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भारतीय राजनीति

दल-बदल विरोधी कानून

  • 21 Oct 2023
  • 13 min read

प्रिलिम्स के लिये:

दल-बदल विरोधी कानून, सर्वोच्च न्यायालय (SC), संविधान की दसवीं अनुसूची, संसद सदस्य, 52वाँ संशोधन अधिनियम, 1985, 91वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2003

मेन्स के लिये:

दल-बदल विरोधी कानून, वैधानिक, नियामक और विभिन्न अर्द्ध-न्यायिक निकाय, विभिन्न अंगों के मध्य शक्तियों का पृथक्करण, संशोधन

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्यमंत्री और अन्य विधायकों के विरुद्ध दल-बदल विरोधी प्रक्रिया को लंबा खींचने के लिये महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष को फटकार लगाई।

  • न्यायालय ने अयोग्यता की कार्यवाही की प्रगति में कमी पर असंतोष व्यक्त किया और अध्यक्ष से दो महीने के अंदर निर्णय लेने का आग्रह किया।
  • इससे पहले न्यायालय ने स्पीकर को संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता की कार्यवाही को पूरा करने के लिये एक समय-सीमा तय करने का निर्देश दिया था।

पृष्ठभूमि:

  • वर्ष 2022 में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार को गिरा दिया गया और उसकी जगह दूसरी सरकार का गठन हुआ, जिसमें शिवसेना का एक गुट शामिल था। शिवसेना से अलग हुए गुट के नेता एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के नए मुख्यमंत्री बने।
  • इसके बाद ठाकरे समूह द्वारा महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल के इस्तीफे से पूर्व विश्वास प्रस्ताव के निर्णय को चुनौती देते हुए याचिकाएँ दायर की गईं।
  • अयोग्यता की स्थिति में न केवल शिवसेना विधायकों पर बल्कि मुख्यमंत्री के रूप में शिंदे के पद पर भी इसका असर पड़ेगा।

दल-बदल विरोधी कानून:

  • परिचय:
    • दल-बदल विरोधी कानून एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने पर संसद सदस्यों (सांसदों)/विधानसभा सदस्यों (विधायकों) को दंडित करता है।
    • विधायकों को दल बदलने से हतोत्साहित करके सरकारों में स्थिरता लाने के लिये संसद ने वर्ष 1985 में इसे संविधान की दसवीं अनुसूची के रूप में जोड़ा।
      • दसवीं अनुसूची - जिसे दल-बदल विरोधी अधिनियम के नाम से जाना जाता है, को 52वें संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से संविधान में शामिल किया गया था।
    • यह किसी अन्य राजनीतिक दल में दल-बदल के आधार पर निर्वाचित सदस्यों की अयोग्यता के प्रावधान निर्धारित करता है।
      • यह वर्ष 1967 के आम चुनावों के बाद पार्टी छोड़ने वाले विधायकों द्वारा कई राज्य सरकारों को गिराने की प्रतिक्रिया थी।
  • इसके तहत सांसद/विधायकों को दंडित नहीं किया जाता:
    • हालाँकि, यह सांसदों/विधायकों को दल-बदल के लिये दंड के बिना किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल होने (विलय) की अनुमति देता है। साथ ही दल-बदल करने वाले सांसदों का समर्थन या उन्हें स्वीकार करने के लिये राजनीतिक दलों को दंडित नहीं किया जाता है।
      • वर्ष 1985 के अधिनियम के अनुसार, किसी राजनीतिक दल के एक-तिहाई निर्वाचित सदस्यों द्वारा 'दल-बदल' को 'विलय' माना जाता था।
      • लेकिन 91वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा इसमें बदलाव कर दिया गया और अब कानून की नज़र में वैधता के लिये किसी पार्टी के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्यों को "विलय" के पक्ष में होना अनिवार्य है।
    • कानून के तहत अयोग्य घोषित सदस्य किसी भी राजनीतिक दल से उसी सदन की एक सीट के लिये चुनाव लड़ सकता है
    • दल-बदल के आधार पर अयोग्यता से संबंधित मामलों पर निर्णय ऐसे सदन के सभापति अथवा अध्यक्ष को प्रेषित किया जाता है, यह प्रक्रिया 'न्यायिक समीक्षा' के अधीन है।
      • हालाँकि कानून ऐसी कोई समय-सीमा नहीं निर्धारित करता है जिसके भीतर पीठासीन अधिकारी को दल-बदल मामले का फैसला करना अनिवार्य होता है।
  • दल-बदल का आधार:
    • स्वैच्छिक त्याग: यदि कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से किसी राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ना चाहता है।
    • निर्देशों का उल्लंघन: यदि कोई निर्वाचित सदस्य अपने राजनीतिक दल अथवा ऐसा करने के लिये अधिकृत किसी भी व्यक्ति द्वारा पूर्व अनुमोदन के बिना जारी किये गए किसी आदेश के विपरीत ऐसे सदन में मतदान करता है अथवा मतदान से अनुपस्थित रहता है।
    • निर्वाचित सदस्य: यदि कोई स्वतंत्र रूप से निर्वाचित सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है।
    • मनोनीत सदस्य: यदि कोई नामांकित सदस्य छह महीने की समाप्ति के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है।

