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पर्सपेक्टिव: विदेश मंत्रालय (MEA), 2022 पर रिपोर्ट

  • 12 Apr 2023
  • 9 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में विदेश मंत्रालय (MEA), 2022 पर एक वार्षिक रिपोर्ट संसद में पेश की गई। इसके अनुसार संसदीय समिति ने भारत को विश्व में एक प्रभावशाली राष्ट्र बनाने के लिये कई सिफारिशें की हैं।

जुड़े मुद्दे

  • कार्मिकों की कमी: कई अन्य देशों, जिनकी अर्थव्यवस्था और आकार भारत की तुलना में कम थी, की तुलना में भारत की राजनयिक सेवा में सबसे कम कर्मचारी हैं। 1,011 भारतीय विदेश सेवा (IFS) अधिकारियों के पास विदेश मंत्रालय की कुल फोर्स का केवल 22.5% हिस्सा है।
  • भारत का प्रतिनिधत्व करने के लिये अपर्याप्त अधिकारी: संसदीय समिति ने सुझाव दिया है कि अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालयों और विदेशी मिशनों में भारत के हितों का उचित प्रतिनिधित्व करने के लिये पर्याप्त 'IFS A" अधिकारी नहीं हैं।
    • अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भारत की बढ़ती भागीदारी और विदेश नीति में बदलाव के कारण है, अधिकारियों की संख्या में वृद्धि की आवश्यकता है।
  • अपर्याप्त बजट आवंटन: मंत्रालय के पास वर्ष 2019-20 में सरकार के कुल बजट का 0.64% हिस्सा था। समिति की इस सिफारिश के बावजूद कि G20 अध्यक्ष पद को देखते हुए बजट आवंटन भारत के कुल बजट का कम-से-कम 1% होना चाहिये, वर्ष 2023-24 में आवंटन वर्ष 2022-23 की तुलना में में 0.44% से 0.04% कम हो गया।
    • भारत को विश्व मंच पर एक प्रमुख शक्ति और प्रभावशाली इकाई बनाने के चुनौतीपूर्ण जनादेश के बावजूद, विदेश मंत्रालय सबसे कम वित्त पोषित केंद्रीय मंत्रालयों में से एक है।
  • कैडर समीक्षा की आवश्यकता: संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों में मिशन स्थापित करने के लिये राजनयिक कैडर में कार्यबल की आवश्यकता बढ़ रही है। मंत्रालय को क्षमताओं का निर्माण करने और विस्तारित जनादेश को प्रभावी ढंग से संभालने के लिये अपने मौजूदा कर्मियों की क्षमता बढ़ाने के लिये तुरंत कैडर समीक्षा करनी चाहिये।
    • इस तरह की समीक्षा प्रमुख विकासशील देशों और पड़ोसी देशों के राजनयिक कोर की ताकत के तुलनात्मक विश्लेषण पर आधारित होनी चाहिये।
  • एक नया संगठनात्मक ढाँचा: पैनल ने विदेश मंत्रालय से अपनी क्षमताओं को बढ़ाने के लिये एक रोडमैप तैयार करने का आग्रह किया, जिसमें एक संरचनात्मक परिवर्तन या इसके संगठनात्मक ढाँचे का पूर्ण सुधार शामिल है।
  • सहायता कार्यक्रम: सरकार को सहायता कार्यक्रमों के महत्त्व और भारत के राजनयिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका को पहचानने की आवश्यकता है। अन्य देशों के विपरीत जहां सहायता कार्यक्रमों और विदेश मंत्रालयों के अलग-अलग बजट होते हैं, भारत में, वे अक्सर समान होते हैं।
    • इस कारण विदेश मंत्रालय को पर्याप्त धन आवंटित करना और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है ताकि इसे अपने जनादेश को प्रभावी ढंग से पूरा करने में सक्षम बनाया जा सके।
  • लोकतांत्रिक संरचना में लचीलेपन की कमी: जिस तरह से संयुक्त राज्य अमेरिका में सरकार की संरचना है। विभिन्न शाखाओं और नौकरशाहों के निजी क्षेत्र में आने और जाने के साथ, वहाँ यह संरचना अच्छी तरह से काम करती है, क्योंकि यह प्रणाली में लचीलेपन का एक स्तर बनाता है जो बदलती परिस्थितियों के अनुकूलन की अनुमति देता है।
    • हालाँकि भारत में सरकार को अपने लोगों की विविध आवश्यकताओं का जवाब देने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिये अधिक लचीला और अनुकूलनीय होने की आवश्यकता है।

भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस)

उत्पत्ति:

  • भारत सरकार ने 9 अक्टूबर,1946 को विदेशों में भारत के राजनयिक, काउंसलर और वाणिज्यिक प्रतिनिधित्व के लिये भारतीय विदेश सेवा की स्थापना की।
  • स्वतंत्रता के साथ, विदेश एवं राजनीतिक विभाग का लगभग पूर्ण परिवर्तन हुआ एवं यह नया विदेश मंत्रालय बन गया।
  • भारतीय विदेश सेवा की उत्पत्ति ब्रिटिश शासन में देखी जा सकती है जब "विदेशी यूरोपीय शक्तियों" के साथ व्यापार करने के लिये विदेश विभाग बनाया गया था।

IFS के तहत कार्यालय:

  • राजदूत, उच्चायुक्त, महावाणिज्यदूत, संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि और विदेश सचिव भारतीय विदेश सेवा के सदस्यों द्वारा धारित कुछ कार्यालय हैं।

आगे की राह

  • क्षमता निर्माण: विदेश मंत्रालय को अपनी क्षमताओं को बढ़ाने की ज़रूरत है, जिसमें संरचनात्मक परिवर्तन या इसके संगठनात्मक ढाँचे का पूर्ण सुधार शामिल है। यह प्रशिक्षण, प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढाँचे में निवेश के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।
  • भर्ती प्रक्रिया: IFS के लिये भर्ती प्रक्रिया को सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवारों को आकर्षित करने एवं यह सुनिश्चित करने के लिये सुव्यवस्थित करने की आवश्यकता है कि राजनयिक दल भारतीय समाज की विविधता को दर्शाए।
  • सहयोग: मंत्रालय को भारत की विदेश नीति के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिये संसाधनों और विशेषज्ञता का लाभ उठाने के लिये अन्य सरकारी विभागों, नागरिक समाज और निजी क्षेत्र के साथ सहयोग करना चाहिये।
  • कनेक्टिविटी: भविष्य में सहायता कार्यक्रम तेज़ी से महत्त्वपूर्ण हो जाएंगे एवं भारतीय विदेश मंत्रालय को अन्य देशों में कनेक्टिविटी बनाने और बुनियादी ढाँचे के विकास पर ध्यान देने की जरूरत है।
  • भारतीय डायस्पोरा पर फोकस: भारतीय डायस्पोरा बढ़ रहा है और भारत के हितों को आगे बढ़ाने और इसके मूल्यों को बढ़ावा देने के लिये विदेश मंत्रालय को उनके साथ जुड़ने की आवश्यकता है।
    • कुल मिलाकर भारतीय विदेश मंत्रालय को विश्व मंच पर भारत के हितों को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने के लिये पर्याप्त रूप से संसाधन व सुसज्जित होने की आवश्यकता है।
  • नौकरशाही प्रणाली: ब्रिटिश और यूरोपीय नौकरशाही प्रणाली लचीलेपन की चुनौती को संबोधित करने के लिये मूल्यवान सबक प्रदान कर सकती हैं। हालाँकि एक स्थायी लोकतांत्रिक ढाँचे और बदलती परिस्थितियों के अनुकूल होने की क्षमता के मध्य संतुलन बनाना महत्त्वपूर्ण है।
    • भारत सरकार को एक ऐसी प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है जो नौकरशाही प्रणाली की अखंडता को बनाए रखते हुए इस लचीलेपन की अनुमति दे।
  • लेटरल एंट्री: लेटरल एंट्री का फायदा यह है कि यह कूटनीति,अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और रणनीतिक मामलों जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान, विशेषज्ञता और अनुभव वाले व्यक्तियों को ला सकता है। ये व्यक्ति मंत्रालय को नए दृष्टिकोण और नवीन विचार प्रदान कर सकते हैं, जो जटिल विदेश नीति के मुद्दों को प्रभावी ढंग से संबोधित करने में मदद कर सकते हैं।
    • इसके अतिरिक्त पार्श्व प्रवेश शिक्षा, नागरिक समाज और सरकार के बीच की खाई को पाटने में मदद कर सकता है, जो बाहरी हितधारकों के साथ मंत्रालय की पहुँच और जुड़ाव को बढ़ा सकता है।
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