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प्रौद्योगिकी

फेस रिकॉग्निशन

  • 18 Apr 2020
  • 10 min read

वर्तमान में पश्चिमी लोकतंत्र में ‘चेहरे की पहचान’ (Face Recognition) एक बड़ा मुद्दा हैं। यूरोपीय आयोग ने यूरोपीय संघ में चेहरे की पहचान करने वाली प्रौद्योगीकियों (Face Recognition Technologies) के प्रयोग पर  ‘पाँच वर्षीय प्रतिबंध' लागू करने पर विचार कर रही है। संयुक्त राज्य की नगरपालिकाएँ भी इसके निषेध हेतु नियम जारी कर रही है। जबकि, भारत सार्वजनिक फेस रिकॉग्निशन तकनीक को स्वीकार करने के लिये उत्सुक हैं एवं इस प्रणाली को कई प्रमुख भारतीय विमान पत्तन पर शुरु कर दिया गया है, जिसमें दिल्ली विमान पत्तन भी शामिल है। इसे डिज़ि यात्रा कार्यक्रम (Digi Yatra Initiative) के अंतर्गत स्थापित किया गया है। हाल ही में तेलंगाना चुनाव आयोग ने भी फेस रिकॉग्निशन ऐप को अपने नागरिक चुनाव में प्रारंभिक स्तर पर मतदाता प्रतिरूपण से संबंधित मुद्दों की पहचान हेतु शुरू किया है।

फेस रिकॉग्निशन

  • यह एक बायोमेट्रिक प्रणाली है जो किसी व्यक्ति की पहचान करने एवं दूसरे व्यक्ति से अंतर करने हेतु चेहरे के विशेष गुणों का प्रयोग करता है। लगभग छह दशकों में स्किन पैटर्न को पहचानने से लेकर चेहरे की 3D आकृति को बनाने तक यह प्रणाली कई मायनों में विकसित हुई है।

कार्यप्रणाली

  • प्रारंभिक स्तर पर फेस रिकॉग्निशन प्रणाली में कैमरे द्वारा चेहरे और उसकी विशेषताओं को कैप्चर किया जाता है। पुन: विभिन्न प्रकार के सॉफ्टवेयर का उपयोग कर उन विशेषताओं का पुनर्निर्माण किया जाता है।
  • चेहरे और उनकी विशेषताओं को एक साथ एक डाटाबेस में संगृहित कर इसे बैंकिग सेवा, सुरक्षा उद्देश्य इत्यादि  में उपयोग किया जा सकता है।
  • ऑटोमेटेड फेसियल रिकॉग्निशन सिस्टम (Automated Facial Recognition System- AFRS) के अंतर्गत सीसीटीवी फुटेज से प्राप्त अज्ञात व्यक्ति के चेहरे के पैटर्न को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग कर डेटाबेस में उपलब्ध पैटर्न से तुलना की जाती है।

प्रमाणिकता

  • इसका उपयोग प्रमाणिकता एवं पहचान के लिये किया जाता है एवं इसकी सफलता दर लगभग 75% है।
    • उदाहरण के तौर पर, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम (CCTNS) पुलिस के लिये आपराधिक आँकड़ों का प्रबंधन करती है एवं ऑटोमेटेड फेशियल रिकॉग्निशन का उपयोग आपराधिक की रोकथाम के साथ-साथ अज्ञात शव एवं गुमशुदा लोग तथा अपराधियों की पहचान हेतु करती है।

उद्देश्य

  • इसका उद्देश्य अन्य बायोमेट्रिक प्रणालियों, जैसे- आईरिस और फिंगरप्रिंटिंग के साथ फेस रिकॉग्निशन का सुसंगत रूप से प्रयोग करना है। फिंगरप्रिंट के आँकड़े, फेस रिकॉग्निशन सॉफ्टवेयर एवं आईरिस स्कैन  पुलिस विभाग की अपराध की जाँच क्षमताओं में बड़े पैमाने पर वृद्धि करती हैं। 

फोर्स मल्टीप्लायर

  • भारत में प्रति एक लाख नागरिकों पर 144 पुलिसकर्मी हैं। अत: फेस रिकॉग्निशन प्रणाली यहाँ बल गुणक (Force Multiplier) के रूप में कार्य कर सकती है क्योंकि  इसे न तो अधिक कार्यबल की और न ही नियमित सुधार की आवश्यकता है ।
  • प्रत्येक स्तर पर पहचान के प्रमाणन से लेकर फोन के खोलने तक, डिज़िटल फोटो के ऑटो-टैगिंग से लेकर गुमशुदा व्यक्ति के तलाश तक और लक्षित विज्ञापन से लेकर कानून को लागू करने तक अधिकाधिक रूप में इसका प्रयोग किया जा रहा है।

चुनौतियाँ

  • अवसंरचनात्मक लागत
    • आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस और बिग डेटा जैसी प्रौद्योगिकियों का क्रियान्वयन महँगा होता है। संग्रहित सूचनाओं की मात्रा बहुत बड़ी होती है और इसके लिये विशाल नेटवर्क एवं डेटाभंडारण सुविधा की आवश्यकता होती हैं जो अभी भारत मे उपलब्ध नहीं है। फिलहाल राष्ट्रीय सूचना केंद्र एवं अन्य एजेंसियों से प्राप्त सरकारी आंकड़ों को इंटरनेशनल क्लाउड का उपयोग करके एकत्रित किया जाता है।

