के संपर्क में रही है। यह विभिन्न तकनीकों पर निर्भर करती है लेकिन फिर से रेडियोधर्मी क्षय पर आधारित होती है और विशेष रूप से दफन वस्तुओं या टोपोलॉजी में परिवर्तन का अध्ययन करने में उपयोगी है।
    • इनमें से सबसे साधारण को कॉस्मोजेनिक न्यूक्लाइड डेटिंग या CRN कहा जाता है, और ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ के कोर की आयु का अध्ययन करने के लिये नियमित रूप से इसका उपयोग किया जाता है।
  • अप्रत्यक्ष कार्बन डेटिंग: कुछ स्थितियों में कार्बन डेटिंग का उपयोग अप्रत्यक्ष रूप से भी किया जा सकता है।
    • एक ऐसा तरीका जिसमें विशाल बर्फ की चादरों के अंदर फँसे कार्बन डाइऑक्साइड अणुओं का अध्ययन करके ग्लेशियरों और ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ के कोर की आयु निर्धारित की जाती है।
      • फँसे हुए अणुओं का बाहरी वातावरण से कोई संपर्क नहीं होता है और वह उसी अवस्था में पाए जाते हैं जिस अवस्था में वे फँस गए थे। इनकी उम्र का निर्धारण उस समय का कच्चा अनुमान देता है जब बर्फ की चादरें बन रही थीं।

ज्ञानवापी शिवलिंग के आयु निर्धारण की सीमाएँ:

  • इस मामले में विशिष्ट सीमाएँ हैं जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित हैं और विघटनकारी तरीकों या संरचना को उखाड़ने से रोकती हैं।
  • इसलिये कार्बन डेटिंग जैसे पारंपरिक तरीके, जिसमें संरचना के नीचे फँसी हुई कार्बनिक सामग्री का विश्लेषण करना शामिल है, इस विशेष स्थिति में संभव नहीं हो सकता है।

ज्ञानवापी विवाद: 

  • ज्ञानवापी विवाद वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के इर्द-गिर्द घूमता है। हिंदू याचिकाकर्त्ताओं का दावा है कि मस्जिद एक प्राचीन हिंदू मंदिर के स्थान पर बनाई गई थी। उनका तर्क है कि "शिवलिंग" की उपस्थिति मंदिर के अस्तित्त्व के प्रमाण के रूप में है। याचिकाकर्त्ताओं ने मस्जिद परिसर की बाहरी दीवार पर माँ शृंगार गौरी की पूजा का अधिकार मांगा है। 
  • हालाँकि मस्जिद की प्रबंधन समिति का कहना है कि भूमि वक्फ संपत्ति है और तर्क देती है कि उपासना स्थल अधिनियम, 1991 मस्जिद के स्वरूप में किसी भी बदलाव पर रोक लगाता है।
  • ऐतिहासिक रूप से ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण 1669 में मुगल बादशाह औरंगज़ेब के शासन काल में हुआ था। इसका निर्माण प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर के विध्वंस के बाद किया गया था। मंदिर के चबूतरे को बरकरार रखा गया था और इसे मस्जिद के आँगन के रूप में उपयोग किया गया था, जबकि मक्का की ओर एक दीवार को किबला दीवार के रूप में संरक्षित किया गया था। भगवान शिव को समर्पित वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर बाद में 18वीं शताब्दी में रानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा मस्जिद के बगल में बनाया गया था।
  • पिछले कुछ वर्षों में कई दावे किये गए हैं, जिनमें से कुछ का दावा है कि मस्जिद स्थल मूल रूप से हिंदुओं की पूजा का पवित्र स्थान है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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