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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

सुरक्षा पर भारत, श्रीलंका और मालदीव का सहयोग

  • 07 Aug 2021
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, क्वाड

मेन्स के लिये:

रक्षा क्षेत्र में भारत, श्रीलंका और मालदीव के सहयोग का महत्त्व एवं चीन का प्रतिसंतुलन 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में श्रीलंका, भारत द्वारा आयोजित एक उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार-स्तरीय बैठक में श्रीलंका और मालदीव सुरक्षा सहयोग के "चार स्तंभों" पर काम करने के लिये सहमत हुए हैं।

  • इन चार क्षेत्रों में समुद्री सुरक्षा, मानव तस्करी, आतंकवाद का मुकाबला और साइबर सुरक्षा शामिल है।
  • कोलंबो सुरक्षा सम्मेलन के तहत हुई बैठक में बांग्लादेश, सेशेल्स और मॉरीशस ने पर्यवेक्षकों की भूमिका में भाग लिया।

प्रमुख बिंदु:

पृष्ठभूमि:

  • नवंबर 2020 में कोलंबो में समुद्री सुरक्षा पर NSA (राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार) की त्रिपक्षीय बैठक के तुरंत बाद इस समूह का नाम बदलकर `कोलंबो सुरक्षा सम्मेलन' कर दिया गया। श्रीलंका की राजधानी (कोलंबो) में एक सचिवालय भी स्थापित किया गया है।
  • यह त्रिपक्षीय ढाँचा वर्ष 2011 में स्थापित किया गया था।
  • कॉन्क्लेव की स्थापना का उद्देश्य तीन हिंद महासागर देशों के बीच समुद्री और सुरक्षा मामलों पर घनिष्ठ सहयोग बनाना था।
  • सैन्य और सुरक्षा सहयोग पर आधारित यह पहल भारत द्वारा श्रीलंका और मालदीव के साथ साझा की जाने वाली वर्तमान भू-रणनीतिक गतिशीलता के मद्देनज़र इस क्षेत्र में महत्त्व रखती है।

वर्तमान भूस्थैतिक गतिशीलता:

  • श्रीलंका: इस वर्ष की शुरुआत में भारत ने अपनी दक्षिणी सीमा के करीब श्रीलंका के उत्तरी प्रांत के एक द्वीप में चीन द्वारा विकास परियोजनाओं को शुरू किये जाने पर सुरक्षा चिंताएँ ज़ाहिर की हैं।
  • भारत-संयुक्त राज्य अमेरिका-जापान-ऑस्ट्रेलिया समूह जिसे 'क्वाड' के रूप में जाना जाता है, के सदस्यों के साथ मालदीव को विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग (खासकर रक्षा क्षेत्र में) कर रहा है।

नवीनतम बैठक के मुख्य बिंदु:

  • इस बैठक का उद्देश्य चीन की बढ़ती उपस्थिति के बीच बंगाल की खाड़ी सहित संपूर्ण हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) के लिये एक समुद्री सुरक्षा तंत्र स्थापित करना था।
  • बैठक में भाग लेने वाले छह देशों के साथ फोकस क्षेत्रों का भी विस्तार किया गया और इसमें हथियारों तथा मानव तस्करी, आतंकवाद व हिंसक उग्रवाद का मुकाबला, समुद्री पर्यावरण की सुरक्षा, क्षमता निर्माण, नशीले पदार्थों सहित अंतर्राष्ट्रीय अपराध तथा मानवीय सहायता एवं आपदा राहत आदि को भी शामिल किया गया।
  • हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को और मज़बूत करने हेतु नौसेनाओं तथा तटरक्षकों के संयुक्त अभ्यास के माध्यम से अधिक सहयोग पर भी चर्चा की गई।
  • गौरतलब है कि हिंद महासागर क्षेत्र में प्रदूषण संबंधी कई दुर्घटनाएँ देखी गई हैं। एमवी एक्सप्रेस पर्ल, एमटी न्यू डायमंड और एमवी वाकाशियो जैसे जहाज़ों की इस क्षेत्र में दुर्घटनाएं हुईं, इससे समुद्री पर्यावरण प्रभावित हुआ। इसके मद्देनज़र सदस्यों ने पानी में होने वाले प्रदूषण से निपटने के तरीकों पर भी चर्चा की।
  • इसके अलावा तीन पर्यवेक्षक देशों को अगली बैठक में पूर्ण सदस्य बनने के लिये आमंत्रित किया गया है। यह बैठक मालदीव में होगी।

महत्त्व

  • सहयोग के विषयगत क्षेत्रों का विस्तार और बांग्लादेश, मॉरीशस तथा सेशेल्स के रूप में सदस्यता का विस्तार, हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के बीच एक साझा मंच पर एक साथ काम करने व एक क्षेत्रीय ढाँचे के तहत जुड़ाव के क्षेत्रों को मज़बूत करने का संकेत देता है।
  • भारत के तत्काल पड़ोसी देशों में हिंद महासागर क्षेत्र के 6 देशों का एक समान समुद्री सुरक्षा मंच पर साथ आना व्यापक वैश्विक संदर्भ में भी महत्त्वपूर्ण है।
  • यह एक प्रमुख सुरक्षा भूमिका निभाने की भारत की इच्छा पर भी प्रकाश डालता है।

चिंताएँ:

  • मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के नेतृत्व में माले (Male) के साथ दिल्ली के संबंध बिगड़ने से NSA स्तरीय त्रिपक्षीय बैठक की प्रगति प्रभावित हुई है।
  • उपक्षेत्रीय सहयोग को द्विपक्षीय राजनीतिक संबंधों से अलग नहीं किया जा सकता है और इसलिये अलग-अलग देशों के साथ अच्छे द्विपक्षीय संबंध बनाए रखना तथा छोटे पड़ोसियों की बढ़ती आकांक्षाओं को पूरा करना महत्त्वपूर्ण होगा।
  • उपक्षेत्रीय स्तर पर भारत के साथ कठिन सैन्य सहयोग करने की तुलना में अधिकांश छोटे पड़ोसी देश गैर-पारंपरिक सुरक्षा सहयोग करने में अधिक सहज हैं।

आगे की राह

  • सुरक्षा सहयोग के निर्माण के लिये एक उपक्षेत्रीय दृष्टिकोण हाल के वर्षों में भारत की पड़ोस नीति में प्रमुखता प्राप्त कर रहा है। समुद्री सुरक्षा सहयोग पर NSA स्तरीय त्रिपक्षीय भारत-श्रीलंका-मालदीव वार्ता का पुनरुद्धार इस नीतिगत दृष्टिकोण को रेखांकित करता है।
  • उपक्षेत्र की स्पष्ट सीमा तय करना एक चुनौती बना रहेगा क्योंकि सहयोग हमेशा निकटता कारक से नहीं बल्कि मुद्दे की प्रकृति से भी संचालित होगा। सीमा मुद्दे पर स्पष्टता उपक्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग के उद्देश्यों को बेहतर ढंग से पूरा करने में मदद कर सकती है और सदस्यता के अतिव्यापी या गतिविधियों के दोहराव से बचा जा सकता है।

स्रोत: द हिंदू

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