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निबंध

युद्ध की सर्वोच्च कला: बिना लड़े शत्रु को परास्त करना

  • 19 Jan 2026
  • 90 min read

दो हज़ार वर्ष से भी पहले, चीनी दार्शनिक एवं सेनानायक सुन त्ज़ू ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ द आर्ट ऑफ वॉर में लिखा था, “युद्ध की सर्वोच्च कला बिना लड़े शत्रु को परास्त करना है।” ये गहन शब्द आज भी सदियों बाद उतने ही प्रासंगिक हैं और युद्धक्षेत्र की सीमाओं से आगे बढ़कर आधुनिक रणनीति, कूटनीति तथा राज्य संचालन की आधारशिला बन चुके हैं। सुन त्ज़ू का यह विचार किसी भी कीमत पर संघर्ष से बचने की वकालत नहीं करता, बल्कि रणनीतिक उत्कृष्टता के सर्वोच्च स्तर को दर्शाता है, जहाँ दूरदर्शिता, छल और अनुनय की क्षमता के माध्यम से अपने उद्देश्यों को इतने निर्णायक रूप से प्राप्त किया जाता है कि शारीरिक संघर्ष अनावश्यक हो जाए। सार रूप में, यह हिंसा की बजाय विवेक के माध्यम से विजय की अवधारणा है। भारत जैसे देश के लिये, जिसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक चेतना लंबे समय से अहिंसा एवं नैतिक प्रभाव को महत्त्व देती रही है, सुन त्ज़ू का यह सिद्धांत केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि 21वीं सदी के जटिल शक्ति-समीकरणों में मार्गदर्शन देने वाला एक व्यावहारिक ढाँचा है। यह दर्शन भारतीय चिंतन में भी गहराई से निहित है, जहाँ नैतिक बुद्धिमत्ता को प्रायः शारीरिक बल से श्रेष्ठ शक्ति माना गया है।

सुन त्ज़ू का यह कथन इस विश्वास को अभिव्यक्त करता है कि वास्तविक विजय विनाश में नहीं, बल्कि रणनीति में निहित होती है। उनके अनुसार, एक बुद्धिमान नेता शत्रु का संहार करके नहीं, बल्कि उसके प्रतिरोध करने की इच्छा को कमज़ोर करके विजय प्राप्त करता है। यह दृष्टिकोण मनोवैज्ञानिक युद्ध की गहरी समझ को दर्शाता है, जिसमें छल, गुप्त सूचना और कूटनीति को विजय के प्रमुख साधन माना गया है। यह दर्शन भारतीय राजनीतिक चिंतन में भी गहरी प्रतिध्वनि पाता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र (चौथी शताब्दी ईसा पूर्व) में राज्य संचालन की चार नीतियाँ, साम (समझौता), दान (उपहार या रियायत), भेद (विभाजन या कूटनीति) और दंड (दंड या युद्ध), संघर्ष समाधान की एक निरंतर प्रक्रिया को दर्शाती हैं, जिसमें दंड को अंतिम उपाय माना गया है। चंद्रगुप्त मौर्य को दिये गए कौटिल्य के परामर्श में यह स्पष्ट किया गया है कि शासक की वास्तविक कुशलता अनावश्यक युद्ध किये बिना विजय प्राप्त करने में है। इसी प्रकार, महाभारत में भगवान कृष्ण का हस्तिनापुर का शांति-दूत प्रस्ताव तर्क और कूटनीति के माध्यम से विनाशकारी कुरुक्षेत्र युद्ध को टालने का प्रयास था, जो हिंसा पर शांति की नैतिक और रणनीतिक श्रेष्ठता को प्रतिबिंबित करता है। आधुनिक काल में महात्मा गांधी ने सत्याग्रह, अर्थात सत्य से उत्पन्न शक्ति, के माध्यम से इस प्राचीन ज्ञान को नैतिक और राजनीतिक पूर्णता तक पहुँचाया। नैतिक दृढ़ता को तलवार से भी अधिक शक्तिशाली अस्त्र बनाकर गांधी जी ने यह सिद्ध किया कि एक भी गोली चलाए बिना सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को परास्त किया जा सकता है। उनका अहिंसक प्रतिरोध का दर्शन सुन त्ज़ू की युद्ध-कला का नैतिक माध्यमों से साकार हुआ सबसे सशक्त आधुनिक उदाहरण है।

