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ब्रीद: वायु प्रदूषण से निपटने के लिये एक कार्य योजना

  • 18 Dec 2018
  • 23 min read

संदर्भ


नीति आयोग (NITI Aayog) ने उद्योगों और संबद्ध क्षेत्रों में वायु प्रदूषण से निपटने के लिये निम्नलिखित एक्शन पॉइंट्स अर्थात् कार्यवाही बिंदु तैयार किये हैं। इसके अंतर्गत मंत्रालयों और विभागों को छोड़कर शासन के सभी स्तरों पर समेकित कार्रवाई की मांग की गई है।

चिंता के प्रमुख कारण

  • डब्ल्यू.एच.ओ. डेटाबेस (WHO database), 2018 में भारत के कई शीर्ष शहरों को विश्व के सबसे अधिक वायु प्रदूषण वाले शहरों की श्रेणी में शामिल किया गया है।

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  • विश्व के 15 सबसे प्रदूषित शहरों में से 14 भारत में हैं।
  • वायु प्रदूषण के संपर्क में आने के कारण हृदयाघात, हृदय रोग, फेफड़ों का कैंसर, पुरानी अवरोधक फुफ्फुसीय बीमारियाँ (chronic obstructive pulmonary diseases), श्वसन संक्रमण के साथ-साथ निमोनिया जैसी गंभीर बीमारियाँ उपजती है।
  • ‘हेल्थ ऑफ द नेशंस स्टेट्स’ (Health of the Nation’s States) के अनुसार, भारत में होने वाली कुल बीमारियों में से 5% के लिये घरेलू वायु प्रदूषण और 6% के लिये बाह्य वायु प्रदूषण ज़िम्मेदार थे।
  • सर्दियों के मौसम के दौरान फसल अवशेषों को जलाए (Crop Residue Burning-CRB) जाने से PM10 (पार्टिकुलेट मैटर्स) में 17% और PM2.5 में 16% की वृद्धि होती है। फसल अवशेषों को जलाने की समस्या मुख्य रूप से धान उत्पादक राज्यों पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ स्थानों में देखने को मिलती है, जहाँ गन्ना किसानों द्वारा फसल अवशेषों को जला दिया जाता है।
  • राज्य वन रिपोर्ट, 2017 के अनुसार, भारत में 7 लाख वर्ग किलोमीटर वन आच्छादित क्षेत्र है जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 21.54% है। ऐसे में वनाग्नि पार्टिकुलेट मैटर्स में वृद्धि का एक बड़ा स्रोत होती है। इस प्रकार की घटनाओं (जैसे-वनाग्नि) का स्थानीय वायु गुणवत्ता, दृश्यता और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर असर होता है।

भारत के शीर्ष 10 सबसे प्रदूषित शहरों के लिये कार्य योजनाएँ

action plan

1. शून्य उत्सर्जन वाहनों (ZEVs) के माध्यम से ड्राइव गतिशीलता
Drive Mobility through Zero Emission Vehicles (ZEVs)

  • आवश्यक वित्तीय उपायों और बुनियादी ढाँचे के माध्यम से विद्युत और हाइब्रिड वाहनों के वितरण में वृद्धि करना।
  • केंद्र सरकार के सभी कार्यालयों से अगले 3 वर्षों (2021 अप्रैल तक) में 15 वर्षों से पुराने मौजूदा वाहनों को विद्युत वाहनों से प्रतिस्थापित करने के लिये कहना।
  • सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (Ministry of Road Transport and Highways-MoRTH) द्वारा मुफ्त पंजीकरण जैसे अतिरिक्त प्रोत्साहन और इलेक्ट्रिक 2 व्हीलर्स एवं 3 व्हीलर्स के लिये आसानी से परमिट प्राप्त करने जैसी सुविधाओं को तत्काल रूप से अधिसूचित किया जाना चाहिये।
  • इसके साथ-साथ स्वच्छ/ई-रिक्शा के माध्यम से अंतिम मील कनेक्टिविटी  (Last mile connectivity) को बढ़ावा देना।

2. वाहन उत्सर्जन को रोकने के लिये मज़बूत उपाय लागू करना
Enact Strong Measures to Curb Vehicular Emissions

