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पत्रकारिता में नीतिशास्त्र

  • 12 Jan 2021
  • 23 min read

पत्रकारिता पर गांधीवादी नीतिशास्त्र 

“पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सेवा भाव होना चाहिये। समाचार-पत्रों में महान शक्ति होती है, लेकिन जिस तरह जल की एक मुक्त धारा देश के पूरे तटीय क्षेत्र को जलमग्न कर देती है और फसलों को बर्बाद कर देती है, उसी प्रकार एक अनियंत्रित कलम भी नष्ट करने का कार्य करती है। ”- महात्मा गांधी

सामाजिक उत्तरदायित्त्व का विचार (Idea of Social Responsibility): 

  • यह मानते हुए कि “समाचार-पत्र एक महान शक्ति है ”, महात्मा गांधी- जो खुद एक महान पत्रकार और संपादक थे, के विचार पत्रकारिता के उद्देश्यों के बारे में बहुत स्पष्ट थे और उनके अनुसार इसे जल के मुक्त प्रवाह के समान नहीं होना चाहिये, क्योंकि:
    • उन्होंने 'मुक्त भाषण' और 'प्रेस की स्वतंत्रता' का हमेशा समर्थन किया और इन पर बाहरी प्रतिबंधों या नियंत्रण की बात को हमेशा नकारा तथा इसके लिये संघर्ष किया। उनके द्वारा पत्रकारिता के लिये 'सामाजिक उत्तरदायित्व’ संबंधी विचार दिया गया।
    • इसका सामान्य सा अर्थ यह है कि पत्रकारिता को सामाजिक रूप से उत्तरदायी होना चाहिये तथा निष्ठा के साथ लोगों की सेवा करनी चाहिये। समाचार रिपोर्टों में तथ्यों की संवेदनशीलता, विकृति एवं हेरफेर से बचते हुए लोगों को जागरूक करने की दिशा में कार्य करना चाहिये तथा खुद के लाभ के लिये पत्रकारिता के नैतिक मानकों के साथ समझौता नहीं करना चाहिये।

पत्रकारिता का महत्त्व:

बेजुबान लोगों की आवाज़ बनना:

  • पत्रकारिता लोकतंत्र की चौथी संपत्ति है, जो बेजुबान लोगों की आवाज़ के रूप में  महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। न्यूज़ मीडिया और पत्रकारिता से जुड़े संस्थान नागरिकों को सार्वजनिक सूचना देने, किसी मुद्दे पर लोगों की आम राय जानने और बहस के शक्तिशाली उपकरण के रूप में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

सार्वजनिक निगरानी/पब्लिक वाचडॉग:

  • एक जीवंत, स्वतंत्र और आलोचनात्मक समाचार मीडिया के बिना एक जीवंत लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती है।
  • स्वतंत्र मीडिया न केवल सार्वजनिक महत्त्व के समाचार और विचारों को प्रसारित करता है, बल्कि एक प्रहरी के रूप में भी काम करता है। यह राज्य के प्रमुख अंगों और संस्थानों के कामकाज की निगरानी, जाँच और आलोचना करता है। सार्वजनिक कार्यालय के पदाधिकारियों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करते हुए उनकी जवाबदेहिता सुनिश्चित करता है।

लोकतंत्र की जीवंतता को बढ़ाता है:

  • एक स्वतंत्र न्यूज़ मीडिया जिसमें समाचार पत्र, पत्रिका, टेलीविज़न रेडियो, ऑनलाइन समाचार पोर्टल एवं डिजिटल समाचार प्लेटफॉर्म जैसे नए मीडिया शामिल हैं, लोकतंत्र की लंबी और कठिन यात्रा के अभिन्न अंग रहे हैं।
    • खासकर 19वीं और 20वीं शताब्दी में लोकतंत्र के विकास के साथ ही मीडिया का विकास भी देखने को मिला है। लोकतंत्र की सफलता के लिये जीवंत मीडिया को एक महत्त्वपूर्ण पैरामीटर के रूप में माना जाता है और वास्तव में यह किसी देश में लोकतंत्र की स्थिति को मापने के महत्त्वपूर्ण कारकों में से एक है।

जनता की धारणा को आकार देना:

