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जैव विविधता और पर्यावरण

पंजाब में फसल अवशिष्ट दहन में वृद्धि

  • 27 May 2020
  • 6 min read

प्रीलिम्स के लिये:

हैप्पी सीडर, बायो-कोल

मेन्स के लिये:

फसल अवशिष्ट दहन समस्या 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में पंजाब में गेहूं की फसल कटाई के साथ फसल अवशिष्ट दहन की घटनाओं में वृद्धि दर्ज की गई है।

प्रमुख बिंदु:

  • सरकारी आँकड़ों के अनुसार, पंजाब में 15 अप्रैल से 24 मई के बीच फसल अवशिष्ट  दहन की कुल 13,026 घटनाएँ दर्ज की गई हैं, जबकि वर्ष 2019 तथा वर्ष 2018 में इसी दौरान ऐसी घटनाओं की संख्या क्रमश: 10,476 तथा 11,236 थी।
  • ‘पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ के अनुसार, फसल दहन की सबसे अधिक घटनाएँ मोगा ज़िले में, जबकि अमृतसर दूसरे स्थान पर है।

पराली तथा कृषि अवशिष्ट दहन:

  • पराली, धान की फसल कटने के बाद बचा बाकी हिस्सा होता है, जिसकी जड़ें ज़मीन में होती हैं। किसान धान पकने के बाद फसल का ऊपरी हिस्सा काट लेते हैं क्योंकि वही काम का होता है बाकी किसान के लिये बेकार होता है।  उन्हें अगली फसल बोने के लिये खेत खाली करने होते हैं इसके लिये सूखी पराली का दहन कर दिया जाता है। 
  • हाल ही में रबी फसल की कटाई के बाद गेहूं के अवशिष्ट दहन में वृद्धि देखी गई है।

फसल अवशिष्टों की जलाने से नुकसान:

  • गेहूं के अवशिष्टों की जलाने से पर्यावरण को प्रदूषित होता है वायु की गुणवत्ता में गिरावट देखी जाती है। विश्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार, विश्व में होने वाली हर आठ मौतों में से एक वायु प्रदूषण के कारण होती है। वायु प्रदूषण के कारण प्रतिवर्ष लगभग 65 लाख लोगों की मृत्यु होती है। 
  • अवशिष्ट दहन से मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है। 
  • वायु गुणवत्ता में गिरावट होने से लोगों की श्वसन क्रिया प्रभावित होती है। 
  • COVID-19 महामारी से पीड़ित रोगियों की रिकवरी दर प्रभावित हो सकती है।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम:

  • पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, जिन लोगों द्वारा प्रतिबंध का उल्लंघन किया है उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है और उन किसानों के खिलाफ भी पुलिस द्वारा मामले दर्ज किये जा रहे हैं, जो गेहूं के भूसे को जला रहे हैं। 
  • फसल अवशेषों को जलाने पर प्रतिबंध तथा उल्लंघन करने वाले लोगों पर कार्रवाई को ‘वायु (रोकथाम और प्रदूषण नियंत्रण) अधिनियम’, (Air Prevention and Control of Pollution Act)- 1981 के तहत विनियमित किया जाता है।
  • राज्य में 3,141 फसल अवशिष्ट दहन घटनाओं की पहचान की गई है, जिसमें अपराधियों के खिलाफ 39, 27,500 रुपए के चालान जारी किये गए हैं तथा 322 किसानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।

पराली दहन नियंत्रित करने की दिशा में पहल:

  • जलवायु परिवर्तन की समस्या को सुलझाने में महत्त्वपूर्ण कदम उठाते हुए ‘पर्यावरण, वन तथा जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ द्वारा जलवायु परिवर्तन के लिये ‘राष्ट्रीय अनुकूलन कोष’ के अंतर्गत फसल अवशेष प्रबंधन के माध्यम से किसानों में जलवायु सुदृढ़ता निर्माण पर एक ‘क्षेत्रीय परियोजना’ को स्वीकृति प्रदान की है।
  • पराली की समस्या का हल खोजने के लिये भारत एक ‘स्वीडिश तकनीक’ का परीक्षण कर रहा है जो धान के फसल अवशेष को ‘जैव-कोयला’ (Bio-coal) में परिवर्तित कर सकती है।
  • हैप्पी सीडर’ (Turbo Happy Seeder-THS) के प्रयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।  हैप्पी सीडर (Turbo Happy Seeder-THS) ट्रैक्टर के साथ लगाई जाने वाली एक प्रकार की मशीन होती है जो फसल के अवशेषों को उनकी जड़ समेत उखाड़ फेंकती है।
  • फसल अवशेषों के इन-सीटू प्रबंधन के लिये कृषि में यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के लिये केंद्रीय क्षेत्रक योजना’ के तहत किसानों को स्व-स्थाने (In-situ) फसल अवशेष प्रबंधन हेतु मशीनों को खरीदने के लिये 50% वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है और साथ ही स्व-स्थाने (In-situ) फसल अवशेष प्रबंधन हेतु मशीनरी के कस्टम हायरिंग केंद्रों (Custom Hiring Center) की स्थापना के लिये परियोजना लागत की 80% तक वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

निष्कर्ष:

  • अधिक मशीनीकरण, पशुधन में कमी, कम्पोस्ट बनाने हेतु दीर्घ-अवधि आवश्यकता तथा अवशेषों का कोई वैकल्पिक उपयोग नहीं होने के कारण खेतों में फसलों के अवशेष जलाए जा रहे हैं। यह न केवल ग्लोबल वार्मिंग के लिये बल्कि वायु की गुणवत्ता, मिट्टी की सेहत और मानव स्वास्थ्य के लिये भी बेहद दुष्प्रभावी है।

स्रोत: द हिंदू

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