  • 2020 से बड़े पैमाने पर फीबेट कार्यक्रम (Feebate program) को कार्यान्वित करना: फीबेट (feebate) एक नीति है जिसके द्वारा अकुशल या प्रदूषण फ़ैलाने वाले वाहनों पर अधिभार (शुल्क) आरोपित किया जाता है जबकि कुशल वाहनों को छूट (Bate) प्राप्त होती है।
  • वाहन स्वामित्व और उपयोग के लिये दिशा-निर्देश जारी करना: निजी वाहनों के उपयोग को कम करने के लिये कंजेशन प्राइसिंग (congestion pricing), कर तथा बीमा राशि में वृद्धि, पार्किंग लागत में वृद्धि के अलावा कुछ निश्चित क्षेत्रों तथा मौकों पर प्रतिबंध लागू करने जैसे उपाय किये जाने की आवश्यकता है।
  • कम सल्फर वाले ईंधन (10 ppm) का उपयोग शुरू किया जाए और इंजन उत्सर्जन के लिये भारत VI (यूरो VI के समान) मानकों को लागू किया जाना चाहिये।

♦ BS VI मानक दिल्ली NCR में अप्रैल 2019 तक लागू किये जाने हैं।
♦ BS VII मानक पूरे भारत में अप्रैल 2020 तक लागू किये जाएंगे।

  • निर्माताओं से प्राप्त छूट एवं सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) द्वारा उत्पाद शुल्क में कमी के रूप में वित्तीय प्रोत्साहनों द्वारा समर्थित एक स्वैच्छिक बेड़ा आधुनिकीकरण तंत्र (fleet modernisation mechanism) को शुरू किया जाना चाहिये।

3. विद्युत क्षेत्र में आवश्यक सुधार करके उत्सर्जन को कम करना
Reduce Emissions by Optimizing the Power Sector

  • कुशल थर्मल पावर प्लांटों के उन्नयन के साथ ही पुराने और अक्षम बिजली संयंत्रों को बंद करने का कार्य तेज़ी से किया जाए।
  • संचालन और बिजली वितरण संबंधी नियमों, विनियमों और पट्टे से संबंधित नीतियों के सरलीकरण से सौर ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि होगी।
  • बिजली संयंत्रों में उच्च ग्रेड वाले कम प्रदूषणकारी कोयले की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  • डीज़ल पावर जनरेटर के संचालन को खत्म करने के लिये शहरी क्षेत्रों में बिजली की बेहतर उपलब्धता पर बल देना।

4. औद्योगिक वायु प्रदूषण हेतु सुधार विनियामक ढाँचा
Reform Regulatory Framework for Industrial Air Pollution

  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board-CPCB) के परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों के साथ-साथ औद्योगिक उत्सर्जन मानकों और प्रथाओं की व्यक्तिगत श्रेणियों में संशोधन किया जाए।
  • इसके अलावा, निम्नलिखित उपायों द्वारा एक ईंधन प्रतिस्थापन उप-कार्य योजना का निर्माण किया जाना चाहिये।

♦ बॉयलर और थर्मल प्लांट्स में ऊर्जा उत्पादन के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले कोयले में राख की सामग्री में वृद्धि करके।
♦ स्वच्छ कोयला तकनीकों को बढ़ावा देकर तथा बेनेफिसिएटेड (beneficiated या सज्जीकरणयुक्त) कोयले के प्रयोग को अनिवार्य करके।  खनिज की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिये अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को बेनेफिसिएट (beneficiate) या सज्जीकरण कहते है।
♦ डीज़ल जनरेटर सेट के लिये उत्सर्जन मानक तय करके।
♦ छोटे बायलर में कोयले के स्थान पर प्राकृतिक गैस का उपयोग करके।
♦ कोक (Coke) और फर्नेस तेल (Furnace Oil) जैसे अत्यधिक प्रदूषणकारी ईंधन के उपयोग पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाकर।

