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पूर्वोत्तर में उग्रवाद का अंत

  • 15 Sep 2020
  • 13 min read

संदर्भ

पूर्वोत्तर क्षेत्र में अधिक-से-अधिक विद्रोही समूहों का सरकार के साथ शांति-वार्ता में शामिल होने से पिछले 5 से 6 वर्षों में उग्रवाद में भारी गिरावट दिख रही है। गृह मंत्रालय द्वारा वर्ष 2019 में जारी आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 के बाद से पूर्वोत्तर क्षेत्र में विद्रोह में कमी आ रही है।

विद्रोह के मूल कारण

  • पूर्वोत्तर में सौ से अधिक जातीय समूह हैं। यहाँ ऐसे लोग बसे हुए हैं जिनकी संस्कृति की एक अलग एवं विशिष्ट पहचान है। इनमें से प्रत्येक समुदायों में पहचान की एक प्रबल भावना होती है।
  • क्षेत्र ऐसे कई समूह इस विशिष्टता को राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी अभिव्यक्त करना चाहते हैं। इसके कारण क्षेत्र में कई विभाजनकारी ताकतें कार्य कर रही हैं, जिससे इस क्षेत्र में उग्रवाद का जन्म हुआ है।
  • जब जातीय समुदायों को लगता है कि उनका प्रतिनिधित्व ठीक ढंग से नहीं हो रहा है तब वो विद्रोह करते हैं जो अनिवार्य रूप से राजनीतिक संगठनों के विरुद्ध होते हैं। उनमें यह भावना होती है कि उनके हितों की उपेक्षा की गई है, इससे हिंसक आंदोलनों का जन्म हुआ।

विद्रोह के ऐतिहासिक कारण

  • असम के मैदानी इलाकों को छोड़कर अधिकांश राज्यों को जानबूझकर ब्रिटिश सरकार के मुख्यधारा के प्रशासन से बाहर रखा गया था और भारत सरकार अधिनियम, 1935 में निर्वासित क्षेत्रों के रूप में वर्गीकृत किया गया था और नृजातीय समूहों को पिछड़ी जनजाति कहा जाता था।
  • ब्रिटिशों ने जानबूझकर उनमें यह भावना विकसित की कि वे ब्रिटिश उपनिवेश हैं और भारत के किसी भी प्रांत का हिस्सा नहीं हैं।
  • उदाहरण के लिये, नगा हिल्स असम प्रांत द्वारा शासित क्षेत्र था लेकिन बाद में उसे इससे बाहर कर दिया गया था और प्रशासन के कई हिस्सों को प्रत्यक्ष रूप से मुख्य आयुक्त द्वारा नियंत्रित किया जाता था।
  • उनमें एक भावना हमेशा से प्रसारित की गई थी कि कमोबेश वे स्वतंत्र हैं इसलिये स्वतंत्रता के बाद कई समूहों में एक स्वतंत्र राज्य बनने की महत्वाकांक्षा ने जन्म लिया। नागालैंड नेशनल काउंसिल भारत से अपनी स्वतंत्रता का दावा करने वाला पहला समूह था।

ब्रिटिश विरासत

  • अंग्रेजों ने वर्ष 1826 में असम को अपने अधिकार क्षेत्र में शामिल किया था, जिसमें बाद में उन्होंने नगा हिल्स ज़िले का निर्माण किया। नगा विरोध का सबसे पुराना संकेत नागा क्लब के गठन के साथ वर्ष 1918 में मिलता है।
  • वर्ष 1929 में नगा क्लब ने साइमन कमीशन को "उन्हें उनके स्वयं के हाल पर छोड़ देने" को कहा।
  • वर्ष 1946 में,  फिज़ो ने नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) का गठन किया, जिसने 14 अगस्त, 1947 को नगा स्वतंत्रता की घोषणा की और फिर वर्ष 1951 में एक जनमत संग्रह कराने, जिसमें भारी बहुमत ने एक स्वतंत्र राज्य का समर्थन किया, का दावा किया।
  • 1950 के दशक में, एनएनसी ने हथियार उठाए और नगा संप्रभुता के लिये हिंसा का सहारा लिया।
  • वर्ष 1975 में, एनएनसी एनएससीएन में विभाजित हो गया, जो पुनः वर्ष 1988 में एनएससीएन (आई-एम) और एनएससीएन (खापलांग) में विभाजित हो गया।

