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सूचना का अधिकार अधिनियम: महत्त्व और चुनौतियाँ

  • 12 Oct 2020
  • 12 min read

प्रिलिम्स के लिये

केंद्रीय सूचना आयोग, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005

मेन्स के लिये

सूचना के अधिकार का महत्त्व, अधिनियम के कार्यान्वयन की चुनौतियाँ

चर्चा में क्यों?

वर्ष 2005 में लागू सूचना के अधिकार अधिनियम (Right to Information-RTI) ने अब 15 वर्ष पूरे कर लिये हैं, इस संबंध में जारी एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोगों में अभी तक लगभग 2.2 लाख मामले लंबित हैं।

प्रमुख बिंदु

सूचना के अधिकार की मौजूदा स्थिति

  • सूचना के अधिकार अधिनियम की 15वीं वर्षगांठ पर ‘सतर्क नागरिक संगठन’ और ‘सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज़’ (Centre for Equity Studies) द्वारा जारी रिपोर्ट में पाया गया है कि महाराष्ट्र में सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के कार्यान्वयन की स्थिति काफी चिंताजनक है, और वहाँ तकरीबन 59,000 मामले अभी लंबित हैं, जो कि अन्य राज्यों की तुलना में सबसे अधिक हैं।
  • महाराष्ट्र के बाद उत्तर प्रदेश का स्थान है, जहाँ अभी कुल 47,923 मामले लंबित हैं। इसके अलावा केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) में कुल 35,653 मामले लंबित हैं।
  • रिपोर्ट बताती है कि यदि मामलों के निपटान की यही दर रहती है तो ओडिशा को सभी लंबित शिकायतों को निपटाने में 7 वर्ष से भी अधिक का समय लग सकता है।
  • कारण: रिपोर्ट के अनुसार, इतनी अधिक मात्रा में लंबित मामलों का मुख्य कारण है कि देश में अधिकांश सूचना आयोग अपनी पूर्ण क्षमता के साथ कार्य नहीं कर रहे हैं, क्योंकि उनमें सूचना आयुक्तों की नियुक्ति ही नहीं की जा रही है।
    • रिपोर्ट में कहा गया है कि ओडिशा केवल 4 सूचना आयुक्तों के साथ कार्य कर रहा है, जबकि राजस्थान में केवल 3 सूचना आयुक्त हैं। वहीं झारखंड और त्रिपुरा में कोई भी सूचना आयुक्त कार्य नहीं कर रहा है।
    • वहीं केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) बीते कुछ वर्षों से बिना मुख्य सूचना आयुक्त के कार्य कर रहा है। वर्तमान में केंद्रीय सूचना आयुक्त (CIC) में केवल 5 सदस्य कार्य कर रहे हैं।
    • जबकि नियम कहते हैं कि प्रत्येक आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त और अधिकतम 10 आयुक्त होने अनिवार्य हैं।
  • विश्लेषण में पाया गया है कि सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत शायद ही कभी कानून का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों को सज़ा दी गई हो।
  • निहितार्थ
    • रिपोर्ट में पाया गया है कि सभी सूचना आयोगों द्वारा निपटाए गए कुल मामलों में से केवल 2.2 प्रतिशत मामलो में ही सज़ा/दंड दिया गया है। इस प्रकार सज़ा संबंधी प्रावधानों का सही ढंग से पालन न करना यह नकारात्मक संदेश पहुँचता है कि अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर किसी भी प्रकार की सज़ा नहीं मिलती है।
    • सूचना के अधिकार का मूल उद्देश्य नागरिकों को सशक्त बनाना, सरकार के कामकाज में पारदर्शिता एवं जवाबदेही को बढ़ावा देना, भ्रष्टाचार कम करना और सही अर्थों में जीवंत लोकतंत्र विकसित करना है, किंतु इस अधिनियम के सही ढंग से कार्यान्वित न होने के कारण इस उद्देश्य को प्राप्त करना काफी मुश्किल हो गया है।

सूचना का अधिकार अधिनियम

  • सूचना के अधिकार यानी RTI का अर्थ है कि कोई भी भारतीय नागरिक राज्य या केंद्र सरकार के कार्यालयों और विभागों से किसी भी जानकारी (जिसे सार्वजनिक सूचना माना जाता है) को प्राप्त करने का अनुरोध कर सकता है।
  • इसी अवधारणा के मद्देनज़र भारतीय लोकतंत्र को मज़बूत करने और शासन में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से भारतीय संसद ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 लागू किया था।
    • विशेषज्ञ इस अधिनियम को भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम के रूप में देखते हैं।
  • अधिनियम के प्रमुख प्रावधान
    • इस अधिनियम में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि कोई भी भारतीय नागरिक किसी भी सार्वजानिक अथवा सरकारी प्राधिकरण से किसी भी प्रकार की जानकारी प्राप्त करने के लिये स्वतंत्र है, साथ ही इस अधिनियम के तहत मांगी गई सूचना को आवेदन की तारीख से 30 दिनों की अवधि के भीतर प्रदान करने की व्यवस्था की गई है।
    • हालाँकि अधिनियम के तहत मांगी गई सूचना रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत सूचना से संबंधित नहीं होनी चाहिये।
    • इस अधिनियम में यह भी कहा गया है कि सभी सार्वजनिक प्राधिकरण अपने दस्तावेज़ों का संरक्षण करते हुए उन्हें कंप्यूटर में सुरक्षित रखेंगे।
    • इस अधिनियम के माध्यम से राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, संसद व राज्य विधानमंडल के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) और निर्वाचन आयोग (Election Commission) जैसे संवैधानिक निकायों व उनसे संबंधित पदों को भी सूचना का अधिकार अधिनियम के दायरे में लाया गया है।
    • इस अधिनियम के अंतर्गत केंद्र स्तर पर एक मुख्य सूचना आयुक्त और अधिकतम 10 सूचना आयुक्तों की सदस्यता वाले एक केंद्रीय सूचना आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है। इसी के आधार पर राज्य में भी एक राज्य सूचना आयोग का गठन किया जाएगा।

क्यों महत्त्वपूर्ण है सूचना का अधिकार?