  • औद्योगिक संयंत्रों के लेखा परीक्षकों के यादृच्छिक असाइनमेंट (random assignment), सामान्य निकाय द्वारा भुगतान, सटीकता और सटीकता-आधारित बोनस भुगतान प्रणाली आदि जैसे उपायों को लागू करके पर्यावरण लेखा परीक्षा प्रक्रिया में सुधार करना।
  • कानून प्रवर्तन को प्रोत्साहित करना: बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को प्रोत्साहित करने की प्रक्रिया वायु प्रदूषण के खिलाफ सुधारात्मक कार्रवाई को तेज़ करने में मददगार साबित हो सकती है। इन उपायों के तहत 'वायु प्रदूषण सूचकांक' के साथ प्रदूषण के संबंधित स्रोतों के लिये उप-सूचकांक का उपयोग राज्यों को रैंक देने और उनके बीच प्रतिस्पर्द्धा के लिये किया जा सकता है।
  • सूचकांक के आधार पर 'name and shame' नीति एक सामान्य 'स्वच्छ वायु कोष' (MoEF&CC के तहत केंद्र सरकार से समर्थन से बनाया गया) से जुड़े प्रदर्शन- स्थानांतरण के साथ मिलकर वायु प्रदूषण का मुकाबला कर सकती है।

5. एक राष्ट्रीय उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (National Emissions Trading System) लागू करना

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  • 'प्रदूषक भुगतान' (Polluters Pay) की अवधारणा के आधार पर नियामकीय ढाँचे के भीतर एक बाज़ार आधारित उपकरण (उपाय) को लागू करना चाहिये। यह एक ऐसा प्रशासनिक उपकरण है जो ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिये उपयोग किया जाता है। यह सभी उद्योगों द्वारा फैलाए जाने वाले व्यक्तिगत प्रदूषण के स्तर को नियत करने में सहायक होगा। इसके अंतर्गत प्रदूषक गैसों के उत्सर्जन की एक निश्चित सीमा या कैप तय की जाती है। पार्टिकुलेट मैटर (particulate matter) के मामले में भी इस तरह की प्रक्रिया लागू की जा सकती है।

6. स्वच्छ निर्माण क्रियाओं को अपनाना ()Adopt Cleaner Construction Practices

  • निर्माण प्रक्रियाओं के लिये पर्यावरणीय जोखिम आकलन (Environmental Risk Assessment) को अनिवार्य बनाना।
  • निर्माण प्रक्रिया को शामिल करने हेतु ग्रीन बिल्डिंग रेटिंग (Green Building Ratings) के मानदंडों में संशोधन :  इसके बाद ग्रीन रेटिंग पर उच्च स्कोर को सब्सिडी वाले वित्तीय सहायता से जोड़ा जा सकता है।
  • धुंध मुक्त टावरों (smog free towers) को स्थापित करना: यह यूरोप में तैनात एक अभिनव तकनीकी समाधान है, जो अपने आस-पास के क्षेत्रों में प्रदूषित हवा को साफ करने का काम करती है। इन टावरों को निर्माण गतिविधियों के समीप स्थापित किया जा सकता है।
  • साइट बैच कंक्रीट (Site Batch Concrete) का उपयोग करने की नकारात्मक बाह्यताओं को खत्म करने के लिये रेडीमेड कंक्रीट के उपयोग को इस्तेमाल में लाना।

7. फसल अवशेष का उपयोग करने हेतु एक व्यापार मॉडल कार्यान्वित करना (Implementing a Business Model to Utilize Crop Residue)

  • बड़ी कृषि-अपशिष्ट प्रबंधन कंपनियों द्वारा एकत्रित फसल अवशेष की प्रत्यक्ष खरीद (मानक) बाज़ार दरों पर NTPC जैसी बड़ी थर्मल इकाइयों द्वारा की जानी चाहिये।
  • किसानों से फसल अवशेष की खरीद हेतु नए बाज़ारों को प्रोत्साहित करना: राज्य सरकारें इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु ग्रीन क्लाइमेट फंड (Green Climate Fund-GCF) का उपयोग कर सकती हैं।
  • भारत में पर्यावरण प्रबंधन से संबंधित अनुशंसित परियोजनाओं हेतु GCF को श्रृंखलाबद्ध करने के लिये नाबार्ड को डायरेक्ट एक्सेस एंटिटी (Direct Access Entity-DAE) के साथ मान्यता प्राप्त है।
  • धान के अवशेषों के लिये एक अंतर-राज्य व्यापार मॉडल तैयार किया जाना चाहिये। उदाहरण के तौर पर,  पंजाब से एकत्र किये गए धान के भूसे को अन्य राज्यों द्वारा मशरूम की खेती, इथेनॉल उत्पादन और कई अन्य उद्देश्यों की पूर्ति हेतु खरीदा जा सकता है।