दलबदल का राजनीतिक व्यवस्था पर प्रभाव:

  • चुनावी जनादेश का उल्लंघन:
    • जो विधायक एक पार्टी के लिये चुने जाते हैं और फिर मंत्री पद या वित्तीय लाभ के प्रलोभन के कारण दूसरी पार्टी में जाना अधिक सुविधाजनक समझते हैं तथा पार्टी बदल लेते हैं, इसे दल-बदल के रूप में जाना जाता है, यह चुनावी जनादेश का उल्लंघन माना जाता है।
  • सरकार के सामान्य कामकाज़ पर प्रभाव:
    • कुख्यात "आया राम, गया राम" नारा 1960 के दशक में विधायकों द्वारा लगातार दल-बदल की पृष्ठभूमि में गढ़ा गया था।
    • दल-बदल के कारण सरकार में अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न होती है और प्रशासन प्रभावित होता है।
  • हॉर्स ट्रेडिंग को बढ़ावा:
    • दल-बदल विधायकों की खरीद-फरोख्त/हॉर्स ट्रेडिंग को बढ़ावा देता है जो स्पष्ट रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्था के जनादेश के खिलाफ है।

दल-बदल विरोधी कानून की चुनौतियाँ:

  • कानून का पैराग्राफ 4:
    • दल-बदल विरोधी कानून के पैराग्राफ 4 में कहा गया है कि यदि कोई राजनीतिक दल किसी अन्य दल में विलय करता है, तो उसके सदस्य अपनी सीटें नहीं खोएंगे।
      • लेकिन इस विलय के लिये सदन में उस पार्टी के पास कम-से-कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन होना ज़रूरी है। कानून यह नहीं बताता कि विलय करने वाली पार्टी का राष्ट्रीय या क्षेत्रीय स्तर पर आधार है या नहीं।
  • प्रतिनिधि एवं संसदीय लोकतंत्र को कमज़ोर करना:
    • कानून बनने के बाद सांसद या विधायक को पार्टी के निर्देशों का आँख मूंदकर पालन करना पड़ता है और उन्हें अपने निर्णय से वोट देने की आज़ादी नहीं होती है।
    • दल-बदल विरोधी कानून ने विधायकों को मुख्य रूप से उनके राजनीतिक दल के प्रति ज़िम्मेदार ठहराकर जवाबदेही की शृंखला को बाधित कर दिया है।
  • अध्यक्ष की विवादास्पद भूमिका:
    • दल-बदल विरोधी मामलों में सदन के सभापति या अध्यक्ष के निर्णय की समय-सीमा से संबंधित कानून में कोई स्पष्टता नहीं है।
    • कुछ मामलों में छह महीने और कुछ में तीन वर्ष भी लग जाते हैं। कुछ ऐसे मामले भी हैं जो अवधि समाप्त होने के बाद निपटाए जाते हैं।
  • विभाजन की कोई मान्यता नहीं:
    • 91वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम 2004 के कारण दल-बदल विरोधी कानून ने दल-बदल विरोधी शासन को एक अपवाद बनाया।
      • हालाँकि यह संशोधन किसी पार्टी में 'विभाजन' को मान्यता नहीं देता है बल्कि इसके बजाय 'विलय' को मान्यता देता है।
  • केवल सामूहिक दल-बदल की अनुमति:
    • यह सामूहिक दल-बदल (एक साथ कई सदस्यों द्वारा दल परिवर्तन) की अनुमति देता है लेकिन व्यक्तिगत दल-बदल (बारी-बारी से या एक-एक करके सदस्यों द्वारा दल परिवर्तन) की अनुमति नहीं देता। अतः इसमें निहित खामियों को दूर करने के लिये संशोधन की आवश्यकता है।
    • उन्होंने चिंता जताई कि यदि कोई राजनेता किसी पार्टी को छोड़ता है, तो वह ऐसा कर सकता है, लेकिन उस अवधि के दौरान उसे नई पार्टी में कोई पद नहीं दिया जाना चाहिये।
  • बहस एवं चर्चा पर प्रभाव: 
    • बहस और चर्चा को बढ़ावा देने के बजाय भारत के दल-बदल विरोधी कानून ने पार्टियों और आँकड़ों पर आधारित लोकतंत्र का निर्माण किया है।
    • इससे संसद में किसी भी कानून पर होने वाली बहस कमज़ोर हो जाती है तथा असहमति (Dissent) एवं दलबदल (Defection) के बीच अंतर नहीं रह जाता।

