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जीव विज्ञान और पर्यावरण

कृषि पशुओं की वृद्धि के लिये प्रयुक्त एंटीबायोटिक्स से सुपरबग का खतरा

  • 12 Oct 2018
  • 7 min read

चर्चा में क्यों?

  • दुनिया की सबसे बड़ी एनिमल ड्रग्स कंपनी पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया गया है। कंपनी पर बिक्री के लिये वैश्विक स्तर पर प्रतिबंधित दवाओं को बेचने तथा उपभोक्ताओं को ‘जोखिम के उच्च स्तर’ पर लाने का आरोप लगाया गया है।
  • ज़ोएटिस (Zoetis) पशु चिकित्सा से संबंधित दवाओं का सबसे बड़ा उत्पादक है जो भारतीय किसानों को एंटीबायोटिक्स की आपूर्ति कर रहा है ताकि उनके पशु तेज़ी से बढ़ सकें।
  • वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) का कहना था कि इन एंटीबायोटिक्स को दुनिया भर में प्रतिबंधित किया जाना चाहिये क्योंकि ये प्रतिरोधी जीवाणुओं के प्रसार को बढ़ाते हैं जो मनुष्यों को संक्रमित कर सकते हैं तथा घातक एवं अप्रत्याशित संक्रमण का कारण बन सकते हैं।

नेफ्टिन-टी (Neftin-T)

  • ज़ोएटिस भारत में नेफ्टिन-टी बेच रही है जिसमें एंटीबायोटिक टाइलोसिन शामिल है।
  • ज़ोएटिस वज़न बढ़ाने और चारा रूपांतरण दर (Feed Conversion Rate-FCR) में सुधार लाने के लिये मुर्गियों को नेफ्टिन-टी खिलाने की सलाह देती है।
  • टायलोसिन न केवल पशु स्वास्थ्य के लिये संकटपूर्ण है बल्कि यूरोपीय संघ में उपयोग के लिये इसे प्रतिबंधित कर दिया गया है।
  • यह प्रतिबंध एरिथ्रोमाइसिन के प्रतिरोध से उत्पन्न भय के कारण लगाया गया है, जिसका उपयोग छाती के संक्रमण और अन्य मानव रोगों के इलाज के लिये किया जाता है।
  • डब्ल्यूएचओ ने एरिथ्रोमाइसिन को मानव स्वास्थ्य के लिये खतरा बताया है।

यूएस के दोहरे मापदंड का खुलासा

  • ज़ोएटिस ने यू.एस. में सार्वजनिक रूप से नए कानूनों का समर्थन किया है जो एंटीबायोटिक्स के दुरुपयोग पर प्रतिबंध लगा रहे हैं।
  • हालाँकि भारतीय वेबसाइट पर यह दावा किया गया है कि भारतीय किसान अपने जानवरों की तेज़ी से वृद्धि और विकास के लिये इन एंटीबायोटिक दवाओं को सीधे कंपनी से खरीद सकते हैं।
  • इससे स्पष्ट होता है कि ज़ोएटिस अमेरिका में उपभोक्ताओं को जोखिम से बचाने की इच्छुक दिखाई देती है लेकिन भारत के लिये यह दोहरा मापदंड अपना रही है।
  • मानव चिकित्सा और कृषि में एंटीबायोटिक्स का अनावश्यक उपयोग, जैसे कि बीमारी के इलाज की बजाय पशुओं का तेज़ी से विकसित करने के लिये इनका उपयोग प्रतिरोधी बैक्टीरिया के बढ़ते स्तरों में प्रमुख योगदानकर्त्ता है।
  • डब्ल्यूएचओ, द वर्ल्ड आर्गेनाईजेशन फॉर एनिमल हेल्थ (OIE) तथा खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने कृषि के लिये उपयोग में लाए जाने वाले पशुओं को मोटा (स्थूल) करने के लिये प्रयुक्त एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग पर विश्वव्यापी प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
  • प्रतिरोध के बढ़ते खतरे को रोकने हेतु यूरोपीय संघ और अमेरिका में इनके उपयोग पर पहले से ही प्रतिबंध लगा दिया गया है।

स्वास्थ्य पर एंटीबायोटिक्स के खतरे

  • गौरतलब है कि आज से लगभग 88 वर्ष पहले कई बीमारियों से लड़ने के लिये चिकित्सा जगत में कोई कारगर दवा नहीं थी। लेकिन एंटीबायोटिक के अविष्कार ने चिकित्सा जगत को एक मैजिक बुलेट्स थमा दी।
  • 20वीं सदी की शुरुआत से पहले सामान्य और छोटी बीमारियों से भी छुटकारा पाने में महीनों लगते थे, लेकिन एंटीबायोटिक दवा खाने के बाद उनसे एक सप्ताह से भी कम समय में छुटकारा मिलने लगा।
  • लेकिन विज्ञान यहाँ भी वरदान के साथ-साथ अभिशाप होने के अपने गुण को चरितार्थ कर गया, एंटीबायोटिक का धड़ल्ले से प्रयोग होने लगा। एंटीबायोटिक दवाओं का अधिक सेवन स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। जो लोग एंटीबायोटिक दवाओं का अधिक और अनियमित रूप से सेवन कर रहे हैं, उनमें दवा का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो रहा है।
  • विदित हो कि प्रत्यके व्यक्ति एक सीमित स्तर तक ही एंटीबायोटिक ले सकता है इससे अधिक एंटीबायोटिक लेने से मानव शरीर एंटीबायोटिक के प्रति अक्रियाशील हो जाता है।
  • किसी नए प्रकार के आक्रमण से बचाव के लिये एक अलग प्रकार का प्रतिरोध विकसित करना प्रत्येक जीव का स्वाभाविक गुण है और बैक्टीरिया के साथ भी यही हुआ है और उसको यह मौका उपलब्ध कराया है एंटीबायोटिक के अत्यधिक उपयोग ने।
  • विदित हो कि थाईलैंड-कंबोडिया की सीमा पर एक प्रकार का मलेरिया का जीवाणु पाया जाता है, जिसने दवाओं के खिलाफ़ अब प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर ली है। सुपरबग भी ऐसा ही विकसित बैक्टीरिया है।
  • डब्ल्यूएचओ ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिये एंटीबायोटिक प्रतिरोध को सबसे बड़ा खतरा बताया है।

चिंताजनक आँकड़े

  • एक अनुमान के मुताबिक, देश में प्रतिवर्ष 1,00,000 बच्चे प्रतिरोधी बग के संक्रमण से मर जाते हैं।
  • पूरी दुनिया में भारत सबसे ज़्यादा एंटीबायोटिक का इस्तेमाल करता है।
  • एक अध्ययन के मुताबिक, ‘एंटीबायोटिक प्रतिरोध’ 2050 तक दुनिया की सबसे बड़ी महामारी बन जाएगी।
  • गौरतलब है कि अभी हर साल कैंसर से पूरी दुनिया में 80 लाख लोगों की मौत हो जाती है। लेकिन 2050 तक ‘एंटीबायोटिक प्रतिरोध’ की वज़ह से हर साल 1 करोड़ लोगों की मौत होगी, यानी यह कैंसर से भी बड़ा खतरा बन सकता है।
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