इतिहास यह दर्शाता है कि महानतम नेताओं ने अक्सर युद्ध के माध्यम से नहीं, बल्कि रणनीतिक बुद्धिमत्ता और नैतिक प्रभाव के बल पर विजय प्राप्त की है। अब्राहम लिंकन की मुक्ति उद्घोषणा ने बल प्रयोग से नहीं, बल्कि नैतिक और राजनीतिक संकल्प के माध्यम से सदियों पुरानी नस्लीय दासता का अंत किया। नेल्सन मंडेला ने प्रतिशोध की बजाय सुलह के मार्ग से रंगभेद की व्यवस्था को समाप्त किया। महात्मा गांधी ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को एक वैश्विक नैतिक आंदोलन में परिवर्तित कर, सैन्य शक्ति से मुकाबला किये बिना ही साम्राज्यवादी अहंकार को परास्त किया। शीत युद्ध के दौर में संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच दीर्घकालिक वैचारिक एवं तकनीकी प्रतिस्पर्द्धा, जैसे- अंतरिक्ष दौड़, हथियारों की दौड़ और सूचना युद्ध, वैश्विक स्तर पर सुन त्ज़ू के सिद्धांत का प्रत्यक्ष उदाहरण थी। अंततः सोवियत संघ का पतन प्रत्यक्ष युद्ध के कारण नहीं, बल्कि आंतरिक थकावट, आर्थिक दबाव और वैचारिक पराजय के कारण हुआ, जो ठीक उसी प्रकार की अप्रत्यक्ष विजय थी, जिसकी कल्पना सुन त्ज़ू ने की थी।

आज के परस्पर जुड़े हुए विश्व में युद्ध अब केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है। साइबर युद्ध, आर्थिक दबाव, सूचना में हेरफेर और सॉफ्ट पावर कूटनीति संघर्ष के आधुनिक हथियार बन चुके हैं। राष्ट्र अब अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये मनोवैज्ञानिक और प्रणालीगत प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास करते हैं, जो बिना लड़े शत्रु को परास्त करने की सुन त्ज़ू की कल्पना के पूर्णतः अनुरूप है। भारत के लिये इस सिद्धांत का व्यावहारिक प्रयोग कूटनीति, प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था और सॉफ्ट पावर के संतुलित उपयोग में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जिसके माध्यम से वह क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर की जटिल चुनौतियों का प्रबंधन करता है। वर्ष 2020 में गलवान घाटी की घटना के दौरान वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के साथ उत्पन्न तनाव के पूर्ण युद्ध में बदलने की आशंका थी। भारत की प्रतिक्रिया दृढ़ता और संयम का संतुलित उदाहरण रही। एक ओर, उसने हज़ारों सैनिकों की तैनाती कर अपनी तत्परता और प्रतिरोधक क्षमता का संकेत दिया, वहीं दूसरी ओर निरंतर सैन्य एवं कूटनीतिक वार्ताएँ भी जारी रखीं। इस द्वि-आयामी रणनीति ने युद्ध की विनाशकारी लागत से बचते हुए भारत की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा की। भारत ने आक्रमण के माध्यम से नहीं, बल्कि संकल्प, वार्ता और रणनीतिक धैर्य के ज़रिये चीन को प्रमुख तनाव बिंदुओं से पीछे हटने के लिये विवश किया।

सीमा तनाव के बाद भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए टिकटॉक और वीचैट सहित 200 से अधिक चीनी मोबाइल अनुप्रयोगों पर प्रतिबंध लगा दिया। यह एक गैर-सैन्य कदम था, जिसने चीनी कंपनियों पर उल्लेखनीय आर्थिक और प्रतिष्ठागत प्रभाव डाला तथा यह स्पष्ट संकेत दिया कि भारत की प्रतिकारात्मक कार्रवाई मिसाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल माध्यमों से भी हो सकती है। साथ ही, भारत ने विरोधी देशों पर आर्थिक निर्भरता कम करने के उद्देश्य से आत्मनिर्भर भारत पहल को तीव्र किया, जिससे दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता का निर्माण हो सके। यह कदम सुन त्ज़ू की उस बुद्धिमत्ता का स्पष्ट उदाहरण है, जिसमें प्रत्यक्ष टकराव के बिना शत्रु के लाभ को कमज़ोर किया जाता है। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत की वैक्सीन मैत्री पहल के अंतर्गत भूटान, मालदीव और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों सहित 100 से अधिक देशों को लाखों वैक्सीन खुराकें उपलब्ध कराई गईं। यह सॉफ्ट पावर कूटनीति का एक उत्कृष्ट उदाहरण था, जिसने बिना टकराव के चीन की तथाकथित ‘वैक्सीन कूटनीति’ का संतुलन किया। भारत ने मानवीय सहायता को रणनीतिक प्रभाव के साधन में परिवर्तित करते हुए ग्लोबल साउथ में विश्वास, सद्भावना और साझेदारियाँ अर्जित कीं। इससे यह सिद्ध हुआ कि क्षमता के साथ जुड़ी करुणा, बल प्रयोग से कहीं अधिक प्रभावी भू-राजनीतिक शक्ति बन सकती है।

