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धर्म एवं राजनीति में सम्यक दर्शन कितना आवश्यक

  • 20 Apr 2020
  • 5 min read

जिस प्रकार नमक का धर्म खारापन, पानी का धर्म तरलता, शीतलता, अग्नि का धर्म ऊष्मा एवं प्रकाश तथा पृथ्वी की दृढ़ता है वैसे ही मानव का धर्म मानवता होता है। अपने इस धर्म से निरपेक्ष होने पर उनकी उपयोगिता और महत्ता स्वतः नष्ट हो जाती है।

जैसा कि हम जानते हैं कि धर्म एवं राजनीति का मेल घातक माना जाता है। इसे तथाकथित पढ़े लिखे लोगों द्वारा भ्रम के रूप में लाया गया है। इसे हम एक भय के रूप में पाल पोश रहे हैं इसके सामने गांधीजी के इस सम्यक दर्शनपूर्ण आग्रह की भी परवाह नहीं की कि “धर्म विहीन राजनीति” मधुमक्खी के छत्ते की तरह है जिसमें मधु को कुछ नहीं होता, किंतु वहाँ काटने वाले विषैले बर्रे के झुंड जरूर होते हैं। समस्या का हल भ्रम द्वारा नहीं अपितु केवल सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र से ही हो सकता है।

वर्तमान धर्म एवं राजनीति के स्वरूप को सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र की जरूरत है। भ्रमित ज्ञान के आधार पर हम धर्म एवं राजनीति और इनके मेलजोल पर सम्यक निश्चय नहीं कर सकते। इसके लिये धर्म और राजनीति तथा इनके परस्पर संबंधों का ऐतिहासिक संदर्भ में सही विवेचन करना आवश्यक है।

अगर धर्म की बात करें तो धर्म एक ऐसा दिव्य मंत्र है, जो संपूर्ण सृष्टि के धारण एवं संचालन के निमित्त, संपूर्ण मानवता, मानवीय मूल्यों की अभिव्यक्ति को प्राप्त कराने हेतु सभी प्रकार के कर्मों के निर्धारण एवं संपादन द्वारा मुक्ति प्रदान करने की व्यवस्था करता है। आदि पुरुष मनु के अनुसार धर्म का स्वरूप-

धृति क्षमा दमोस्तेय, शौचमिन्द्रिय निग्रहः।
धी: विधा सत्यम् अक्रोधो दशकम धर्मलक्षणम्

अर्थ- अर्थ सत्य, अहिंसा, अक्रोध, ईश्वर, धैर्य, क्षमा अंदर और बाहर की शुद्धि, अस्तेय, विद्या एवं विवेक धारण यह मनुष्य मात्र के धर्म माने जाते हैं। धर्म रूपी व्यवस्था के पालन से व्यक्ति एवं समाज दोनों की उन्नति साथ-साथ होती है एवं किसी का अहित भी नहीं होता। यह सत्य है कि सामाजिक सुरक्षा एवं सुव्यवस्था में जितना स्थान पुलिस और प्रशासन का होता है उससे कहीं ज्यादा योगदान धर्म के मूलभूत तत्त्वों एवं सिद्धांतों का होता है।

अगर राजनीति की बात की जाए तो हम कह सकते हैं कि राजनीति सामाजिक व्यवस्था का ही एक रूप है। एक निश्चित भूमि पर अपनी विशिष्ट संस्कृति और एकात्मक बहाव के साथ जीवन यापन करने वाले जब अपने राष्ट्र को जनहित में संचालित करने हेतु उचित नीति और व्यवस्था का पालन करते हैं, वह राजनीति कहा जाता है।

धर्म एवं राजनीति के स्वरूप की सम्यक विवेचना एवं समृद्ध दर्शन के उपरांत यह भ्रम खत्म हो जाता है कि राजनीति और धर्म का मेल घातक भी हो सकता है। राजनीति वह कार्यकारी व्यवस्था है जिसके द्वारा व्यष्टि एवं समष्टि के मध्य समन्वय एवं संतुलन स्थापित किया जाता है। वही धर्म, मानव के मूलभूत तत्त्व है जो उसे सुख, शांति, सामंजस्य और समृद्धि के साथ रहने की शक्ति प्रदान करते हैं। इन सिद्धांतों की बदौलत ही व्यक्ति और समाज लौकिक एवं परलोकिक उन्नति प्राप्त करता है। इस प्रकार धर्म एवं राजनीति एक ही उद्देश्य को प्राप्त करने के व्यवहारिक एवं सैद्धांतिक पहलू हैं। इन दोनों पहलुओं का मेल एक दूसरे की क्षमता बढ़ाने के लिये आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य भी है।

सामाजिक सुव्यवस्था स्थापित करने वाली राजनीति में मान्य सिद्धांतों का समावेश अनावश्यक है तभी इस दिशा में व्याप्त भ्रम दूर हो सकेगा। समावेशन न होने की स्थिति में हिंसा, अलगाव, दंगे, हाथापाई, हिंसक प्रदर्शन, हड़ताल, भ्रष्टाचार आदि में दिनोंदिन वृद्धि होगी। धर्म का प्रभाव न रहने से अधर्म का प्रभाव बढ़ेगा। जैसा की विधित है प्रकाश की अनुपस्थिति में अंधकार का प्रभुत्व हो जाता है। अतः यह स्पष्ट है कि राजनीति में धर्म का मेल घातक नहीं अपितु मंगलकारी ही होता है

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