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सामाजिक न्याय

ITBP में कॉम्बैट भूमिका में महिलाएँ

  • 11 Aug 2021
  • 11 min read

प्रिलिम्स के लिये

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस

मेन्स के लिये

कॉम्बैट भूमिका में महिलाएँ: पक्ष और विपक्ष

चर्चा में क्यों?

पहली बार ‘भारत-तिब्बत सीमा पुलिस’ (ITBP) में महिला अधिकारियों को कॉम्बैट भूमिका में कमीशन किया गया है। इसमें दो महिला अधिकारी ‘सहायक कमांडेंट’ (AC) के रूप में शामिल हुई हैं। 

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस

  • ‘भारत-तिब्बत सीमा पुलिस’ (ITBP) भारत सरकार के गृह मंत्रालय के तहत कार्यरत एक केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल है।
    • अन्य केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल हैं: असम राइफल्स (AR), सीमा सुरक्षा बल (BSF), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF), केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF), राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) और सशस्त्र सीमा बल (SSB)।
  • ITBP की स्थापना 24 अक्तूबर, 1962 को भारत-चीन युद्ध के दौरान की गई थी और यह एक सीमा रक्षक पुलिस बल है जिसके पास ऊँचाई वाले अभियानों की विशेषज्ञता है।
  • वर्तमान में ITBP लद्दाख में काराकोरम दर्रे से लेकर अरुणाचल प्रदेश के जचेप ला तक 3488 किलोमीटर भारत-चीन सीमा की सुरक्षा हेतु उत्तरदायी है।
  • ITBP को नक्सल विरोधी अभियानों और अन्य आंतरिक सुरक्षा मुद्दों के लिये भी तैनात किया जाता है।
  • ITBP को प्रारंभ में ‘केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल’ (CRPF) अधिनियम, 1949 के तहत स्थापित किया गया था। हालाँकि वर्ष 1992 में संसद ने ITBP अधिनियम लागू किया और वर्ष 1994 में इसके संबंध में नियम बनाए गए।

प्रमुख बिंदु

पृष्ठभूमि

  •  ITBP में अधिकारियों के रूप में शामिल होने वाली महिला अधिकारी पहले भी कॉम्बैट भूमिकाओं में कार्य कर चुकी हैं।
  • हालाँकि यह वर्ष 2016 में ही पहली बार हुआ था, जब ‘संघ लोक सेवा आयोग’ (UPSC) द्वारा आयोजित ‘केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल’ (CAPF) प्रवेश परीक्षा के माध्यम से कॉम्बैट अधिकारियों के रूप में महिलाओं की नियुक्ति को मंज़ूरी दी गई थी।

भारतीय सशस्त्र बलों में महिलाओं की स्थिति (रक्षा मंत्रालय के तहत):

  • थलसेना, वायु सेना और नौसेना में वर्ष 1992 में महिलाओं को शॉर्ट-सर्विस कमीशन (SSC) अधिकारियों के रूप में शामिल किया गया था।
    • यह पहली बार था जब महिलाओं को मेडिकल स्ट्रीम से अलग सेना की अन्य ब्रांचों में शामिल होने की अनुमति दी गई थी।
  • सेना में महिलाओं के लिये एक महत्त्वपूर्ण समय वर्ष 2015 में तब आया जब भारतीय वायु सेना (IAF) ने उन्हें कॉम्बैट स्ट्रीम में शामिल करने का निर्णय लिया।
  • वर्ष 2020 में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने केंद्र सरकार को सेना की गैर-कॉम्बैट सहायता इकाइयों में महिला अधिकारियों को उनके पुरुष समकक्षों के बराबर स्थायी कमीशन (PC) देने का आदेश दिया।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने महिला अधिकारियों की शारीरिक सीमा को लेकर सरकार के तर्क को ‘लैंगिक रूढ़िवादिता’ और ‘महिलाओं के विरुद्ध लिंग भेदभाव’ पर आधारित होने के रूप में खारिज कर दिया था।
    • वर्तमान में महिला अधिकारियों को भारतीय सेना में उन सभी दस स्ट्रीम्स में स्थायी कमीशन दिया गया है जहाँ महिलाओं को शॉर्ट-सर्विस कमीशन अधिकारियों के रूप में शामिल किया गया था।
    • महिलाएँ अब पुरुष अधिकारियों के समान सभी कमांड नियुक्तियाँ प्राप्त करने हेतु पात्र हैं, जो उनके लिये उच्च पदों पर पदोन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
  • वर्ष 2021 की शुरुआत में भारतीय नौसेना ने लगभग 25 वर्षों के अंतराल के बाद चार महिला अधिकारियों को युद्धपोतों पर तैनात किया था।
    • भारत का विमानवाहक पोत ‘आईएनएस विक्रमादित्य’ और फ्लीट टैंकर ‘आईएनएस शक्ति’ ऐसे पहले युद्धपोत हैं, जिन पर 1990 के दशक के बाद से पहली बार किसी महिला चालक को नियुक्त किया गया है।
  • मई 2021 में सेना ने सैन्य पुलिस कोर में महिलाओं के पहले बैच को शामिल किया था, यह पहली बार था जब महिलाएँ गैर-अधिकारी कैडर में सेना में शामिल हुई थीं।
    • हालाँकि महिलाओं को अभी भी इन्फैंट्री और आर्मर्ड कॉर्प्स जैसी लड़ाकू टुकड़ियों में शामिल होने की अनुमति नहीं है।

