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विशेष: स्विस बैंकिंग कानून में संशोधन के निहितार्थ

  • 07 Jun 2018
  • 19 min read

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि 

अवैध धन के प्रवाह को रोकने के लिये स्विट्ज़रलैंड अपने एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग कानून में संशोधन करने जा रहा है। हालिया समय में स्विट्ज़रलैंड ने कालेधन की रोकथाम और नियंत्रण के लिये कई तरह की पहल की हैं, जो भारत सहित कई देशों से पड़ने वाले दबाव के बाद की गईं। इसी क्रम में स्विस फेडरल काउंसिल ने अब नई पहल की है और देश के एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग कानून में संशोधन की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। इस बदलाव के बाद जो कानून सामने आएगा उसमें गैरकानूनी लेन-देन पर लगाम लगाने के अलावा धन के अवैध प्रवाह पर पूरी तरह से रोक लगाना शामिल है। इसके साथ इसमें आतंकवाद से जुड़ी फंडिंग पर रोक लगाने की व्यवस्था की जा रही है। इसके लिये वहाँ की फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की ओर से भी कई सुझाव दिये गए हैं।

क्या खास है इस कानून में?

वित्तीय मध्यस्थ होगा: नए कानून के तहत खाताधारक के बारे में हर तरह की सूचना को सत्यापित या प्रमाणित करने के लिये एक वित्तीय मध्यस्थ नियुक्त करने की जरूरत होगी। बैंक सीधे तौर पर खाताधारक से लेन-देन की कोई जानकारी साझा नहीं करेगा। वित्तीय मध्यस्थ का काम खाताधारक के डाटा की समय-समय पर जाँच करना और उसे अपडेट करना होगा। 

अकाउंट्स की जानकारियाँ साझा होंगी: इसके तहत स्विट्ज़रलैंड व भारत तथा अन्य देशों के बीच वित्तीय खातों की सूचनाओं का स्वतः आदान-प्रदान किया जाएगा। इससे संदिग्ध कालेधन की जानकारी तत्काल साझा की जा सकेगी, लेकिन इसके बाद भी इस मामले में दूसरे देशों को गोपनीयता और डाटा सुरक्षा का पालन कड़ाई से करना होगा। भारत और स्विट्ज़रलैंड के बीच इस प्रकार की सुविधा 2019 से लागू होगी। 

MCAA के तहत लागू होगा: सूचनाओं का आदान-प्रदान मल्टीलेटरल कम्पीटेंट अथॉरिटी एग्रीमेंट (MCAA) पर आधारित होगा, जिसे वित्तीय खातों की सूचना के आदान-प्रदान के लिये लाया गया था। इसे ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (OECD) की ओर से तैयार किया गया है और इसके लिये अंतरराष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रखा गया है।

भारत पर क्या पड़ेगा प्रभाव?

  • पिछले वर्ष स्विट्ज़रलैंड की एक महत्त्वपूर्ण संसदीय समिति ने भारत के साथ कालेधन पर बैंकिंग सूचनाओं के स्वत: आदान-प्रदान संबंधी प्रस्ताव को मंज़ूरी दी थी, जिसके बाद 2019 से स्विस बैंकों में भारतीयों के बैंक खातों के बारे में स्वचालित व्यवस्था के तहत जानकारी मिल सकेगी।
  • स्विट्ज़रलैंड संसद के उच्च सदन की आर्थिक और कर मामलों की एक समिति ने भारत और 40 अन्य देशों के साथ इस संबंध में प्रस्तावित करार के मसौदे को मंजूरी दी थी, लेकिन इसके साथ ही व्यक्तिगत कानूनी दावों के प्रावधानों को मज़बूत करने का भी सुझाव दिया था।
  • समिति ने अपने देश की सरकार को संसद में उपरोक्त कानून संशोधन प्रस्ताव रखने को भी कहा था। इसके साथ ही समिति ने यह सुनिश्चित करने को भी कहा था कि ऐसे किसी मामले में, जहाँ व्यक्तिगत दावे के आवश्यक कानूनी अधिकार का उल्लंघन हो रहा हो, उनमें सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं होना चाहिये। 
  • इस करार और स्विट्ज़रलैंड का संशोधित एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग कानून के सामने आने के बाद अभी तक कालेधन की सुरक्षित पनाहगाह माने जाने वाले स्विट्ज़रलैंड से कालाधन रखने वालों की बराबर जानकारी मिलती रहेगी।

दोनों देशों के बीच जो सहमति बनी है उसके तहत जिन सूचनाओं का आदान प्रदान किया जा सकता है, उनमें खाता संख्या, नाम, पता, जन्म तिथि, कर पहचान संख्या, ब्याज, लाभांश, बीमा पॉलिसियों से प्राप्ति, खाते में शेष और वित्तीय परिसंपत्तियों की बिक्री से प्राप्ति शामिल हैं।