पिछले कुछ वर्षों में हिंसा में गिरावट के कारण

  • बाहरी सहायता की समाप्ति: पहले विद्रोही समूह पूर्वोत्तर राज्यों से सटे देशों में शरण लेते थे। बांग्लादेश या म्यांमार क्षेत्र का उपयोग किये बिना विद्रोही अपना अस्तित्व नहीं बचा सकते और तब तक प्रभावी ढंग से कार्य नहीं कर सकते हैं जब तक कि वहाँ से हथियारों और गोला-बारूद की आपूर्ति नहीं होती। म्यांमार और बांग्लादेश के साथ बेहतर सुरक्षा संबंधों ने इन समर्थनों को समाप्त कर दिया है।
  • वार्ताओं में संलग्नता: बहुत से विद्रोही समूह सरकार के साथ शांति वार्ताओं में शामिल थे, जिसके कारण पिछले कुछ वर्षों में हिंसक घटनाओं में कमी आई है। उदाहरण के लिये, नागा वार्ता वर्ष 1997 से चल रही थी, लेकिन वर्ष 2015 में समझौते की वास्तविक शर्तों पर बातचीत हुई और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (इसाक-मुइवा) (एनएससीएन-आईएम) और केंद्र सरकार के मध्य हस्ताक्षर किये गये।
  • वर्षों के प्रयासों से तंग आना: वर्षों से चल रहे संघर्षों में विद्रोहियों की शक्ति क्षीण हुई और इस तरह आंदोलन की तीव्रता धीरे-धीरे बेहद कम रह गई। स्थानीय आबादी वर्षों से चल रही हिंसा से तंग आ गई और विद्रोही समूहों के नेताओं की लोकप्रियता में समय के साथ गिरावट आई।
  • समय के साथ-साथ संघर्ष से निपटने में राज्य के दृष्टिकोण में भिन्नताएँ आई हैं। अभी इसे एक लंबा रास्ता तय करना है। बदलती सरकारें एवं प्रतिनिधि तथा सैनिकों कि कोशिशें भी इस दिशा में परिवर्तन ला सकती हैं।
  • हालाँकि, फिलहाल इन आंदोलनों को बनाए रखने के लिये एक नेता द्वारा इसका नेतृत्व किया जाना आवश्यक है। इन आंदोलनों ने उनके नेतृत्व को खो दिया और कई बार मतभेदों के कारण छोटे-छोटे गुटों में बँट गए।
  • विद्रोही समूहों के बीच असहमति: सरकारी बल और इसकी खुफिया इकाइयाँ एक समूह को दूसरे के खिलाफ करने में सक्षम रही हैं और विद्रोही समूहों की एकता को नष्ट किया है। बँटे हुए समूह तुलनात्मक रूप से छोटे समूह हैं और उनके पास इतना राजस्व और संसाधन नहीं हैं और इसलिये उनके पास वार्ता करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है।

नगा समझौता 2015

  • नगाओं सरकार के मध्य अब एक आम सहमति बन गई है कि राज्यों की सीमाओं में कोई परिवर्तन नहीं किया जायेगा। प्रारंभ में, नगा लोग नगा आबाद क्षेत्रों के एकीकरण के विचार पर अड़ गये थे। वो कहते थे कि एकीकरण नहीं तो कोई समाधान नहीं।
  • NSCN-IM ग्रेटर नागालैंड या नागालिम के लिये संघर्ष कर रहा है - यह पड़ोसी राज्य असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के क्षेत्रों को शामिल करके 1.2 लाख नगाओं को एकजुट करने के लिये नागालैंड की सीमाओं का विस्तार करना चाहता है।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371(क), जो नागालैंड को विशेष संवैधानिक दर्ज़े की गारंटी प्रदान करता है, को पड़ोसी राज्य मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश में नगा-आबाद क्षेत्रों तक भी बढ़ाया जा सकता है।

