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एनबीएफसी के विनियमन के लिये 4- टियर स्ट्रक्चर

  • 25 Jan 2021
  • 8 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India- RBI) द्वारा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (Non-Banking Financial Companies- NBFC) के विनियमन में प्रगतिशील वृद्धि के साथ एक चार स्तरीय संरचना का निर्माण करके एक सख्त नियामक ढांँचा प्रस्तावित किया गया है।

  • इस ढाँचे में 180 से 90 दिनों के अतिदेय (Overdue) पर बेस लेयर (Base Layer) की गैर-निष्पादित संपत्तियों (Non Performing Assets- NPAs) के वर्गीकरण का भी प्रस्ताव दिया गया है।
  • इससे पहले वर्ष 2020 में RBI ने NBFCs को तरलता सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से कई उपायों की घोषणा की थी।
  • नोट:
  • भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के अध्याय III (B), (C) और अध्याय V के अंतर्गत निहित प्रावधानों के तहत RBI के गैर-बैंकिंग पर्यवेक्षण (DNBS) विभाग को NBFCs के विनियमन और पर्यवेक्षण की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।
  • RBI के नियामक और पर्यवेक्षक ढाँचे द्वारा अन्य वस्तुओं के साथ-साथ NBFCs का पंजीकरण, उनकी विभिन्न श्रेणियों का विवेकपूर्ण विनियमन, NBFCs द्वारा जमा की स्वीकृति के संबंध में दिशा-निर्देश जारी करना तथा आंतरिक एवं बाह्य रूप से इस क्षेत्र की निगरानी और पर्यवेक्षण करना शामिल है। 
  • जमा लेने वाली NBFCs और ‘सिस्टमेटिकली इंपोर्टेंट ‘नॉन-डिपॉज़िट एक्सेप्टिंग कंपनीज़’ (Systemically Important Non-Deposit Accepting)  के विनियमन और पर्यवेक्षण की अधिक आवश्यकता है।
  • विनियमन और पर्यवेक्षण का मुख्य केंद्र तीन बिंदुओं पर है, जिनमें जमाकर्त्ता का संरक्षण,  उपभोक्ता संरक्षण और वित्तीय स्थिरता शामिल हैं।
  • RBI को दंडात्मक कार्रवाई करने के लिये RBI अधिनियम, 1934 के तहत भी अधिकार प्राप्त है, जिसमें पंजीकरण प्रमाण पत्र को रद्द करना, जमा स्वीकार करने से संबंधित प्रतिबंधात्मक आदेश जारी करना, आपराधिक मामले दर्ज करना या गंभीर मामलों में कंपनी अधिनियम के प्रावधानों के तहत याचिका दायर करना शामिल है।

प्रमुख बिंदु:

उद्देश्य:  

  • प्रस्तावित ढांँचे का उद्देश्य वित्तीय स्थिरता की रक्षा करना तथा इस बात को सुनिश्चित करना है कि छोटी NBFCs आसान नियमों के साथ आगे बढ़ रहीं हों।

NBFCs का प्रस्तावित वर्गीकरण (चार स्तरीय संरचना):   प्रस्तावित नियामक ढाँचे के अनुसार, NBFCs का नियामक और पर्यवेक्षी ढांँचा चार-स्तरीय संरचना पर आधारित है जो इस प्रकार है:

  • बेस लेयर:
    • बेस लेयर की NBFCs को एनबीएफसी-बेस लेयर (NBFC-BL)) के रूप में जाना जाएगा।
    • इस लेयर की NBFCs के लिये कम-से-कम विनियामक हस्तक्षेप को मंज़ूरी प्रदान की गई है।
  • मिडिल लेयर:
    • मिडिल लेयर में NBFCs को NBFC- मिडिल लेयर (NBFC-ML) के रूप में जाना जाएगा
    • बेस लेयर की तुलना में इस लेयर के लिये नियामक व्यवस्था सख्त होगी।
    • ‘सिस्टमेटिक रिस्क स्पिल ओवर्स (Systemic Risk Spill-Overs) को कम करने के लिये इस लेयर में शामिल होने वाली NBFCs के लिये प्रतिकूल विनियामक मध्यस्थता बैंक द्वारा की जा सकता है।
  • अपर लेयर:
    • अपर लेयर की NBFCs को NBFC- अपर लेयर (NBFC-UL) के रूप में जाना जाएगा जो एक नई नियामक संरचना को आमंत्रित करेगा।
    • यह लेयर NBFCs द्वारा संचालित होगी जिसमें जोखिम को व्यवस्थित करने और वित्तीय स्थिरता को प्रभावित करने की क्षमता है।
    • वर्तमान में इस लेयर के समान कोई नहीं लेयर है अत: यह विनियमन के लिये एक नई लेयर होगी। इस लेयर में शामिल होने वाली NBFCs के लिये विनियामक ढांँचा उपयुक्त और उचित संशोधनों के साथ बैंक जैसा ही होगा।
    • यदि यह पाया गया कि NBFC-UL द्वारा लगातार चार वर्षों तक वर्गीकरण के मानदंडों को पूरा नहीं किया गया है, तो यह संवर्द्धित नियामक ढांँचे से बाहर हो जाएगा।
  • टॉप लेयर: 
    • आदर्श रूप से इस परत को रिक्त मान लिया जाता है।
    • इस बात की भी संभावना है कि पर्यवेक्षी निर्णय (Supervisory Judgment) व्यवस्थित रूप से कुछ NBFCs को उच्च विनियमन/पर्यवेक्षण के उद्देश्य से महत्त्वपूर्ण NBFCs की टॉप लेयर से बाहर कर सकते हैं।
    • ये NBFCs अपर लेयर के शीर्ष पर एक अलग समूह के रूप में स्थापित होंगी। पिरामिड के आकार में यह टॉप लेयर तब तक रिक्त रहेगी जब तक कि पर्यवेक्षक विशिष्ट NBFCs पर विचार नहीं करेंगे।
    • पर्यवेक्षी निर्णय के अनुसार, यदि अपर लेयर में शामिल कुछ NBFCs को  अत्यधिक जोखिम उठाने के रूप में देखा जाता है, तो उन्हें उच्च और पूर्व निर्धारित नियामक/पर्यवेक्षी आवश्यकताओं के लिये रखा जा सकता है। 

गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC)

  • एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) ‘कंपनी अधिनियम, 1956’ के तहत पंजीकृत एक कंपनी है जिसके माध्यम से सरकार, स्थानीय प्राधिकरण या अन्य विपणन योग्य प्रतिभूतियों द्वारा जारी शेयर/बॉन्ड /डिबेंचर/सिक्योरिटी का अधिग्रहण एवं व्यवसाय संबंधी अग्रिम ऋण दिये जाते हैं। ये कंपनी लीजिंग, खरीद-बिक्री, बीमा व्यवसाय, चिट व्यवसाय जैसी प्रकृति की होती हैं लेकिन इनमें कोई भी ऐसी संस्था शामिल नहीं होती है, जिनका मुख्य व्यवसाय कृषि गतिविधि, औद्योगिक गतिविधि, किसी सामान की खरीद या बिक्री (प्रतिभूतियों के अलावा) एवं अचल संपत्ति की खरीद/ निर्माण से संबंधित सेवाएँ प्रदान करना है। 
  • एक गैर-बैंकिंग संस्थान जो कि एक कंपनी होती है तथा जो किसी भी योजना या व्यवस्था का एकमुश्त या किस्तों में अंशदान या किसी अन्य तरीके से जमा करने के मुख्य व्यवसाय में शामिल है वह एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी भी होती है।
  • NBFCs की विशेषताएंँ
    • NBFCs मांग जमा स्वीकार नहीं कर सकता।
    • NBFCs भुगतान और निपटान प्रणाली का हिस्सा नहीं बनते हैं और स्वयं चेक जारी नहीं कर सकते हैं।
    • NBFCs के जमाकर्त्ताओं को जमा बीमा और क्रेडिट गारंटी निगम की जमा बीमा सुविधा उपलब्ध नहीं है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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