ऐसे काम करेगी यह व्यवस्था: यदि किसी भारतीय का स्विट्ज़रलैंड के किसी बैंक में खाता है, तो संबंधित बैंक वहाँ के अधिकारियों को खाते का वित्तीय ब्योरा सौंपेगा। उसके बाद स्विस अधिकारी स्वत: इन सूचनाओं को भारत में अपने समकक्षों को स्थानांतरित करेंगे, जो उसकी जाँच कर सकेंगे। लेकिन स्विट्ज़रलैंड के घरेलू बैंक ग्राहकों की गोपनीयता इससे प्रभावित नहीं होगी।

  • उपरोक्त कानून बन जाने के बाद यह करार अगले साल से लागू होगा और भारत के साथ सूचनाओं का आदान-प्रदान 2019 से शुरू हो जाएगा।

(टीम दृष्टि इनपुट)

क्या है स्विट्ज़रलैंड का बैंक गोपनीयता कानून 

  • यह कानून 1934 से लागू है। उस समय जर्मनी सहित यूरोप के कई देशों में भयंकर मुद्रास्फीति और आर्थिक मंदी के कारण धनवान लोग अपने पैसे को तटस्थ देश स्विट्ज़रलैंड की मूल्य स्थिर मुद्रा में बदलकर वहाँ के बैंकों में जमा करने लगे थे।
  • 1934 में यह कानून लागू होने के साथ ही स्विस बैंकों ने यह स्वीकार किया था कि वे देश के संघीय बैंक निगरानी आयोग द्वारा की जाने वाली निगरानी को स्वीकार करेंगे।
  • 1 जनवरी, 2009 से यह संघीय वित्त बाज़ार निगरानी आयोग (स्विस फाइनेंशियल मार्केट सुपरवाइज़री अथॉरिटी-FINMA) के हाथ में है।
  • अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर केवल यही आयोग बैंकों से जानकारियाँ माँग सकता है, पर उसे भी गोपनीयता बरतनी होगी।
  • इसका मुख्य काम यह देखना है कि बैंक अपने कामकाज में सरकारी नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं।
  • विदेशी सरकारों की प्रामाणिक शिकायत मिलने पर FINMA ही उन्हें किसी ग्राहक के बारे में आधिकारिक जानकारी दे सकता है।
  • स्विट्ज़रलैंड के इस कानून की विशेषता यह है कि जब तक किसी को ऐसे वित्तीय अपराध में लिप्त नहीं ठहराया जाता, जो स्विट्ज़रलैंड में भी अपराध है, तब तक पुलिस से लेकर कर राजस्व विभाग, राष्ट्रीय बैंक और न्यायालय भी किसी बैंक से उसके किसी ग्राहक के खाते के बारे में जानकारी नहीं माँग सकते।
  • बैंक गोपनीयता कानून की धारा 47 के अनुसार स्विट्ज़रलैंड के प्रत्येक बैंक का हर कर्मचारी, अधिकारी, बैंकिंग से जुड़ी संस्थाएँ, एजेंट, लेखा-परीक्षक (Auditor) और स्वयं बैंक निगरानी आयोग के सदस्य व कर्मचारी भी गोपनीयता बरतने के लिये बाध्य हैं।
  • इस गोपनीयता का उल्लंघन एक ऐसा आधिकारिक अपराध है, जिसकी विधिवत शिकायत (FIR) नहीं होने पर भी पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को तुरंत सक्रिय हो जाना पड़ेगा।
  • गोपनीयता कानून के लापरवाही भरे उल्लंघन की अदालती सज़ा ढाई लाख स्विस फ्रैंक (लगभग ढाई लाख डॉलर) तक का अर्थदंड है और जान-बूझकर उल्लंघन की सज़ा तीन वर्ष तक जेल या नुकसान के अनुसार अर्थदंड है।
  • सज़ा के अलावा बैंक को जो भी नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करने की वह अलग से माँग कर सकता है।

स्विस बैंकों में भारतीयों का धन
जहाँ तक स्विस बैंकों में भारतीयों के जमा धन का मामला है तो इसको लेकर कोई सर्वमान्य आँकड़ा नहीं है और इसे लेकर केवल कयास ही लगाए जाते हैं, क्योंकि इन बैंकों के गोपनीयता कानून के चलते यह पता लगा पाना लगभग असंभव है। 

