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PM के शपथ ग्रहण में शामिल होंगे बिम्सटेक प्रमुख

  • 28 May 2019
  • 14 min read

चर्चा में क्यों?

भारत ने 30 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रिपरिषद के आयोजित होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में बिम्सटेक (Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation -BIMSTEC) और शंघाई सहयोग संगठन ( Shanghai Cooperation Organisation-SCO) के सदस्य देशों के प्रमुखों को आमंत्रित किया है। ध्यातव्य है कि वर्ष 2014 में आयोजित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान सहित दक्षेस देशों के नेताओं को आमंत्रित किया गया था।

  • बिम्सटेक देशों के नेताओं के अलावा भारत ने किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सोरोनबाय जेनेबकोव और मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्राविन्द जगन्नाथ को भी शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया है, ये दोनों इस वर्ष 'प्रवासी भारतीय दिवस' पर मुख्य अतिथि भी थे। मॉरीशस के प्रधानमंत्री को वर्ष 2014 के शपथ ग्रहण समारोह में भी आमंत्रित किया गया था।
  • वर्तमान में किर्गिस्तान SCO का अध्यक्ष है, जो अगले महीने बिश्केक (Bishkek) में आयोजित होने वाले शिखर सम्मेलन की मेज़बानी भी करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस सम्मेलन का हिस्सा होंगे।
  • भारत द्वारा शपथ ग्रहण समारोह में बिम्सटेक के सदस्य देशों के नेताओं को आमंत्रित किया जाना सरकार की 'पड़ोस पहले/नेबरहुड फर्स्ट नीति’ (Neighbourhood first policy) के अनुरूप है।

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (SAARC)

  • दक्षेस/सार्क (South Asian Association for Regional Cooperation-SAARC) दक्षिण एशिया के आठ देशों का आर्थिक और राजनीतिक संगठन है। सार्क की स्थापना 8 दिसंबर, 1985 को हुई थी और इसका मुख्यालय काठमांडू (नेपाल) में है। सार्क का प्रथम सम्मेलन ढाका में दिसंबर 1985 में हुआ था।
  • इस समूह में अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका शामिल हैं। वर्ष 2007 से पहले सार्क के सात सदस्य थे, अप्रैल 2007 में सार्क के 14वें शिखर सम्मेलन में अफगानिस्तान इसका आठवाँ सदस्य बन गया था।
  • प्रत्येक वर्ष 8 दिसंबर को सार्क दिवस मनाया जाता है। इसका संचालन संगठन के महासचिव द्वारा की जाती है, जिसकी नियुक्ति तीन साल के लिये देशों के वर्णमाला क्रम के अनुसार की जाती है।

उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा सार्क

  • दरअसल, पिछले 30 सालों से सार्क की जो स्थिति है, उससे लगता है कि यह संगठन मात्र औपचारिक बनकर रह गया है।
  • केवल सम्मेलनों का नियमित रूप से आयोजित होना किसी संस्था के जीवित रहने का प्रमाण नहीं है। जहाँ तक सार्क द्वारा ठोस कदम उठाने का सवाल है तो पाकिस्तान के असहयोग और राजनीतिक विभाजन की वज़ह से ऐसा नहीं हो पा रहा है।
  • सदस्य देशों में कई बार आतंकवाद के खिलाफ जंग को लेकर भी सहमति बनी है लेकिन आतंकवाद के मुद्दे पर सार्क के सदस्य देश और भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान ने कभी साथ नहीं निभाया और यही सार्क की विफलता की एक बड़ी वज़ह बन गया।
  • पिछले कुछ सालों से दक्षेस लगभग निष्क्रिय हो गया है। संभवतः यही कारण रहा कि भारत सहित कई सदस्य देशों ने वर्ष 2016 में पाकिस्तान के इस्लामाबाद में होने वाले दक्षेस सम्मेलन में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था।
  • जनवरी 2016 में पठानकोट एयरबेस और सितंबर में उड़ी में हुए आतंकी हमले में 19 भारतीय जवानों के शहीद होने के बाद भारत ने पाकिस्तान से अपने क्षेत्र में होने वाली आतंकी गतिविधियों के संबंध में कठोर कार्यवाही करने का दबाव बनाया। इसके बाद कई दक्षेस सदस्यों ने भी भारत के रुख का समर्थन किया और दक्षेस सम्मेलन का बहिष्कार करने का निर्णय लिया।
  • नवंबर 2014 में काठमांडू में आयोजित दक्षेस सम्मेलन के बाद अभी तक इसका कोई सम्मेलन आयोजित नहीं हुआ है। दक्षेस के लगभग निष्किय होने के बाद ही भारत ने बिम्सटेक समूह को मज़बूत बनाने पर बल दिया। यही कारण है कि सितंबर 2016 में गोवा में आयोजित ब्रिक्स-बिम्सटेक सम्मेलन में बिम्सटेक के नेताओं को आमंत्रित किया गया था।

