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COVID-19 के आर्थिक प्रभाव का मूल्यांकन: DSGE मॉडल

  • 03 Sep 2020
  • 5 min read

प्रिलिम्स के लिये

डायने मिक स्टोकैस्टिक जनरल इक्विलिब्रियम मॉडल

मेन्स के लिये 

COVID-19 का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले COVID-19 और लॉकडाउन के संभावित प्रभावों का एक अस्थायी और अनुमानित मूल्यांकन प्रदान करने के लिये ‘डायनेमिक स्टोकैस्टिक जनरल इक्विलिब्रियम’ (Dynamic Stochastic General Equilibrium- DSGE) मॉडल का उपयोग कर रहा है।

प्रमुख बिंदु

DSGE मॉडल:

  • DSGE मॉडलिंग समष्टि अर्थव्यवस्था अर्थात् मैक्रो इकॉनॉमिक्स में प्रयुक्त होने वाली एक विधि है जो आर्थिक विकास और व्यापार चक्र एवं आर्थिक नीति के प्रभावों को समझाने के लिये एप्लाइड जनरल इक्विलिब्रियम थ्योरी (General Equilibrium Theory) तथा आर्थिक सिद्धांतों पर आधारित इकोनोमेट्रिक मॉडल (Econometric Model) के माध्यम से आर्थिक घटनाओं को स्पष्ट करती है।
    • इकोनोमेट्रिक, आर्थिक संबंधों को अनुभवजन्य सामग्री प्रदान करने के लिये आर्थिक आँकड़ों हेतु सांख्यिकीय विधियों का अनुप्रयोग है।
    • जनरल इक्विलिब्रियम थ्योरी एक व्यापक आर्थिक सिद्धांत है जो यह बताता है कि अर्थव्यवस्था में बाज़ार के साथ मांग और आपूर्ति किस प्रकार गतिशील रूप से कार्य करती है और अंततः कीमतों के संतुलन यानी इक्विलिब्रियम में परिणत हो जाती है।
  • RBI ने लोगों, फर्मों और सरकार को अर्थव्यवस्था के तीन मुख्य वाहक माना है।
  • लॉकडाउन के कारण, लोगों को घर पर रहना पड़ता है, जिससे फर्मों में श्रम की आपूर्ति कम हो जाती है और गैर-आवश्यक वस्तुओं की अनुपलब्धता के कारण खपत और आय में गिरावट आती है।

DSGE मॉडल के अंतर्गत संभावित स्थिति:

  • पहला परिदृश्य लॉकडाउन-I, इसने श्रम आपूर्ति और इसकी उत्पादकता को कम करके अर्थव्यवस्था के आपूर्ति पक्ष को बुरी तरह से प्रभावित किया।
  • दूसरा परिदृश्य यानी लॉकडाउन-II, इसमें सीमांत लागत में वृद्धि हुई यानी किसी एक वस्तु या सेवा की एक और इकाई के उत्पादन में लगने वाली अतिरिक्त लागत।
    • पहले और दूसरे दोनों परिदृश्यों में मुद्रास्फीति की दर में कटौती होने की संभावना है।
    • पहले परिदृश्य में उत्पादन में हुई कटौती कम गंभीर है, लेकिन कोरोना वायरस के संक्रमण में हुई वृद्धि के कारण मांग में अधिक संकुचन दिखाई देता है।
    • दूसरे परिदृश्य में, कंपनियाँ उत्पादन पर अंकुश लगाएंगी क्योंकि लाभ प्रभावित होगा, मज़दूरी में कम वृद्धि होगी और अर्थव्यवस्था एक बड़े संकुचन के दौर से गुजरेगी।
    • हालाँकि लॉकडाउन के दौरान महामारी की चपेट में आए लोगों के ठीक होने की दर तीव्र है क्योंकि लॉकडाउन के अनुपालन के चलते लोग एक दूसरे के संपर्क में अधिक नहीं आ पाए।
  • RBI ने उपरोक्त दोनों परिदृश्यों के लिये DSGE मॉडल की जाँच यह मानकर की है कि: 
    • अगस्त 2020 की दूसरी छमाही में COVID-19 संक्रमण अपने चरम पर रहा।
    • जब अर्थव्यवस्था सबसे बुरी तरह प्रभावित होती है, तो उत्पादन अंतराल (वास्तविक और संभावित उत्पादन के बीच का अंतर) संभावित उत्पादन के लगभग 12% तक कम हो जाता है।
  • दोनों लॉकडाउन की स्थितियों में, 2020-21 की अप्रैल-जून की तिमाही में आर्थिक गतिविधियाँ निचले स्तर पर पहुँच गई और फिर इसमें सुधार देखने को मिला।
  • तीसरे परिदृश्य में जब सरकार लॉकडाउन लागू नहीं करती है, महामारी बहुत व्यापक रूप धारण करते हुए तेज़ी से फैलती है और जनवरी 2021 की दूसरी छमाही में अर्थव्यवस्था की विकास दर बहुत धीमी गति से रिकवरी करती है।
    • यह स्थिति लगातार श्रम की कमी का कारण बनेगी और आपूर्ति के प्रभावित होने से मुद्रास्फीति बढ़ेगी और उत्पादन में कमी आएगी।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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