इमेज कलेक्शन

  • संग्रहण या डेटाबेस बनाने के लिये वह स्रोत ज्ञात होना आवश्यक है जहाँ से प्रतिबिंब (इमेज) को संगृहित किया जाएगा। इसके अलावा कुछ और प्रश्न भी उठते हैं, जैसे-
    • क्या सूचना को सोशल मीडिया प्रोफाइल जैसे - टि्वटर ,फेसबुक,इंस्टाग्राम इत्यादि से एकत्रित किया जाएगा?
    •  निजी संस्थाएँ और सुरक्षा एजेंसियों के साथ इसका किस प्रकार का संबंध होगा?
    • इन इमेजेज़ को प्रवर्तन एजेंसियों के लिये कैसे उपलब्ध कराया जाएगा?

डेटाबेस की सुरक्षा

  • साइबर अपराध के बढ़ते मामलों को देखते हुए डेटाबेस को सुरक्षित रखने हेतु उपयुक्त उपाय करने होंगे ताकि सूचनाएँ लीक न हो।
  • साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू हितों के मध्य सामंजस्य के साथ-साथ इनमें आने वाली समस्याओं के निराकरण की भी आवश्यकता है।

विशेषज्ञों की आवश्यकता

  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, जहाँ कोई भी व्यक्ति किसी भी अन्य व्यक्ति की इमेजेज़ डाल सकता है,   से संग्रहित आँकड़ों की प्रमाणिकता संदिग्ध रहती है। अत: विशेषज्ञों को इस प्रकार की जानकारी को एकत्रित करने से पहले उनका परीक्षण करना आवश्यक होता है। एकत्रित आँकड़ों और डेटाबेस के दुरुपयोग को रोकने हेतु इन्हें प्रशिक्षित होना चाहिए।

विश्वसनीयता और प्रमाणिकता

  • एकत्रित किये गए आँकड़ों का प्रयोग न्यायालय में आपराधिक मुकदमों के दौरान किया जा सकता है इसलिये आंकड़ों की स्वीकार्यता, प्रामाणिकता एवं विश्वसनीयता को ध्यान में रखने की ज़रूरत है।

निजता का अधिकार

  • यद्यपि सरकार लीगल फ्रेमवर्क, जैसे- आँकड़ों की गोपनीयता की व्यवस्था कर निजता के प्रश्न को हल करने का प्रयास कर रही है फिर भी डेटा संरक्षण से जुड़े नियमों के अभाव में भारतीय नागरिक निजता के अधिकार के मामले में अत्यधिक असुरक्षित हैं। यह संवेदनशील आंकड़े हैं जिसका व्यापक स्तर पर दुरुपयोग किया जा रहा है। अत: निजता के अधिकार को उचित प्रौद्योगिकी एवं निगरानी की सहायता से सुरक्षित रखना होगा।

चुनौतियाँ

  • समय के साथ चेहरे में कई बदलाव आते हैं, उदाहरण के तौर पर एक व्यक्ति की दाढ़ी बढ़ सकती है, सीसीटीवी द्वारा ली गई अंतिम तस्वीर के बाद व्यक्ति की उम्र में परिवर्तन हो सकता है। इसके अलावा सीसीटीवी से बचने के लिये व्यक्ति अपने चेहरे को ढँक सकता है। अत: ऐसी समस्याओं का निराकरण एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।
  • हालाँकि यह दावा किया जाता है कि इस तरह की समस्याएँ विभिन्न सॉफ्टवेयर की सहायता से दूर की जा सकती हैं एवं इससे व्यक्तियों की पहचान का सर्वोत्तम तरीका सामने आ सकता है। 

आगे की राह

  • यह प्रणाली वर्तमान में उपलब्ध सूचनाओं की मदद से किसी व्यक्ति की पहचान में सहायता करता है। इसका उपयोग करके पहचान की प्रक्रिया को तेज़ किया जा सकता है। जैसे- अगर वैसे जगहों पर सीसीटीवी कैमरा है जहाँ अपराध हुए हैं तो इससे अपराधी को पहचानने में मदद मिलेगी। इस तरह पहचान की प्रक्रिया यदि मानव द्वारा संपन्न करायी जाए तो अधिक समय व धन खर्च होगा जबकि वही प्रक्रिया यदि किसी सॉफ्टवेयर की सहायता से की जाए तो धन व समय कम खर्च होने के साथ-साथ परिणाम की सटीकता भी बढ़ जाएगी। 
  • यह तकनीक उचित सुरक्षा उपायों के साथ भारत के लिये अत्यधिक आवश्यक है। भारत, जिसके पास विश्व की सबसे बड़ी आईटी कार्य बल है, के लिये यह तकनीक एक गेम चेंजर के रूप में कार्य कर सकती है।

निष्कर्ष

प्रत्येक देश की अपनी चुनौतियाँ हैं जो अद्वितीय है। भारतीय जनसंख्या के आकार को देखते हुए कह सकते हैं कि तुलनात्मक रूप से कमजोर प्रशासन के लिये सुनियोजित विकासशील तकनीक का उपयोग एक संभावित समाधान है। 

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