8. एकीकृत अपशिष्ट प्रबंधन नीति लागू करना (Implement an Integrated Waste Management Policy)

  • निर्माताओं को अपने उत्पादों के सुरक्षित निपटान के लिये ज़िम्मेदार ठहराते हुए उनके उत्पादों का जीवन-चक्र दृष्टिकोण सुनिश्चित करने के लिये विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (Extended Producer Responsibility- EPR) को लागू किया जाना चाहिये। यह उत्पादकों को कम प्रदूषण फ़ैलाने वाली सामग्री का उपयोग करने के लिये प्रोत्साहित करता है और इलेक्ट्रॉनिक्स, वाहन, प्लास्टिक पैकेजिंग इत्यादि जैसे क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रभावी है।
  • लैंडफिल करों और विनियमन को अपनाना: लैंडफिल प्रविष्टि के लिये अतिरिक्त शुल्क चार्ज करने से लैंडफिलिंग के उपचार/प्रसंस्करण विधियों में बदलाव हो सकता है। यह कदम लैंडफिल बायोडिग्रेडेबल कचरे के प्रतिशत में कमी के लिये लक्ष्य निर्धारित करेगा।
  • ऊर्जा प्रणालियों में अपशिष्ट प्रबंधन को प्रोत्साहित करना: बायोगैस के माध्यम से उत्पादित ऊर्जा के संदर्भ में कर में कमी करना, बायोगैस संयंत्रों के लिये उपभोक्ताओं को सब्सिडी उपलब्ध कराना, अपशिष्ट को जलाने अथवा डंपिंग की बजाय अधिक व्यवहार्य बनाने में मदद करना।
  • अपशिष्ट प्रसंस्करण को विकेंद्रीकृत करना: लैंडफिलिंग के विकल्प को प्रभावी ढंग से कार्यान्वित किया जाना चाहिये, जैसा कि बंगलूरू, मैसूर और पणजी में किया गया है।
  • अपशिष्ट प्रबंधन में पायलट ब्लॉकचेन पहलों (Pilot blockchain initiatives) की शुरुआत की जानी चाहिये। उदाहरण के लिये, वस्तुओं के पुनर्नवीनीकरण के बदले लोगों को टोकन प्रदान किये जाने चाहिये ताकि वे अन्य सेवाओं के लिये इनका आदान-प्रदान कर सकें।

9. शहरी स्थानीय निकायों के माध्यम से शहर की धूल का निपटारा

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  • शहर की धूल का शमन करना:

♦ सड़कों के किनारों पर और उनके मध्य के स्थानों में मौजूद वृक्षों की कटाई पर प्रतिबंध लगाना।
♦ खाली पड़े हुए स्थानों पर पौधारोपण करना।
♦ ओवर-ब्रिज/फ्लाईओवर के खंभों पर पौधों की भिन्न-भिन्न प्रकार की किस्मों का रोपण करना ताकि वे प्रदूषण का अवशोषण कर सकें।
♦ ऐसे ओवर-ब्रिज/फ्लाईओवर की पहचान करना, जिनके नीचे पड़े रिक्त स्थान पर वृक्षारोपण किया जा सकता है।
♦ ULBs, PWD और NHAI द्वारा सड़कों के किनारे फुटपाथ का निर्माण करना।
♦ ईंट भट्टों (brick kilns) को शहर से दूर स्थानांतरित करना।
♦ सड़कों और उनके समीप के क्षेत्रों को मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त करना, इससे सड़क दुर्घटनाओं को भी नियंत्रित किया जा सकेगा।
♦ मैकेनिकल धूल को हटाने के लिये सड़कों पर धूल को अवशोषित करने और पानी छिड़कने वाले वाहनों को तैनात करना, या सड़क की सफाई हेतु मशीनें तैनात करना।

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10. वनाग्नि (Forest Fires) से निपटने संबंधी प्रयासों को एकीकृत करना

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  • वनाग्नि को रोकने के लिये बेहतर उपायों को अपनाना ताकि जान-माल की क्षति को कम किया जा सके। इस कार्य योजना के निर्माण में राज्य के वन विभागों को भी शामिल किया जाना चाहिये।
  • वनाग्नि के शमन को सुनिश्चित करना।

11. खाना पकाने के लिये स्वच्छ (Clean Cooking) स्रोतों के उपयोग को प्रोत्साहित करना

