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पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960

  • 05 Jan 2021
  • 3 min read

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने केंद्र सरकर से क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत वर्ष 2017 में अधिसूचित नियमों को वापस लेने या संशोधित करने के लिये कहा है।

प्रमुख बिंदु:

वर्ष 2017 के नियम:

  • पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम (संपत्ति व जानवरों की देखभाल और रखरखाव) नियम, 2017 को पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत स्थापित किया गया है।
  • अधिनियम के तहत ये नियम न्यायाधीश को मुकदमे का सामना कर रहे किसी व्यक्ति के मवेशियों को जब्त करने की अनुमति देते हैं।
    • इसके बाद जानवरों को पशु चिकित्सालय (Infirmaries), पशु आश्रयों इत्यादि में भेज दिया जाता है। 
    • ऐसे जानवरों को अधिकारियों द्वारा गोद भी दिया जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय का अवलोकन:

  • ये नियम स्पष्ट रूप से पशु क्रूरता निवारण अधिनियम की धारा 29 के विपरीत हैं, जिसके तहत  क्रूरता का दोषी पाया गया व्यक्ति केवल अपने जानवरों को खो सकता है।
  • सरकार से कहा गया है कि या तो वह इन नियमों में बदलाव करे या न्यायालय से स्टे ले ले।

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के बारे में: 

  • इस अधिनियम का विधायी उद्देश्य ‘अनावश्यक सज़ा या जानवरों के उत्पीड़न की प्रवृत्ति’ को रोकना है।
  • भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (Animal Welfare Board of India- AWBI) की स्थापना वर्ष 1962 में अधिनियम की धारा 4 के तहत की गई थी।
  • इस अधिनियम में अनावश्यक क्रूरता और जानवरों का उत्पीड़न करने पर सज़ा का प्रावधान है। यह अधिनियम जानवरों और जानवरों के विभिन्न प्रकारों को परिभाषित करता है।
  • अधिनियम जानवरों के साथ हुए क्रूरता और हत्या के विभिन्न रूपों की चर्चा करता है, अगर जानवरों के साथ किसी भी प्रकार की क्रूरता की घटना घटित होती है, तो यह अधिनियम राहत प्रदान करता है।
  • वैज्ञानिक उद्देश्य हेतु जानवरों के इस्तेमाल करने से संबंधित दिशा-निर्देश जारी करना।
  • इस अधिनियम के तहत प्रदर्शनी में हिस्सा लेने वाले जानवरों और उनके विरुद्ध किये जाने वाले अपराधों से संबंधित प्रावधानों को शामिल किया गया है।
  • अधिनियम के तहत दायर मुकदमे की समयावधि 3 माह की होती है, इस अवधि के बाद वादी/अभियोजक पर किसी भी प्रकार का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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