पुलवामा और उरी जैसी सीमा-पार आतंकी घटनाओं के बाद भारत ने दीर्घकालिक युद्ध का मार्ग नहीं अपनाया, बल्कि कूटनीतिक प्रयासों के साथ सटीक और नियंत्रित प्रतिक्रियाएँ दीं, जैसे- सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयरस्ट्राइक। अंतर्राष्ट्रीय जनमत को सक्रिय कर तथा FATF और संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान को अलग-थलग करके भारत ने युद्धक्षेत्र से कहीं आगे कूटनीतिक और आर्थिक क्षति पहुँचाई। सुनियोजित प्रतिकार, कूटनीति और सूचना युद्ध का यह संयोजन सुन त्ज़ू के इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि शत्रु की शक्ति ही नहीं, बल्कि उसकी लड़ने की इच्छा को कमज़ोर करना अधिक प्रभावी होता है। भारत की G20 अध्यक्षता, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन की सफलता और जलवायु कूटनीति में नेतृत्व भय या दबाव की बजाय प्रभाव के माध्यम से वैश्विक व्यवस्था को आकार देने की रणनीति को दर्शाते हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के शब्दों में, “भारत केवल संतुलनकारी शक्ति नहीं, बल्कि एक आकार देने वाली शक्ति है।” निष्क्रिय कूटनीति से सक्रिय सहभागिता की यह परिवर्तनशील यात्रा सुन त्ज़ू के सिद्धांत के पूर्णतः अनुरूप है, जिसमें दबाव नहीं, बल्कि विश्वसनीयता के माध्यम से वैश्विक सम्मान अर्जित किया जाता है।

बिना लड़े परास्त करने का सिद्धांत केवल अंतर्राष्ट्रीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत, संस्थागत और सामाजिक संघर्षों में भी समान रूप से प्रासंगिक है। शासन के क्षेत्र में प्रभावी नेता टकराव की बजाय संवाद और दूरदर्शिता के माध्यम से संकटों का समाधान करते हैं। प्रशासन में सहमति निर्माण अक्सर वह परिणाम देता है, जो बल प्रयोग से संभव नहीं होता। मनोवैज्ञानिक स्तर पर हृदय और मस्तिष्क को जीतना विजय का सबसे टिकाऊ रूप माना जाता है। सुन त्ज़ू की यह सीख स्मरण कराती है कि हिंसा प्रतिरोध को जन्म देती है, जबकि नैतिक अधिकार स्वैच्छिक स्वीकार्यता उत्पन्न करता है। अतः आधुनिक राज्य को कठोर शक्ति (अर्थात सैन्य सामर्थ्य), स्मार्ट शक्ति (अर्थात रणनीतिक प्रभाव) तथा सॉफ्ट पावर (अर्थात सांस्कृतिक और नैतिक आकर्षण) के संतुलित संयोजन को अपनाना चाहिये, क्योंकि यही त्रय समकालीन विश्व में विजय की वास्तविक कला को परिभाषित करता है।