आगे की राह:

  • कई विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि कानून केवल उन वोटों के लिये मान्य होना चाहिये जो सरकार की स्थिरता का निर्धारण करते हैं। उदाहरणतः वार्षिक बजट का अनुमोदन अथवा अविश्वास प्रस्ताव पारित होना।
  • राष्ट्रीय संविधान प्रकार्य समीक्षा आयोग (NCRWC) सहित विभिन्न आयोगों ने सिफारिश की है कि किसी सदस्य को अयोग्य घोषित करने का निर्णय पीठासीन अधिकारी के बजाय राष्ट्रपति (सांसदों के मामले में) अथवा राज्यपाल (विधायकों के मामले में) द्वारा चुनाव आयोग की सलाह पर किया जाना चाहिये।
  • होलोहन के फैसले में न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा कि अध्यक्ष का कार्यकाल सदन में बहुमत के निरंतर समर्थन पर निर्भर है और इसलिये वह ऐसे स्वतंत्र न्यायिक प्राधिकरण की आवश्यकता को पूरा नहीं करता है।
  • होलोहन के फैसले में न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा कि अध्यक्ष ऐसे स्वतंत्र न्यायिक प्राधिकरण के मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं क्योंकि उनका कार्यकाल सदन में बहुमत के निरंतर समर्थन पर निर्भर है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्षों के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. भारत के संविधान की निम्नलिखित अनुसूचियों में से किसमें दल-बदल विरोधी प्रावधान हैं? (2014)

(a) दूसरी अनुसूची
(b) पाँचवीं अनुसूची
(c) आठवीं अनुसूची
(d) दसवीं अनुसूची

उत्तर: (d)


मेन्स:

प्रश्न. कुछ वर्षों से सांसदों की व्यक्तिगत भूमिका में कमी आई है जिसके फलस्वरूप नीतिगत मामलों में स्वस्थ रचनात्मक बहस प्रायः देखने को नहीं मिलती। दल परिवर्तन विरोधी कानून, जो भिन्न उद्देश्य से बनाया गया था, को कहाँ तक इसके लिये उत्तरदायी माना जा सकता है? (2013)

प्रश्न. ‘एकदा स्पीकर, सर्वदा स्पीकर’! क्या आपके विचार में लोकसभा अध्यक्ष पद की निष्पक्षता के लिये इस कार्यप्रणाली को स्वीकारना चाहिये? भारत में संसदीय प्रयोजन की सुदृढ़ कार्यशैली के लिये इसके क्या परिणाम हो सकते हैं? (2020)

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