  • एलपीजी, बायोगैस, सौर ऊर्जा और बिजली जैसे स्वच्छ ईंधन के उपयोग को प्रोत्साहित करना। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (Pradhan Mantri Ujjwala Yojana-PMUY) इस मामले में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
  • ईंधन कुशल चूल्हे के वितरण और प्रचार को बढ़ावा देना।
  • घर के अंदर स्वस्थ वायु गुणवत्ता को बनाए रखने के लिये खाना पकाने और रहने वाले क्षेत्र को इस प्रकार से डिज़ाइन करना कि उनमें स्वच्छ हवा का प्रवेश बना रहे, इस प्रयास में प्रधानमंत्री आवास योजना (Pradhan Mantri Awas Yojana-PMAY) को एकीकृत किया जा सकता है।

12. व्यवहार परिवर्तन के माध्यम से सार्वजनिक स्वामित्व ड्राइव

  • कृषिगत प्रदूषण (Agricultural Pollution): मौजूदा कृषि विज्ञान केंद्रों (Krishi Vigyan Kendras-KVKs) की सहायता से किसानों को कृषिगत प्रदूषण के संबंध में व्यापक जानकारी प्रदान की जानी चाहिये ताकि वायु प्रदूषण को बढ़ावा देती इस समस्या का समाधान किया जा सकें।
  • इंडोर प्रदूषण (Indoor Pollution): वायु प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले इसके नकरात्मक असर के बारे में जनता को भली-भाँति अवगत कराया जाना  चाहिये ताकि लोगों के बीच खाना पकाने की स्वच्छ संस्कृति को बढ़ावा दिया जा सकें।
  • दवाग्नि: ग्राम स्तर पर स्थापित संयुक्त वन प्रबंधन समितियों (Joint Forest Management Committees) की व्यवस्था को वनाग्नि के कारणों और खतरों के संबंध में पारंपरिक वनवासियों को संवेदनशील बनाने के लिये आवश्यक शक्तियाँ दी जानी चाहिये।
  • सिटी डस्ट (City Dust): निर्माण के दौरान उत्पन्न कचरे में कमी लाने के लिये' निर्माता कंपनियों को संवेदनशील बनाया जाना चाहिये।
  • अपशिष्ट प्रबंधन (Waste management): घरेलू अपशिष्ट को अलग करने, सूखे अपशिष्ट की रिसाइक्लिंग को प्रोत्साहित करने के लिये सकारात्मक और नकारात्मक के नीति प्रोत्साहन के साथ जागरूकता अभियान का संचालन करना।

13. राष्ट्रीय, उप-राष्ट्रीय और क्षेत्रीय योजनाओं का विकास करना

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  • इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्तर पर एक व्यापक कार्य योजना तैयार की जानी चाहिये ताकि वायु प्रदूषण के स्तर में कमी लाने के उद्देश्य को समय पर हासिल किया जा सके।
  • महत्त्वाकांक्षी राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (National Clean Air Programme) द्वारा अगले तीन वर्षों में देश के 100 शहरों में 35% तथा अगले पाँच वर्षों में 50% प्रदूषण कम करने की घोषणा की गई है।

14. वायु गुणवत्ता निगरानी प्रणाली (Air Quality Monitoring Systems) में सुधार करना

  • चीन की तुलना में भारत के 23 शहरों में 39 ऑन-ग्राउंड रीयल-टाइम वायु प्रदूषण निगरानी प्रणाली (on-ground real-time air pollution monitoring systems) हैं। उल्लेखनीय है कि चीन के 900 शहरों में ऐसी 1500 प्रणाली हैं। वायु प्रदूषण से निपटने के मार्ग में आने वाली बाधाओं को कम करने के लिये इस तरह की प्रणालियों की संख्या में वृद्धि करने की ज़रूरत है।
  • हवा की गुणवत्ता में सुधार करने हेतु वायु प्रदूषण संबंधी डेटा प्रदान करने के लिये सटीक निगरानी करना।
  • वायु गुणवत्ता के संदर्भ में सटीक जानकरी के लिये ड्रोन और यूएवी का उपयोग किया जा सकता है।
  • प्रदूषण के सभी बिंदु, स्रोतों की जियो-मैपिंग द्वारा डेटा की निगरानी करते हुए वायु प्रदूषण के संदर्भ में आवश्यक योजनाओं का विकास किया जाना चाहिये।
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