  • मीडिया जनता की धारणा को आकार देने, सार्वजनिक बहस के एजेंडे को स्थापित करने और समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था, संस्कृति एवं शासन पर इसके व्यापक प्रभाव को स्थापित करने में एक प्रभावशाली भूमिका निभाता है। न्यूज़ मीडिया और पत्रकारिता की लोकतांत्रिक समाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
    • नेपोलियन बोनापार्ट के अनुसार, "चार शत्रुतापूर्ण समाचार-पत्रों से एक हज़ार बयोनेट्स (बंदूक के आगे लगा चाकू जैसा हथियार) की तुलना में अधिक डरने की आवश्यकता है।"

उत्तरदायी पत्रकारिता की विशेषताएँ:

पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता:

  • न्यूज़ मीडिया को विश्वसनीयता और सम्मान किसी उपहार के रूप में नहीं मिलता है, बल्कि इसे पत्रकारिता के नीतिशास्त्रीय और नैतिक मानकों का निरंतर पालन करते हुए बनाए रखा जाता है।
  • न्यूज़ मीडिया को भी पत्रकारिता के सिद्धांतों और मानदंडों का पालन करना चाहिये तथा रिपोर्टों, टिप्पणियों और समग्र कामकाज में पारदर्शित के साथ-साथ जवाबदेह होना चाहिये।

पत्रकारिता में नीतिशास्त्र को बनाए रखना:

  • सार्वजनिक रूप से जनता का सामना करने वाले अन्य व्यवसायों की तरह पत्रकारिता भी अपने सामाजिक उत्तरदायित्त्व को पूरा करने के लिये नैतिक सिद्धांतों, मानकों और मानदंडों के एक समूह के साथ विकसित हुई है और सामग्री की गुणवत्ता सुनिश्चित करने तथा सूचनाओं के एकत्रीकरण, प्रसंस्करण, निस्पंदन एवं प्रसार में उच्चतम पेशेवर मानकों का पालन किया जाना चाहिये।
    • पत्रकारिता नीतिशास्त्र मूल रूप से पेशेवर पत्रकारों के लिये तैयार किये गए सिद्धांतों, मानकों, दिशा-निर्देशों और आचार संहिता का एक समूह है, जो एक पत्रकार के आचरण, चरित्र एवं व्यवहार तथा न्यूज़ के एकत्रीकरण एवं प्रसार प्रक्रिया से पूर्व, उसके दौरान और बाद में अपनाए जाने वाले तरीकों को निर्धारित करती है।

स्व-नियमन:

  • आमतौर पर न्यूज़ मीडिया के आउटलेट और उसके पेशेवर पत्रकारों से अपेक्षा की जाती है कि वे न केवल पत्रकारिता नीतिशास्त्र के सिद्धांतों और मानदंडों का कठोरता से पालन करें, बल्कि उन्हें संरेखित करते हुए स्व-नियमन भी करें।
    • लेकिन ‘पत्रकारिता नीतिशास्त्र’ के अनुपालन की गैर-अनिवार्य और स्वैच्छिक प्रकृति के कारण आमतौर पर पत्रकारों और न्यूज़ आउटलेट के खिलाफ इसके उल्लंघन की शिकायतें देखी जाती हैं।
    • इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि न्यूज़ मीडिया आउटलेट्स का एक वर्ग या तो व्यक्तिगत पाठकों एवं दर्शकों को आकर्षित करने या कुछ व्यक्तिगत लाभ कमाने या वाणिज्यिक हितों को ध्यान में रखते हुए ‘पत्रकारिता नीतिशास्त्र’ के अनुपालन में  ऐच्छिक या अनैच्छिक रूप से समझौता कर रहा है। 

भारत में पत्रकारिता से संबंधित मुद्दे:

पत्रकारिता में नैतिकता का क्षरण:

  • भारत में नैतिक मानदंडों और सिद्धांतों के उल्लंघन के मामलों जैसे- पेड न्यूज़ से लेकर, फेक न्यूज़ का प्रसार, सनसनीखेज खबरें बनाना, सामान्य प्रकृति की खबरों को अतिशयोक्तिपूर्ण रूप से पेश करना, भ्रामक सुर्खियाँ बनाना, निजता का उल्लंघन, तथ्यों का विरूपण आदि में कई गुना वृद्धि हुई है।

पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग:

