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प्रिलिम्स फैक्ट्स


प्रारंभिक परीक्षा

प्रिलिम्स फैक्ट: 19 फरवरी, 2021

  • 19 Feb 2021
  • 7 min read

मंदारिन बतख

Mandarin Duck

हाल ही में असम के तिनसुकिया ज़िले में मगुरी-मोटापुंग बील में एक सदी के बाद मंदारिन बतख (Mandarin Duck) देखी गई है।

Mandarin-Duck

प्रमुख बिंदु:

  • वैज्ञानिक नाम: एक्स गलेरीक्युलेटा (Aix galericulata)
  • खोज:
    • मंदारिन बतख की पहचान सबसे पहले वर्ष 1758 में स्वीडिश वनस्पतिशास्त्री, चिकित्सक और प्राणी विज्ञानी कार्ल लिनिअस (Carl Linnaeus) ने की थी।
  • विशेषताएँ:
    • इसे दुनिया की सबसे सुंदर बतख माना जाता है।
    • नर मंदारिन की पीठ और गर्दन के पास विस्तृत नारंगी, रंगीन पंख होते हैं। नर मंदारिन अत्यधिक सुंदर होता है। मादा बतख नर मंदारिन की तुलना में कम सुंदर होती है, मादा मंदारिन के सिर का रंग ‘ग्रे’, भूरी पीठ और सफेद आँखें होती हैं।
  • भोजन:
    • ये पक्षी बीज, बलूत, छोटे फल, कीड़े, घोंघे और छोटी मछलियों को खा सकते हैं।
  • आवास:
    • ये पक्षी नदियों, धाराओं, पंक, कच्छ भूमि और मीठे पानी की झीलों सहित आर्द्रभूमि के समीप समशीतोष्ण वनों में निवास करते हैं।
    • यह पक्षी पूर्वी एशिया का मूल निवासी है लेकिन पश्चिमी यूरोप और अमेरिका में भी पाया जाता है। 
      • यह रूस, कोरिया, जापान और चीन के उत्तर-पूर्वी हिस्सों में प्रजनन करती है।
  • भारत में उपस्थिति:
    • ये बतख कभी-कभी ही भारत में आते हैं क्योंकि भारत उनके प्रवास मार्ग में नहीं आता है।
    • इस पक्षी को वर्ष 1902 में तिनसुकिया (असम) में रोंगागोरा क्षेत्र में डिब्रू नदी में देखा गया था।
    • इस बतख को वर्ष 2013 में मणिपुर की लोकटक झील में देखा गया तथा वर्ष 2014 में असम के बक्सा ज़िले में स्थित टाइगर रिज़र्व और मानस नेशनल पार्क में स्थित सातावोनी बील में देखा गया।
  • IUCN रेड लिस्ट: कम संकटग्रस्त
  • मगुरी-मोटापुंग बील
    • मगुरी मोटापुंग आर्द्रभूमि, बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी द्वारा घोषित एक महत्त्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र है जो ऊपरी असम में डिब्रू सिखोवा नेशनल पार्क के करीब स्थित है।
    • मई 2020 में ‘ऑयल इंडिया लिमिटेड’ के स्वामित्व वाले गैस कुएँ में विस्फोट और आग के कारण इस बील पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
      • इस वजह से हुए तेल के फैलाव से कई मछलियों, साँपों के साथ-साथ लुप्तप्राय गंगा डॉल्फिन की मृत्यु के मामले सामने आए।

विश्व का सबसे छोटा सरीसृप

World’s Smallest Reptile

वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि उन्होंने पृथ्वी पर अब तक के सबसे छोटे सरीसृप की खोज की है। यह गिरगिट की एक उप-प्रजाति है जो कि बीज के आकार के बराबर है।

  • मेडागास्कर में जर्मन-मेडागास्कन शोध दल द्वारा दो छोटी छिपकलियों की खोज की गई थी।

World-smallest-reptile

प्रमुख बिंदु:

शोध के बारे में:

  • इस दल ने वर्ष 2012 में एक अभियान के दौरान इस प्रजाति के एक नर और मादा को खोजा, इसे ‘ब्रुकेशिया नाना’ (Brookesia Nana) के नाम से जाना जाता है।
  • नर ‘ब्रुकेशिया नाना’ या नैनो-गिरगिट का शरीर सिर्फ 13.5 मिमी. का होता है। सिर से पूँछ तक इसकी लंबाई 22 मिमी. होती है, जबकि मादा लगभग 29 मिमी. से अधिक बड़ी होती है।
  • म्यूनिख के ‘बवेरियन स्टेट कलेक्शन ऑफ ज़ूलॉज़ी’ के अनुसार, नैनो-गिरगिट सरीसृपों की लगभग 11,500 ज्ञात प्रजातियों में यह प्रजाति सबसे छोटी है।
    • इससे पहले गिरगिट प्रजाति ‘ब्रुकेशिया माइक्रा’ को सबसे छोटा माना जाता था। इस प्रजाति के वयस्कों की औसत लंबाई 16 मिमी. (पूँछ के साथ 29 मिमी.) है, जबकि सबसे छोटे वयस्क नर की लंबाई 15.3 मिमी. दर्ज की गई है।
    • सबसे लंबा ‘रेटिकुलेटेड पायथन’ (Reticulated Python) जो कि लगभग 6.25 मीटर लंबा होता है,  लगभग 289 ब्रुकेशिया नाना की लंबाई के बराबर होता है। 
  • यह नया गिरगिट केवल उत्तरी मेडागास्कर में एक निम्नीकृत पर्वतीय वर्षावन में पाया जाता है और इसके विलुप्त होने का खतरा भी है।
    • नैनो गिरगिटों को पहले वनोन्मूलन की समस्या का सामना करना पड़ा, लेकिन उनके आवास अब संरक्षित हैं।
  • अपनी रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने यह सुझाव दिया कि इस गिरगिट को अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संगठन (IUCN) की रेड लिस्ट में संकटग्रस्त रूप में सूचीबद्ध किया जाना चाहिये, जो इसकी और इसके निवास स्थान की सुरक्षा में मदद करेगा।

गिरगिट:

  • गिरगिट ‘कैमिलिओनिडाए’ (Chamaeleonidae) परिवार का एक जीव है, जून 2015 में वर्णित एक तथ्य के अनुसार, यह 202 प्रजातियों के साथ ‘ओल्ड वर्ल्ड लिज़ार्ड’ का एक अद्वितीय और अत्यधिक विशिष्ट वंश है।
  • गिरगिट आरोहण और दृश्य शिकार (Visual Hunting) के अनुकूल होते हैं। वे गर्म आवासों में रहते हैं जो कि वर्षावन से लेकर मरुस्थलों में पाए जाते हैं। वे शरीर का रंग बदलने की क्षमता के लिये जाने जाते हैं।
  • भारतीय गिरगिट भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका में पाया जाता है।
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