  • फिर भी स्विट्ज़रलैंड के केंद्रीय बैंकिंग प्राधिकरण स्विस नेशनल बैंक के 2016 के आँकड़ों से पता चला  कि भारतीयों द्वारा स्विट्ज़रलैंड के बैंकों में जमा कराया गया पैसा 2016 में लगभग आधा यानी 67.6 करोड़ स्विस फ्रैंक (लगभग 4500 करोड़ रुपए) रह गया और अमानती तौर पर रखा गया धन 2016 के अंत में 1.1 करोड़ स्विस फ्रैंक रहा। 
  • इन आँकड़ों के अनुसार, स्विस बैंकों में भारतीयों के कुल धन में 2016 में 45 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। उक्त राशि में 37.7 करोड़ स्विस फ्रैंक ग्राहक जमाओं के रूप में, लगभग 9.8 करोड़ स्विस फ्रैंक अमानती राशि के रूप में तथा 19 करोड़ स्विस फ्रैंक अन्य देनदारियों के रूप में है।

हालाँकि इसी अवधि में स्विस बैंकों में सभी विदेशी ग्राहकों द्वारा रखा गया कुल धन मामूली रूप से बढ़कर 1420 अरब स्विस फ्रैंक यानी लगभग 96 लाख करोड़ रुपए तक पहुँच गया, जबकि एक साल पहले यह राशि 1410 अरब स्विस फ्रैंक थी।

(टीम दृष्टि इनपुट)

कैसे खुलता है स्विस बैंक में खाता?
गोपनीयता के चलते स्विस बैंकों की जो छवि भारतीय जनमानस में बनी हुई है, उसके मद्देनज़र कई प्रश्न दिमाग में कौंधते हैं, जैसे-स्विस बैंकों में खाता कैसे खोला जाता है? खाता खोलने की क्या प्रक्रिया होती है? क्या खाते के लिये अपना नाम बताना ज़रूरी होता है या नहीं? क्या सामान्य आदमी भी खोल सकता है अपना खाता? 

  • जिस तरह भारत में भी बैंक खाता खोलने के लिये KYC दस्तावेज़ मांगे जाते हैं, उसी तरह स्विस बैंक में खाता खोलने के लिये भी सरकारी एजेंसी से प्रमाणित दस्तावेज़ों, विशेषकर पासपोर्ट की कॉपी की ज़रूरत होती है। 
  • इन्हीं दस्तावेज़ों के ज़रिये सेविंग, पर्सनल और इन्वेस्टमेंट अकाउंट आदि खोले जाते हैं। इसके साथ ही खाता खुलवाने के इच्छुक को अपनी संपत्ति और धन की जानकारी भी देनी होती है तथा अपनी प्रॉपर्टी और एकाउंट्स की मूल कॉपी दिखाना आवश्यक है।
  • किसी भी स्विस बैंक में खाता खोलने के लिये ऑनलाइन आवेदन भी किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में सत्यापन के लिये बैंक को आवश्यक दस्तावेज़ ई-मेल के ज़रिये या उनकी स्कैन कॉपी को डाक या कूरियर से भेजा जा सकता है। इसके लिये एपोस्टाइल फॉर्म भरना आवश्यक है।
  • कोई भी वयस्क खोल सकता है खाता: ऐसा नहीं है कि कोई व्यक्ति विशेष ही स्विस बैंकों में अपना खाता खोल सकता है। 18 वर्ष से ऊपर आयु वाला कोई भी इनमें खाता खोलने के योग्य है, लेकिन खाता खोलने के संबंध में अंतिम अधिकार स्विस बैंकों के पास ही होता है और वह खाताधारक की गहन जाँच-पड़ताल के बाद ही इसकी इज़ाज़त देते हैं।

बिना नाम का खाता!!!
नाम जाहिर नहीं करना है तो भी आसानी से खाता खोला जा सकता है। ऐसे में नंबर के आधार पर खाता खोल दिया जाता है। यानी खाते में नाम के स्थान पर नंबर होता है। इसी गोपनीयता की वज़ह से लोगों का खाता खोलने वाले स्विस बैंक दुनिया भर में चर्चित हैं। लेकिन यदि बिना नाम बताए खाता खोलना है तो इसके लिये स्विट्ज़रलैंड जाना होगा। बिना नाम वाले स्विस खातों से सारा लेन-देन उस नंबर के ज़रिये होता है, जिसे बैंक उपलब्ध कराता है। हालाँकि बिना नाम वाला खाता खोलना आसान नहीं होता, इसमें काफी कठिन प्रक्रिया से गुज़रना होता है। आपको खुद बैंक में जाकर खुद से जुड़ी सभी जानकारियाँ देनी होती हैं और ऐसे खातों को एक लाख डॉलर की न्यूनतम राशि से ही खोला जा सकता है। ऐसे खाताधारकों की जानकारी बैंक के चुनिंदा अधिकारियों के पास ही होती है।