  • न्यूज़ मीडिया द्वारा खुले तौर किसी विशेष पक्ष का समर्थन तथा पूर्वाग्रहपूर्ण रिपोर्टिंग की जाती है। इसके अलावा मुख्यधारा के कई न्यूज़मीडिया आउटलेट और उनके पत्रकार एकतरफा मीडिया ट्रायल, व्यक्तिगत लाभ के लिये पैरवी करना, ब्लैकमेलिंग, न्यूज़ स्टोरीज़ में हेर-फेर करना, दुर्भावनापूर्ण और मानहानि की रिपोर्टिंग में संलग्न होना, प्रोपेगेंडा और त्रुटिपूर्ण सूचनाओं के प्रसार आदि में संलिप्त रहते हैं।

भाषण और प्रेस की स्वतंत्रता का दुरुपयोग: 

  • देश में बढ़ती चिंता का एक प्रमुख विषय यह है कि कई भारतीय न्यूज़ मीडिया आउटलेट्स ने पत्रकारिता नीतिशास्त्र और मानदंडों के प्रति बहुत कम सम्मान दिखाया है। ये नियमित रूप से पत्रकारिता की शर्तों का उल्लंघन करने के आदतन अपराधी हो गए हैं।
    • वास्तव में न्यूज़ मीडिया के अनैतिक आचरण के आलोचक अप्रभावी स्व-नियामक तंत्र के स्थान पर कठोर नियमन की मांग दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।
    •  यह ध्यान दिया जा सकता है कि कई अन्य उदार लोकतंत्रों की तरह भारत ने भी प्रेस की स्वतंत्रता और न्यूज़ मीडिया के स्व-नियमन को महत्त्वपूर्ण माना है।

टीआरपी में हेरफेर: 

  • हाल ही में 'ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल' (BARC) इंडिया द्वारा उपयोग किये गए उपकरणों में हेरा-फेरी करके कुछ टीवी चैनलों द्वारा टीआरपी (टारगेट रेटिंग पॉइंट्स) में हेर-फेर के बारे में कई दावे किये गए हैं।
  • टीआरपी, मार्केटिंग और विज्ञापन एजेंसियों द्वारा दर्शकों के मूल्यांकन के लिये उपयोग की जाने वाली आव्यूह/ मैट्रिक्स है। यह दर्शाता है कि विभिन्न सामाजिक-आर्थिक श्रेणियों के कितने लोग किसी विशेष अवधि के दौरान कौन-से चैनलों को देखते हैं। यह अवधि अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार एक मिनट है।

यू.एस.ए. में किये गए सुधार:

लोकतांत्रिक संचार में गिरावट:

  • इससे पहले 'येलो जर्नलिज्म' के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका के समाचार-पत्रों को अतिरंजित सुर्खियों, चित्रों और रेखाचित्रों के साथ सनसनीखेज अपराध कथाओं को छापने में संलग्न पाया गया था। 
  • उस समय अधिक पाठकों को आकर्षित करने और मालिकों के मुनाफे को अधिकतम करने के लिये गलाकाट प्रतियोगिता और एक उन्मादी भीड़ मौज़ूद थी। 
  • लेकिन यह भी लोकतांत्रिक बहस की प्रक्रिया को कमज़ोर करने, जनमत प्रणाली को विकृत करने तथा नागरिकों के अधिकारों में कमी करने एवं उनके लोकतांत्रिक विकल्पों के चुनाव करने के निर्णय को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा था।

सुधारों के लिये अभियान:

  • 20वीं सदी की शुरुआत में धीरे-धीरे अमेरिका तथा कई अन्य देशों में न्यूज़ मीडिया और पत्रकारों के लिये आचार संहिता एवं दिशा-निर्देशों से युक्त नीतिशास्त्र एवं सिद्धांतों के पालन हेतु एक सम्मिलित अभियान की शुरुआत की गई।

पत्रकारिता का सिद्धांत (Canons of Journalism):

  • अमेरिका में वर्ष 1922 में 'अमेरिकन सोसाइटी ऑफ न्यूज़पेपर एडिटर्स' (ASNE) द्वारा 'कैनन ऑफ जर्नलिज्म' नामक नैतिक सिद्धांतों का एक सेट अपनाया गया, जिसे बाद में संशोधित किया गया और वर्ष 1975 में 'सिद्धांतों के विवरण' (Statement of Principles) का नाम दिया गया।

प्रमुख सिद्धांत: 

  • ASNE द्वारा 6 प्रमुख सिद्धांतों को प्रस्तावित किया गया जिनमें शामिल हैं- उत्तरदायित्त्व, प्रेस की स्वतंत्रता, स्वतंत्रता, सच्चाई और सटीकता, निष्पक्षता एवं उचित व्यवहार (Fair Play)।
    • इन सिद्धांतों को न्यूज़ मीडिया एवं पत्रकारिता को पेशेवर बनाने और पत्रकारिता के कार्य तथा इसकी सामग्री की निगरानी व मूल्यांकन करने के नैतिक मानकों को निर्धारित करने के लिये तैयार किया गया था।

