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9 राज्यों में 22 बाँस क्लस्टर्स लॉन्च

  • 09 Sep 2020
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय बाँस मिशन   

मेन्स के लिये:

स्थानीय समुदायों के विकास में बाँस की भूमिका 

चर्चा में क्यों:  

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण, ग्रामीण विकास तथा पंचायती राज मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने 9 राज्यों (मध्य प्रदेश, असम, कर्नाटक, नगालैंड, त्रिपुरा, ओडिशा, गुजरात, उत्तराखंड व महाराष्ट्र) के 22 बाँस क्लस्टर्स की मंगलवार को वर्चुअल शुरूआत की। साथ ही राष्‍ट्रीय बाँस मिशन (NBM) के लोगो का विमोचन किया। 

भारत में बाँस उत्पादन 

  • भारत में प्रतिवर्ष लगभग 14.6 मिलियन टन बाँस का उत्पादन होता है और लगभग 70,000 किसान बाँस के रोपण के कार्य में सलंग्न हैं। देश में बाँस की लगभग 136 किस्में पाई जाती हैं।
  • भारतीय वन सर्वेक्षण रिपोर्ट-2019 के अनुसार भारत में बाँस उत्पादन के अंतर्गत 16 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र अनुमानित है।
  • मध्यप्रदेश बाँस उत्पादन के अंतर्गत सर्वाधिक क्षेत्रफल (2 मिलियन हेक्टेयर) रखता है। इसके पश्चात् महाराष्ट्र (1.54 मिलियन हेक्टेयर), अरुणाचल प्रदेश (1.49 मिलियन हेक्टेयर) और ओडिशा (1.18 हेक्टेयर) का स्थान है।
  • ISFR-2017 के अनुमानों की तुलना में बाँस के अंतर्गत क्षेत्रफल में 0.32 मिलियन क्षेत्रफल की वृद्धि हुई है। 

बाँस उद्योग 

  • बाँस उद्योग से आशय उन सभी फर्मों से है जो उच्च मूल्य वाले उत्पादों के माध्यम से बाँस के मूल्य संवर्द्धन में संलग्न हैं।  
  • देश में तीव्र सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन से कच्चे माल के रूप में बाँस का महत्त्व न केवल कुटीर उद्योगों में बढ़ा है, बल्कि बड़े उद्योगों में भी इसके महत्त्व में वृद्धि हुई है।
  • बाँस पर आधारित करीब 25,000 उद्योग 2 करोड़ लोगों को रोज़गार के अवसर प्रदान कर रहे हैं जबकि 20 लाख लोग बाँस पर आधारित दस्तकारी में संलग्न हैं। 
  • बाँस के पेड़ के आकार और मज़बूती के कारण भवन और आधारभूत ढाँचा निर्माण सामग्री के रूप में इसके उपयोग की व्यापक संभावनाएँ हैं। बाँस की दस्तकारी और बाँस पर आधारित संसाधनों का उपयोग करने वाले उद्योगों में लुगदी और कागज उद्योग अग्रणी हैं।

स्थानीय समुदायों के लिये बाँस उत्पादन का महत्त्व

  • बाँस की 50 प्रतिशत से अधिक प्रजातियाँ पूर्वी भारत में पाई जाती है। इस क्षेत्र में बाँस के बने बर्तन, मछली पकड़ने के जाल, मर्तबान, गुलदस्ते और टोकरियाँ बनाने की उत्कृष्ट सांस्कृतिक परंपरा रही है।
  • पृथ्वी पर सबसे तीव्र गति से बढ़ने वाले पौधों में से एक बाँस का उपयोग रोज़गार सृजित करने, महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और पर्यावरण की रक्षा करने के लिये  किया जा सकता है।
  • अवनयित भूमि पर उगने की क्षमता और मृदा अपरदन में कमी करने की विशेषता के कारण यह संकटग्रस्त वनों पर स्थानीय समुदायों की निर्भरता को कम करता है। 
  • यह भोजन और पशु आहार के रूप में खाद्य और पोषण सुरक्षा भी प्रदान करता है। 
  • भूकंपरोधी होने के साथ-साथ इसमें स्टील की तुलना में अधिक तन्य शक्ति होती है। यह कंक्रीट के विकल्प के रूप में उपयोग किया जा सकता है।  
  • यह ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को भी कम करता है।  
  • उपर्युक्त कई कारणों से ही बाँस को ‘गरीब आदमी की लकड़ी’ कहा जाता है।

प्रमुख सरकारी प्रयास 

  • वृक्ष की परिभाषा से बाँस को हटाने के लिये भारतीय वन अधिनियम, 1927 में वर्ष 2017 में संशोधन किया गया, जिससे किसानों को बाँस व बाँस आधारित उत्‍पादों की सुगम आवाजाही में सहायता मिली है।
  • आयात नीति में भी परिवर्तन के साथ ही बाँस मिशन की उपयोगिता को दृष्टिगत रखते हुए सरकार तेज़ी से काम कर रही है, जिससे यह व्यवसाय बढ़ रहा है और रोज़गार के अवसर भी उपलब्ध हो रहे हैं। 
  • खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग ने अगले 3-4 वर्षों में बाँस की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिये  भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बाँस वृक्षारोपण अभियान भी शुरू किया है।

राष्ट्रीय बाँस मिशन 

  • अक्तूबर 2006 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय बाँस मिशन (NBM) को राष्ट्रीय बाँस तकनीकी और व्यापार विकास रिपोर्ट, 2003 के आधार पर लॉन्च किया था। 
  • राष्ट्र्रीय बाँस मिशन का मुख्य उद्देश्य देश में बाँस उद्योग के विकास से संबंधित मुद्दों को संबोधित करना, बाँस उद्योग को नई गति एवं दिशा प्रदान करना तथा बाँस उत्पादन में भारत की संभावनाओं को साकार करना है। 
  • बहु-अनुशासनात्मक और बहुआयामी दृष्टिकोण के साथ यह मिशन संयुक्त वन प्रबंधन समितियों (JFMCs) या ग्राम विकास समितियों (VDCs) के माध्यम से योजनाबद्ध हस्तक्षेप, अनुसंधान और विकास, वन तथा गैर-वन भूमि पर वृक्षारोपण पर बल देता है। 
  • यह मिशन केंद्रीकृत और किसान/महिला नर्सरी की स्थापना करके गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री की आपूर्ति भी सुनिश्चित करता है।

लोगो का विवरण: 

Logo

  • लोगो में बाँस की छवि भारत के विभिन्न हिस्सों में बाँस की खेती को चित्रित करती है। 
  • लोगो के चारों ओर औद्योगिक पहिया बाँस क्षेत्र के औद्योगीकरण के महत्त्व को दर्शाता है। 
  • लोगो में सुनहरे पीले व हरे रंग का संयोजन दर्शाता है कि बाँस 'हरा सोना' है। 
  • आधा औद्योगिक पहिया और आधा किसान सर्कल किसानों और उद्योग दोनों के लिये बाँस के महत्त्व को दर्शाता है। 

आगे की राह 

स्थानीय उद्यमियों की प्रगति, उनका सरंक्षण और देशी उत्पाद आगे बढ़ाने के लिये बाँस उत्पादों को बढ़ावा देना महत्त्वपूर्ण है इसके लिये परंपरागत तकनीकों को बढ़ावा देना बाँस उत्पादों की निर्यात वृद्धि तथा कारीगरों का कौशल विकास महत्त्वपूर्ण उपाय हो सकते हैं।  

स्रोत: पीआईबी

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