अपनी बुद्धिमत्ता के बावजूद, यह सिद्धांत वास्तविक दुनिया में कुछ सीमाओं का भी सामना करता है। गैर-राज्य अभिकर्त्ताओं, आतंकवाद और साइबर हमलों की स्थिति में कई बार प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई आवश्यक हो जाती है, क्योंकि केवल कूटनीतिक या आर्थिक उपाय अनियमित युद्ध को रोकने में पर्याप्त नहीं होते। अत्यधिक सावधानी या संयम को विरोधी कमज़ोरी के रूप में भी देख सकते हैं, जिससे आक्रामकता को प्रोत्साहन मिल सकता है, जैसा कि चीन और पाकिस्तान द्वारा बार-बार की गई उकसावे वाली कार्रवाइयों में देखा गया है। इसके अतिरिक्त, प्रमुख शक्तियाँ अक्सर छोटे देशों का आर्थिक दबाव, प्रतिबंधों या सूचना प्रभुत्व के माध्यम से शोषण करती हैं, जो तथाकथित ‘शांतिपूर्ण युद्ध’ के रूप हैं, लेकिन फिर भी व्यापक पीड़ा उत्पन्न करते हैं। दुष्प्रचार और संकर युद्ध के इस युग में किसी विरोधी को शांतिपूर्ण ढंग से परास्त करना असाधारण खुफिया क्षमताओं और मनोवैज्ञानिक परिपक्वता की मांग करता है। अतः यद्यपि सुन त्ज़ू का सिद्धांत रणनीति का स्वर्ण मानक बना हुआ है, किंतु इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिये संतुलन, अनुकूलनशीलता और दूरदर्शिता अनिवार्य हैं।

बिना लड़े परास्त करने की कला में वास्तविक दक्षता प्राप्त करने के लिये भारत को रणनीतिक कूटनीति, आर्थिक सुदृढ़ता, साइबर क्षमता और सांस्कृतिक प्रभाव जैसे अनेक आयामों में निरंतर निवेश करना होगा। क्वाड, ब्रिक्स और SCO जैसे बहुपक्षीय मंचों को सशक्त बनाकर सहयोगात्मक प्रभाव का एक सुरक्षा कवच तैयार किया जा सकता है। व्यापार का विविधीकरण, घरेलू नवाचार को बढ़ावा और तकनीकी आत्मनिर्भरता आर्थिक दबाव से सुरक्षा प्रदान करेगी। साइबर प्रतिरोधक क्षमता तथा प्रभावी विमर्श-निर्माण की क्षमताओं का विकास दुष्प्रचार और प्रचार युद्ध का सामना करने में सहायक होगा। ICCR, योग कूटनीति और ग्लोबल साउथ के साथ साझेदारियों जैसी पहलों के माध्यम से भारतीय संस्कृति, भाषा एवं शिक्षा की वैश्विक उपस्थिति का विस्तार भारत की सॉफ्ट पावर को और मज़बूत करेगा। सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि नैतिक राज्य संचालन केंद्र में बना रहे, ताकि नैतिक विश्वसनीयता और नियम-आधारित व्यवस्था को बनाए रखते हुए भारत का उदय शांतिपूर्ण, किंतु सशक्त बना रहे। नैतिक वैधता को रणनीतिक विवेक के साथ जोड़कर भारत सुन त्ज़ू की कला के सार, अर्थात विवेक के माध्यम से विजय को साकार कर सकता है।

सुन त्ज़ू की कालजयी अंतर्दृष्टि एक सार्वभौमिक सत्य को समेटे हुए है कि शक्ति का सर्वोच्च रूप विनाश में नहीं, बल्कि अनुनय की क्षमता में निहित होता है, प्रभुत्व में नहीं, बल्कि प्रतिरोधक प्रभाव में निहित होता है। युद्ध की वास्तविक कला यह है कि युद्ध आरंभ होने से पहले ही शत्रु को समर्पण के लिये विवश कर दिया जाए। कौटिल्य से लेकर गांधी तक तथा गलवान से लेकर वैक्सीन मैत्री तक, भारत का इतिहास और आधुनिक राज्य संचालन इस तथ्य का प्रमाण है कि नैतिक, कूटनीतिक और मनोवैज्ञानिक श्रेष्ठता वह कार्य कर सकती हैं, जो केवल बल प्रयोग से संभव नहीं होता। परमाणु हथियारों, साइबर खतरों और सूचना युद्धों से भरी आज की दुनिया में मानवता का अस्तित्व संभवतः इसी कला में निपुण होने पर निर्भर करेगा। बिना लड़े परास्त करना मात्र एक रणनीति नहीं, बल्कि सभ्यता की महानतम बुद्धिमत्ता है। भारत और विश्व के लिये इसे अपनाने का अर्थ है- उस मार्ग पर आगे बढ़ना, जहाँ शक्ति और शांति का संगम होता है, जहाँ बल को संयम द्वारा संतुलित किया जाता है और जहाँ कलम, विचार तथा सत्य की नैतिक शक्ति तलवार से अधिक प्रभावशाली बनी रहती है।

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