स्विस बैंकों को भी पता नहीं होता खाता किसका है

  • स्विट्ज़रलैंड में लगभग 400 बैंकों की लगभग 3500 शाखाएं हैं और ये सभी बैंक स्टैंडर्ड अकाउंट खोलने की सुविधा देते हैं।
  • यूबीएस एजी (यूनियन बैंक ऑफ स्विट्ज़रलैंड) और क्रेडिट स्विस ग्रुप वहाँ के दो बड़े बैंक हैं। इसके अलावा रैफिंसन ग्रुप भी देशभर में 1200 स्थानों पर सेवाएँ उपलब्ध कराता है। 
  • स्विट्ज़रलैंड के क्षेत्रीय और स्थानीय बैंक प्रायः उधार (Lending) और पारंपरिक (Traditional) डिपाज़िट एकाउंट की सुविधा देते हैं।
  • स्विट्ज़रलैंड में कुछ ऐसे निजी बैंक भी हैं जिनमें से अधिकांश सार्वजनिक रुप से सेविंग डिपाजिट के लिये आवेदन नहीं मांगते और प्रायः निजी क्लाइंट की संपत्तियों पर अपनी सुविधाओं का लाभ देते हैं। 
  • स्विस बैंक अपने खाताधारकों को एक यूनीक नंबर देते हैं और खातेदार को अपना नाम देने की ज़रूरत नही पड़ती। 
  • इस नंबर के आधार पर खाताधारक खाते का संचालन कर सकते हैं या उनके स्थान पर कोई भी अन्य व्यक्ति इस नंबर का उपयोग करके खाता चला सकता है। खाता उसी का है, यह साबित करने की ज़रूरत नही होती। 
  • इस नंबर से यह पता लगाना असंभव होता है कि खाता किस व्यक्ति का है, इतना ही नही, उक्त नंबर का खाता किस व्यक्ति का है, यह स्वयं स्विस बैंकों को भी पता नही होता।

FATF क्या है?

  • एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग एन्फोर्समेंट समूह फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) ने मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने के लिये अंतर्राष्ट्रीय मानक निर्धारित किये हैं।
  • यह 1989 में गठित दुनियाभर के देशों की सरकारों और संगठनों का एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जो मनी लॉन्ड्रिंग को नियंत्रित करने के लिये मानक निर्धारित करता है और इन मानकों के कार्यान्वयन को बढ़ावा देता है। 
  • मनी लॉन्ड्रिंग के पैसे से आतंकवादी अपनी गतिविधियों की फंडिंग करते हैं। एफएटीएफ अंतरराष्ट्रीय वित्त प्रणाली के लिये टेरर फंडिंग और अन्य खतरों को रोकने के लिये मानकों को स्थापित करने और कार्यान्वयन का काम भी करता है।
  • एफएटीएफ ने फरवरी 2012 में सिफारिशों की एक श्रृंखला विकसित की, जो टेरर फंडिंग और हथियारों के प्रसार के खिलाफ लड़ाई के व्यापक उपाय सुझाती है। 
  • एफएटीएफ ने इन उपायों के क्रियान्वयन को अनिवार्य नहीं बनाया है और प्रत्येक सदस्य देश ने इसके साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी उपाय किये हैं। 
  • प्रत्येक देश एफएटीएफ के उपायों को अपनी परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित करने के लिये स्वतंत्र है। मनी लॉन्ड्रिंग वाले उपायों को लागू करने में एफएटीएफ सदस्य देशों को मार्गदर्शन और सर्वोत्तम प्रथाओं के साथ सहायता प्रदान करता है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

निष्कर्ष: 1934 में स्विटज़रलैंड ने एक बैंकिंग कानून लागू किया था, जिसके अनुसार यदि स्विस बैंक अपने किसी भी खाताधारक का नाम और जानकारी सार्वजनिक या किसी से साझा करता है तो यह कानूनन अपराध माना जाएगा। समय के साथ अन्य सभी कानूनों और मान्यताओं में बदलाव हुए, लेकिन यह कठोर कानून जस-का-तस बना रहा। चाहकर भी स्विस बैंक किसी के नाम को सार्वजनिक नहीं कर सकते, क्योंकि इसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। लेकिन अब हालात बदलने वाले हैं और इन बैंकों में कालाधन रखना इतना आसान नहीं रह जाएगा। अब तक कालेधन की सुरक्षित पनाहगाह माने जाने वाले स्विस बैंक अब अपने ग्राहकों को उनके अघोषित धन को छिपाने का आसान रास्ता नहीं देंगे। 2015 में दावोस में विश्व आर्थिक सम्मेलन में स्विस बैंकरों ने विश्व की आर्थिक शक्तियों के दबाव में स्विस बैंक की नीतियों में बदलाव कर इसमें कानूनी सुधार करने का आश्वासन दिया था। स्विट्ज़रलैंड द्वारा एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग कानून में संशोधन करने की शुरुआत इसी की परिणति है।

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