'हचिंस आयोग' (Hutchins Commission): 

  • यह आयोग प्रेस की कार्यप्रणाली और सामग्री पर मीडिया के स्वामित्त्व के प्रभाव की समीक्षा करने के लिये स्थापित किया गया था। आयोग ने दोहराया कि पत्रकारिता के लिये 'प्रेस की स्वतंत्रता' सर्वोपरि है, वहीं यह एक नैतिक दायित्त्व भी है कि वह अपने निर्णय एवं विकल्प लागू करते समय आम जनता की भलाई पर विचार करे।
  • इसने 'न्यूज़ मीडिया' और पत्रकारिता की गुणवत्ता में सुधार हेतु इन नैतिक मानदंडों एवं मानकों को अपनाने के लिये एक मज़बूत दार्शनिक आधार प्रदान किया। रिपोर्ट में गांधी जी द्वारा व्यक्त 'एक बेकाबू कलम' की चिंताओं को प्रतिध्वनित किया गया तथा इसका 'एकमात्र उद्देश्य सेवा भाव है'।

'येलो जर्नलिज्म’ (Yellow Journalism):

  • यह समाचार-पत्रों की रिपोर्टिंग की एक शैली है जो तथ्यों को सनसनीखेज बनाने पर बल देती है।
  • इसमें पाठकों को आकर्षित करने और परिसंचरण बढ़ाने के लिये अखबार के प्रकाशन में आकर्षक तथा सनसनीखेज खबरों का उपयोग किया जाता है।
  • इस वाक्यांश का उपयोग 1890 के दशक में न्यूयॉर्क शहर के दो समाचार-पत्रों 'द वर्ल्ड' और 'द जर्नल' के बीच उग्र प्रतियोगिता में नियोजित चालबाज़ी का वर्णन करने के लिये किया गया था।

अधिनियम और एजेंसियाँ:

भारतीय प्रेस परिषद (PCI): 

  • यह एक वैधानिक और अर्द्ध-न्यायिक निकाय है जिसे संसद के एक अधिनियम द्वारा स्थापित किया गया था। यह "प्रेस का, प्रेस के लिये और प्रेस द्वारा" रक्षक के रूप में कार्य करती है।
  • इसके दो व्यापक उद्देश्य- प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करना और इसकी गुणवत्ता एवं मानकों में सुधार करना है।
  • यह प्रिंट मीडिया के स्व-नियमन के आधार पर काम करती है लेकिन इसके पास कोई दंडात्मक शक्ति नहीं है।
  • यह केवल न्यूज़को सेंसर कर सकती है एवं सुधार या माफी के लिये समाचार-पत्रों को चेतावनी जारी कर सकती है।
  • इसने एक विस्तृत 'पत्रकारिता आचरण के मानदंड' को भी अपनाया है, जो पत्रकारों एवं अखबारों को इसे पूरी सावधानी और परिश्रम के साथ अपनाने की अपेक्षा करती है।

समाचार प्रसारण मानक प्राधिकरण (NBSA): 

  • यह एक गैर-सरकारी निकाय है, जो न्यूज़-चैनलों की निगरानी करता है। इसने समाचार चैनलों के सदस्यों के लिये एक 'आचार संहिता और प्रसारण मानकों' को अपनाया है, जिसका सदस्यों द्वारा स्वेच्छा से पालन किया जाता है।
    • पीसीआई की तरह एनबीएसए की अध्यक्षता भी सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा की जाती है। इसके अन्य सदस्यों में समाज में सम्मानित एवं प्रसिद्धि प्राप्त लोग और टीवी समाचार चैनलों के संपादक शामिल होते हैं।
    • यह  प्राधिकरण सदस्य टीवी समाचार चैनलों के खिलाफ तकनीकी मानदंडों के उल्लंघन की शिकायतें प्राप्त करता है और सभी पक्षों को सुनने के बाद निर्णय लेता है। इसके अतिरिक्त न्यूज़ मानकों का पालन न करने वाले चैनलों के खिलाफ इसे एक लाख रुपए तक का जुर्माना लगाने की शक्ति प्राप्त है।

केबल टेलीविज़न नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995: 