सार्क की असफलता के कारण

भारत-पाकिस्तान संबंधों का बेहतर न हो पाना

  • भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक सहमति का अभाव और सैन्य संघर्ष के कारण दक्षिण-पूर्व क्षेत्रीय सहयोग कमज़ोर हुआ है।
  • विदित हो कि उड़ी आतंकवादी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान में होने वाले 19वें सार्क शिखर सम्मेलन का बहिष्कार किया था।
  • बांग्लादेश, अफगानिस्तान और भूटान ने भी भारत के पक्ष में अपनी सहमति जताई और अंततः सम्मलेन निरस्त हो गया था।

क्षेत्रीय व्यापार की चिंताजनक स्थिति

  • सार्क देशों के बीच क्षेत्रीय व्यापार में न के बराबर प्रगति हुई है। विदित हो कि सदस्य देशों के बीच आपसी व्यापार उनके कुल व्यापार का 3.5% ही रहा है।
  • दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार संघ (South Asian Free Trade Association) के तहत की गई पहलें अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में असफल रही हैं।

बेहतर कनेक्टिविटी का अभाव

  • इस क्षेत्र में व्यापार के मोर्चे पर यदि प्रगति नहीं हुई है तो इसका एक बड़ा कारण कनेक्टिविटी का बेहतर न हो पाना है।
  • बीबीआईएन मोटर वाहन समझौता (BBIN Motor Vehicle Agreement) जैसी उप-क्षेत्रीय पहलें रुकी हुई हैं।
  • सार्क की वीज़ा प्राप्ति में राहत योजना (SAARC Visa Exemption Scheme) का लाभ केवल कुछ गणमान्य व्यक्तियों को ही प्राप्त है।
  • सार्क देशों में बुनियादी ढाँचे की खस्ता हालत के कारण भी बेहतर कनेक्टिविटी सुनिश्चित नहीं हो पाई है।

बिम्सटेक

  • बिम्सटेक यानी बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टीसेक्टोरल टेक्निकल एंड इकोनामिक कोऑपरेशन (Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation -BIMSTEC) दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों का एक अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग संगठन है जिसकी स्थापना 6 जून, 1997 को बैंकाक घोषणापत्र (Bangkok Declaration) से हुई थी।
  • आर्थिक और तकनीकी सहयोग के लिये बनाए गए इस संगठन में भारत समेत नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्याँमार और थाईलैंड शामिल हैं।
  • सात देशों का यह संगठन मूल रूप से एक सहयोगात्मक संगठन है जो व्यापार, ऊर्जा, पर्यटन, मत्स्यपालन, परिवहन और प्रौद्योगिकी को आधार बनाकर शुरू किया गया था लेकिन बाद में इसमें कृषि, गरीबी उन्मूलन, आतंकवाद, संस्कृति, जनसंपर्क, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन को भी शामिल किया गया।
  • बिम्सटेक का मुख्यालय ढाका में बनाया गया है। बिम्सटेक के महत्त्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया की लगभग 22 फीसदी आबादी बंगाल की खाड़ी के आस-पास स्थित इन सात देशों में रहती है जिनका संयुक्त जीडीपी (Gross Domestic Product-GDP) 2.7 ट्रिलियन डॉलर के बराबर है।
  • बिम्सटेक के मुख्य उद्देश्यों में बंगाल की खाड़ी के किनारे दक्षिण एशियाई और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच तकनीकी और आर्थिक सहयोग प्रदान करना शामिल है।

बिम्सटेक भारत के लिये महत्त्वपूर्ण क्यों है?

