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जीव विज्ञान और पर्यावरण

संरक्षण हेतु पक्षियों का चुनाव (selection of Birds for conservation)

  • 17 Nov 2018
  • 4 min read

संदर्भ

ट्रेंड के तौर पर महाराष्ट्र के कुछ शहरों में लोगों ने पक्षियों को आइकॉन के रूप में चुनना शुरू किया है ताकि उन्हें संरक्षित करने हेतु उचित कदम उठाया जा सके। इस प्रकार पूरे शहर द्वारा सबसे ज़्यादा पसंद किया गया पक्षी उस शहर का प्रतिनिधित्व करेगा।

महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • 54 दिनों के अथक अभियान के बाद इसी वर्ष स्वतंत्रता दिवस के मौके पर महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में वर्धा के लोगों ने नीलपंख या इंडियन रोलर को अपने शहर का आइकॉन चुना।
  • चयन की प्रक्रिया बहर नेचर फाउंडेशन और वर्धा नगर निगम द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित की गई थी जिसे मतदान द्वारा संपन्न किया गया।
  • यहाँ तक ​​कि वर्धा से बाहर रहने वाले 3,621 प्रवासियों द्वारा ऑनलाइन मतदान भी किया गया था।
  • इस दावेदारी हेतु अन्य पक्षी इस प्रकार हैं-
  1. श्वेतकण्ठ कौड़िल्ला (White-Throated Kingfisher)
  2. ब्लैक-विंग काइट (The Black-Winged Kite)
  3. स्पॉटेड आउलेट (The Spotted Owlet)
  4. कॉपरस्मिथ बार्बेट (the coppersmith barbet)
  • कुल मिलाकर 51,267 मत डाले गए थे जिसमें से 29,865 मतों के साथ नीलपंख स्पष्ट रूप से विजेता रहा। श्वेतकण्ठ को 6,950 मत, ब्लैक-विंग काइट को 4,886 मत, जबकि स्पॉटेड आउलेट और कॉपरस्मिथ बार्बेट दोनों में प्रत्येक को 4,805 मत मिले।
  • प्रसिद्घ पक्षी विज्ञानी और वन्यजीवन संरक्षणवादी मारुती चितम्पल्ली ने विजेता की घोषणा की।
  • शहर का बर्ड आइकॉन चुनने वाला वर्धा महाराष्ट्र का दूसरा, जबकि विदर्भ क्षेत्र में पहला शहर है।
  • सबसे पहले कोंकण के सतवंतवाड़ी शहर ने दो साल पहले अपना बर्ड आइकॉन चुना था।
  • महाराष्ट्र के अन्य शहर जैसे-जलगाँव और उमरखेड़ भी इसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं।
  • इस नए प्रयोग ने प्रकृति, पक्षियों और उन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता के प्रति बहुत ज़्यादा रुचि पैदा की है।
  • अद्वितीय चुनाव, वाल पेंटिंग, पक्षी विहार, फोटो प्रदर्शनी, साइकिल रैली और ‘नो योर सिटी बर्ड्स’ जैसे अनूठे कार्यक्रमों के माध्यम से जोर-शोर से प्रचार प्रसार किया गया था।
  • वर्धा के सांसद, महापौर, कलेक्टर और शीर्ष पुलिस अधिकारियों ने भी इस कार्यक्रम को प्रोत्साहन दिया था।
  • खास बात यह है कि शहर के सुविधाजनक स्थान पर नीलपंख पक्षी की एक मूर्ति स्थापित किये जाने का प्रस्ताव भी है।

निष्कर्ष

भारत पक्षियों की सुरक्षा तथा संरक्षण की दिशा में आज भी दुनिया के कई देशों से बहुत पीछे है। जिस भूखंड का वातावरण तथा जलवायु जीवन के अनुकूल हो और वहाँ हरे-भरे पेड़ पौधे तथा वनस्पतियाँ पाई जाती हों, वहाँ पक्षियों के साथ-साथ अन्य जीव−जंतुओं का पाया जाना सुखद होता है। किसी भी क्षेत्र विशेष में पक्षियों और जीव−जंतुओं की उपस्थिति से वहाँ की जलवायु का ठीक-ठाक अनुमान लगाया जा सकता है।

भारत जैसे देश में ऐसे नए प्रयासों का स्वागत किया जाना चाहिये तथा पक्षियों के संरक्षण हेतु शुरू किये गए इस प्रयोग को पूरे भारत में बढ़ावा दिया जाना चाहिये।

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