  • एनबीएसए के अलावा न्यूज़ चैनलों को भी 'सूचना और प्रसारण मंत्रालय' (Ministry of Information and Broadcasting- I & B) के 'केबल टेलीविज़न नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम' {Cable Television Networks (Regulation) Act}, 1995 जिसमें एक 'प्रोग्राम कोड' और 'विज्ञापन कोड' शामिल है, के तहत विनियमित किया जाता है।
    • इस कोड का पालन करना, वास्तव में एक न्यूज़ चैनल के लिये लाइसेंस प्राप्त करने की पूर्व-शर्तों में से एक है।
    • आई एंड बी मंत्रालय द्वारा कुछ दुर्लभ अवसरों पर 'प्रोग्राम कोड' का उल्लंघन करने पर गलत चैनलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई है, जबकि अन्य समाचार चैनलों के लिये दिशा-निर्देश जारी किये हैं।

विनियमन की मौजूदा व्यवस्था से जुड़े मुद्दे

(Issues with the Existing Architecture of Regulation):

अनैतिक आचरणों को सुधारने में अप्रभावी: 

  • इससे जुड़ा प्रमुख मुद्दा यह है कि न्यूज़ मीडिया और पत्रकारों द्वारा नैतिक सिद्धांतों एवं मानदंडों के उल्लंघन के बढ़ते मामलों को देखते हुए भारत में न्यूज़ मीडिया विनियमन की वर्तमान व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

आत्मनिरीक्षण का अभाव:

  • न्यायविदों, बुद्धिजीवियों और नागरिक समाज के सदस्यों के अलावा कई वरिष्ठ पत्रकार और संपादक भारत में पत्रकारिता नीतिशास्त्र की वर्तमान स्थिति से खुश नहीं हैं।
    • वे न्यूज़ मीडिया आउटलेट और पत्रकार समुदाय से गंभीर आत्मनिरीक्षण की मांग कर रहे हैं, ताकि नैतिक मानदंडों की अवज्ञा को कम करने की दिशा में कदम उठाए जा सकें और भारत में न्यूज़ मीडिया की गुणवत्ता एवं मानकों में सुधार के लिये उचित उपाय तथा निष्कपट पहलों को अपनाया जा सके।
    • न्यूज़ मीडिया आउटलेट्स को यह समझना होगा कि सार्वजनिक विश्वास बनाए रखने के लिये नैतिक मानदंडों का पालन करना उनके हित में है।

आगे की राह:

सुधारों पर चर्चा शुरू करना:

  • पेशेवर निकाय जैसे- एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, एनबीए एवं पीसीआई जैसे सांविधिक निकाय इस मुद्दे पर बहस और चर्चा शुरू कर सकते हैं तथा उपचारात्मक उपायों को प्रस्तावित कर सकते हैं।
  • हर कोई जानता है कि मीडिया की विफलता की लागत ब्रिटेन में ‘न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड' घोटाले के समान, बहुत अधिक होगी। भारत में लगातार इसके कठोर विनियमन की मांग की जा रही है।

मीडिया पर उचित प्रतिबंध लगाना: 

  • भारतीय प्रेस परिषद के लिये दंडात्मक शक्ति की मांग करते हुए यह दलील पेश की जा रही है कि कोई भी स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं हो सकती। सभी प्रकार की स्वतंत्रता उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं और इनके साथ ही आवश्यक उत्तरदायित्त्व भी जुड़े होते हैं।
  • लोकतंत्र में हर कोई जनता प्रति जवाबदेह है, अत: मीडिया भी लोगों के प्रति जवाबदेह है। भारतीय मीडिया को अब उत्तरदायित्त्व और परिपक्वता की भावना का आत्मनिरीक्षण और विकास करना चाहिये। ऐसी उम्मीद है कि भारतीय न्यूज़ मीडिया महात्मा गांधी की सलाह और चेतावनी को याद रखेगा।

नैतिक मानदंडों का सख्त पालन:

  • यह भी महत्त्वपूर्ण है कि विचारशील मीडिया समुदाय इन सुधारों की मांगों की पहचान करेगा तथा नैतिक मानदंडों का पालन सुनिश्चित करके न्यूज़ मीडिया और पत्रकारिता को एक पेशे के रूप में पुनर्स्थापित करने की दिशा में तेज़ी से कार्य करेगा। यह नागरिकों का विश्वास जीतने और जनता के साथ सामाजिक अनुबंध को मज़बूत बनाने के लिये काम करेगा।
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