  • बिम्सटेक के 7 देश बंगाल की खाड़ी के आसपास स्थित हैं जो एकसमान क्षेत्रीय एकता को दर्शाते हैं। भारत ने शुरू से ही इस संगठन को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाई है।
  • बिम्सटेक दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच एक सेतु की तरह काम करता है। इस समूह में दो देश दक्षिण-पूर्व एशिया के हैं। म्याँमार और थाईलैंड भारत को दक्षिण-पूर्वी इलाकों से जोड़ने के लिहाज़ से बेहद अहम हैं।
  • बिम्सटेक देशों के बीच मज़बूत संबंध भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास को गति प्रदान कर सकता है। इससे भारत-म्याँमार के बीच परिवहन परियोजना और भारत-म्याँमार-थाईलैंड राजमार्ग परियोजना के विकास में भी तेज़ी आएगी।
  • भारत के अलावा बिम्सटेक के सदस्य देशों के लिये यह संगठन काफी महत्त्वपूर्ण है। बिम्सटेक के ज़रिये बांग्लादेश जहाँ बंगाल की खाड़ी में खुद को मात्र एक छोटे से देश से ज़्यादा महत्त्व के रूप में देखता है वहीं, श्रीलंका इसे दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने के अवसर के रूप में देखता है। इसके ज़रिये श्रीलंका हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में अपनी आर्थिक गतिविधि भी बढ़ाना चाहता है।
  • दूसरी तरफ, नेपाल और भूटान के लिये बिम्सटेक बंगाल की खाड़ी से जुड़ने और अपनी भूमिगत भौगोलिक स्थिति से बचने की उम्मीद को आगे बढ़ाता है।
  • वहीं म्याँमार और थाईलैंड को इसके ज़रिये बंगाल की खाड़ी से जुड़ने और भारत के साथ व्यापार करने के नए अवसर मिलेंगे। बिम्सटेक के ज़रिये दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के बड़े पैमाने पर घुसपैठ को भी रोकने की कोशिश की जा सकती है।
    बिम्सटेक न केवल दक्षिण व दक्षिण-पूर्वी एशिया को जोड़ता है बल्कि हिमालय और बंगाल की खाड़ी की पारिस्थितिकी को भी शामिल करता है। एक-दूसरे से जुड़े साझा मूल्यों, इतिहासों और जीवन के तरीकों के चलते बिम्सटेक शांति और विकास के लिये एक समान स्थिति का प्रतिनिधित्त्व करता है।
  • भारत के लिये बिम्सटेक ‘पड़ोसी सबसे पहले और पूर्व की और देखो’ की हमारी विदेश नीति की प्राथमिकताओं को पूरा करने के लिये एक स्वाभाविक मंच है।

क्या बिम्सटेक सार्क का विकल्प बनकर उभरा है?

  • बिम्सटेक दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक पुल की तरह काम करता है। इसके सात में से पाँच देश सार्क के सदस्य हैं, जबकि दो आसियान के सदस्य हैं। ऐसे में यह सार्क और आसियान देशों के बीच अंतर क्षेत्रीय सहयोग का भी एक मंच है।
  • बिम्सटेक के गठन के पहले भी आपसी सहयोग को लेकर एशिया में क्षेत्रीय संगठन अस्तित्व में रहे हैं जिसमें सार्क अहम है। पिछले वर्षों में बिम्सटेक अपने एजेंडा का मज़बूती से विस्तार कर रहा है। इस समूह ने प्राथमिकता के 14 क्षेत्रों की पहचान की है जिनमें से 4 फोकस क्षेत्रों में भारत लीड कंट्री है, इसमें परिवहन और संचार, पर्यटन, पर्यावरण और आपदा प्रबंधन के साथ आतंकवाद के खिलाफ रणनीति शामिल है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, सार्क की विफलता और भारत-पाकिस्तान के बीच आपसी तनाव के बीच बिम्सटेक का महत्त्व बढ़ रहा है जो आने वाले समय में क्षेत्रीय सहयोग का बड़ा मंच साबित हो सकता है।

स्रोत- द हिंदू

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