कॉम्बैट भूमिका में महिलाओं से संबंधित मुद्दे

  • शारीरिक संरचना संबंधी मुद्दे: महिला-पुरुष के बीच कद, ताकत और शारीरिक संरचना में प्राकृतिक विभिन्नता के कारण महिलाएँ चोटों और चिकित्सीय समस्याओं के प्रति अधिक संवेदनशील हैं।
    • पुरुषों की तुलना में अधिकांश महिलाओं में प्री-एंट्री फिज़िकल फिटनेस का स्तर कम होता है।
    • ऐसे में जब महिलाओं और पुरुषों के लिये प्रशिक्षण के समान मानक स्थापित किये जाते हैं तो महिलाओं में चोट लगने की संभावना अधिक होती है।
  • शारीरिक क्रिया संबंधी मुद्दे: मासिक धर्म और गर्भावस्था की प्राकृतिक प्रक्रियाएँ महिलाओं को विशेष रूप से युद्ध स्थितियों में कमज़ोर बनाती हैं।
    • गोपनीयता और स्वच्छता की कमी के परिणामस्वरूप संक्रमण की घटनाओं में भी वृद्धि हो सकती है।
    • इसके अलावा कठिन युद्धों में लंबे समय तक तैनाती और महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य पर शारीरिक गतिविधियों के गंभीर प्रभाव अभी भी अज्ञात हैं।
  • सामाजिक और मनोवैज्ञानिक मुद्दे: महिलाएँ अपने परिवारों, विशेषकर अपने बच्चों से अधिक जुड़ी होती हैं।
    • वह परिवार से लंबे समय तक अलगाव के दौरान अधिक मानसिक तनाव में होती हैं जो कि सामाजिक समर्थन की आवश्यकता को इंगित करता है।
    • मिलिट्री सेक्सुअल ट्रामा (MST) और महिलाओं के शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव काफी गंभीर होता है।
  • सांस्कृतिक मुद्दे: भारतीय समाज में मौजूद सांस्कृतिक बाधाएँ युद्ध में महिलाओं को शामिल करने में सबसे बड़ी रुकावट हो सकती है।

कॉम्बैट भूमिका में महिलाएँ: पक्ष

  • लिंग कोई बाधा नहीं है: जब तक कोई आवेदक किसी पद के लिये योग्य होता है, तब तक उसका लिंग कोई बाधा नहीं होता है। आधुनिक उच्च प्रौद्योगिकी, युद्ध क्षेत्र में तकनीकी विशेषज्ञता और निर्णयन कौशल साधारण शारीरिक शक्ति की तुलना में अधिक मूल्यवान होते जा रहे हैं।
  • सैन्य तत्परता: लैंगिक मिश्रण की अनुमति देने से सेना और अधिक मज़बूत होती है। रिटेंशन तथा भर्ती दरों में गिरावट से सशस्त्र बल गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। एसे में महिलाओं को लड़ाकू भूमिका में अनुमति देकर इस चुनौती से निपटा जा सकता है।
  • प्रभावशीलता: महिलाओं पर पूर्णतः और मनमाना प्रतिबंध लागू करना, सैन्य थिएटर में कमांडरों की नियुक्ति के लिये सबसे सक्षम व्यक्ति के चयन की प्रकिया को सीमित करता है।
  • परंपरा: युद्ध इकाइयों में महिलाओं के एकीकरण की सुविधा के लिये प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी। समय के साथ संस्कृतियाँ बदलती हैं और नवीन संस्कृतियाँ विकसित होती है।
  • वैश्विक परिदृश्य: वर्ष 2013 में पहली बार महिलाओं को आधिकारिक तौर पर अमेरिकी सेना में लड़ाकू पदों के लिये अनुमति दी गई थी, इस निर्णय को लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम के रूप में देखा गया था। वर्ष 2018 में ब्रिटेन की सेना ने महिलाओं के लिये युद्धक भूमिकाओं में सेवा करने पर प्रतिबंध हटा दिया, जिससे उनके लिये विशिष्ट विशेष बलों में सेवा करने का मार्ग प्रशस्त हो गया।

आगे की राह

  • महिलाओं को इस कारण से कमांड पोस्ट से बाहर रखा जा रहा था कि इस निर्णय के कारण व्यापक तौर पर सेना के संगठनात्मक ढाँचे में चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती थीं। किंतु अब समय है, जब न केवल सेना के संगठनात्मक ढाँचे को महिलाओं के अनुकूल बनाया जाए बल्कि समग्र तौर पर समाज की संस्कृति, मानदंडों और मूल्यों में भी परिवर्तन किया जाए। इन परिवर्तनों को आगे बढ़ाने का दायित्व वरिष्ठ सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व का है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़राइल, उत्तर कोरिया, फ्रांँस, जर्मनी, नीदरलैंड, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा उन वैश्विक सेनाओं में हैं, जो महिलाओं को अग्रिम पंक्ति में युद्ध की स्थिति में नियुक्त करते हैं।
  • प्रत्येक महिला को अपनी पसंद के कॅरियर का चयन करने और शीर्ष पर पहुँचने का अधिकार है, क्योंकि समानता संविधान द्वारा प्रदान किया गया एक मौलिक अधिकार है।

स्रोत: द हिंदू

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