  • असल में सूचना उस मुद्रा की तरह होती है, जो कि प्रत्येक नागरिक के लिये समाज के शासन में हिस्सा लेने हेतु आवश्यक होती है।
  • कार्यपालिका के प्रत्येक स्तर नियंत्रण, संरक्षण और शक्ति को बनाए रखने के उद्देश्य से सूचना को काफी सीमित कर दिया जाता है।
  • इसलिये प्रायः यह माना जाता है कि कार्यपालिका में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये नियमों और प्रक्रिया की स्पष्टता, पूर्ण पारदर्शिता और आम जनता के बीच प्रासंगिक जानकारी का प्रसार काफी महत्त्वपूर्ण हैं।
  • इसलिये अंततः भ्रष्टाचार को समाप्त करने की सबसे प्रभावी प्रणाली वही होगी, जिसमें नागरिकों को राज्य से प्रासंगिक सूचना प्राप्त करने का अधिकार होगा।
  • हम कह सकते हैं कि सरकार की प्रणाली और प्रक्रिया में पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिये सूचना तक पहुँच सुनिश्चित करना एक आवश्यक कदम है। जब सरकार की प्रणाली और प्रक्रिया पारदर्शी होती है तो वहाँ भ्रष्टाचार कीसंभावना काफी कम हो जाती है।

पृष्ठभूमि

  • सूचना के अधिकार से संबंधित पहला कानून वर्ष 1766 में स्वीडन द्वारा लागू किया गया था, इसके बाद वर्ष 1966 में अमेरिका ने भी इस संबंध में एक कानून अपना लिया, वर्ष 1990 आते-आते सूचना के अधिकार से संबंधी कानून लागू करने वाले देशों की संख्या बढ़कर 13 हो गई थी।
  • भारत में इस संबंध में कानून बनाने के लिये आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1987 में तब हुई जब राजस्थान के कुछ मज़दूरों को उनके असंतोषजनक प्रदर्शन का हवाला देते हुए वेतन देने से इनकार कर दिया।
  • भ्रष्टाचार की आशंका को देखते हुए मज़दूरों के हक में लड़ रहे मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) ने स्थानीय अधिकारियों से संबंधित दस्तावेज़ प्रस्तुत करने की मांग की।
  • सार्वजानिक विरोध प्रदर्शन के बाद जब प्रासंगिक दस्तावेज़ उपलब्ध कराए गए तो सरकारी अधिकारियों द्वारा किया गया भ्रष्टाचार भी सामने आ गया।
  • समय के साथ यह आंदोलन और ज़ोर पकड़ता गया और जल्द ही सूचना के अधिकार (RTI) की मांग करते हुए इस आंदोलन ने देशव्यापी रूप ले लिया।
  • आंदोलन को बड़ा होते देख सरकार ने सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम, 2002 पारित कर दिया, जिसने आगे चलकर वर्ष 2005 में सूचना के अधिकार अधिनियम का रूप लिया।
  • वर्ष 2005 में पुणे पुलिस स्टेशन को RTI के तहत पहली याचिका प्राप्त हुई थी।

सूचना के अधिकार अधिनियम की चुनौतियाँ

  • यह अधिनियम आम लोगों को प्रासंगिक जानकारी प्राप्त करने का अधिकार देता है, किंतु निरक्षरता और जागरूकता की कमी के कारण भारत में अधिकांश लोग इस अधिकार का प्रयोग नहीं कर पाते हैं।
  • कई लोग मानते हैं कि इस अधिनियम में प्रावधानों का उल्लंघन करने की स्थिति में जो जुर्माना/दंड दिया गया है वह इतना कठोर नहीं है कि लोगों को इस कार्य से रोक सके।
  • इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त जन जागरूकता का अभाव, सूचनाओं को संग्रहीत करने और प्रचार-प्रसार करने हेतु उचित प्रणाली का अभाव, सार्वजनिक सूचना अधिकारियों (PIOs) की अक्षमता और नौकरशाही मानसिकता आदि को सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के कार्यान्वयन में बड़ी बाधा माना जाता है।

आगे की राह

  • सरकार के कार्यालयों और विभागों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और भ्रष्टाचार से निपटने के लिये सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 एक मज़बूत उपाय साबित हुआ है।
  • यह कानून स्वतंत्र भारत मे पारित सबसे सशक्त और प्रगतिशील कानूनों में से एक है।
  • भ्रष्टाचार से मुकाबले के लिये एक कारगर उपाय होने के बावजूद यह कानून कई समस्याओं और चुनौतियों का सामना कर रहा है, और इस कानून की प्रभावशीलता बनाए रखने के लिये इन समस्याओं और चुनौतियों को जल्द-से-जल्द संबोधित करना आवश्यक है।

स्रोत: द हिंदू

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