आगे की राह

  • कनेक्टिविटी बढ़ाना: पूर्वोत्तर राज्यों के विकास के लिये व्यापक भौगोलिक कनेक्टिविटी महत्त्वपूर्ण है। बांग्लादेश और भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग के माध्यम से भारतीय मुख्य भूमि से जुड़ने की इस परिवहन व्यवस्था को पूर्ण किया जाना चाहिये।
  • इस राजमार्ग से भारत-आसियान मुक्त व्यापार क्षेत्र के साथ-साथ दक्षिण पूर्व एशिया के बाकी हिस्सों में व्यापार एवं वाणिज्य को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
  • निरंतर सतर्कता: भारत को यह सोचकर कि उग्रवाद समाप्त हो गया है अपने सुरक्षा उपाय कम नहीं करने चाहिये तथा सतर्क रहना चाहिये। ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ नए गठित समूहों द्वारा बहुत लंबे अंतराल के बाद हिंसक घटनाएँ को अंजाम दिया गया है।
  • केंद्र और राज्य सरकार को छोटे और बड़े सभी समूहों की पहचान करनी चाहिये और उनसे निपटना चाहिये ताकि उग्रवाद फिर से न फैले।
  • लोगों की आकांक्षाओं को संबोधित करना: पूर्वोत्तर में संघर्ष लोगों की आकांक्षाओं की शारीरिक अभिव्यक्ति है। इस प्रकार उनके साथ निरंतर संवाद स्थापित करके लोगों की आकांक्षाओं को संबोधित करने की आवश्यकता है।
  • शांति समझौतों की सफलता का मूल्यांकन सैन्य परिणामों की तुलना में सामाजिक-आर्थिक परिणामों पर अधिक किया जाना चाहिये।
  • भ्रष्ट मेल-जोल को समाप्त करना: मुद्दों को स्थायी रूप से हल करने के लिये हितधारकों की पहचान करने और उनके मुद्दों को संबोधित करने की आवश्यकता है। पूर्वोत्तर में चुनाव परिणाम अक्सर इस आधार पर निर्धारित किये जाते हैं कि राजनीतिक दल किन समूहों के प्रति निष्ठा रखते हैं।
  • इस प्रकार राज्य विधायिका और इन भूमिगत समूहों से जुड़े भ्रष्टाचार के दुष्चक्र को समाप्त किया जाना चाहिये।
  • दूरदर्शी नीति: एक संरचित प्रतिपक्ष नीति की आवश्यकता है जिसमें भविष्य में इस तरह के उग्रवाद से निपटने के लिये सभी हितधारकों से परामर्श करके सरकार द्वारा सभी कारकों पर विचार किया जाना चाहिये।
  • अधिक एकीकरण: स्थानीय आबादी के बीच अपनेपन की भावना को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कोहिमा युद्ध जैसे भारत में उनके योगदान के लिये उनमें गर्व की भावना उत्पन्न की जानी चाहिये।

निष्कर्ष

  • यह केवल एक चक्र का अंत है जहाँ आंदोलन में शामिल एक पीढ़ी काफी जीर्ण-शीर्ण हो गई है। हालाँकि स्थानीय आबादी में अभी भी विद्रोह की भावना है और भावनात्मक रूप से अपने मनोरथ से जुड़ी हुई है, केवल माँग रखने का तरीका हिंसक से अहिंसक में परिवर्तित हो गया है।
  • राजनीतिक आकांक्षाओं को हिंसा के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। ऐसी भावना को हतोत्साहित किया जाना चाहिये। इसके लिये पूर्वोत्तर राज्यों का राजनीतिक सशक्तीकरण होना चाहिये और सुशासन को जमीनी स्तर तक पहुँचना चाहिये।
  • इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिये कि क्षेत्र के समग्र विकास के लिये लोगों की आकांक्षाओं को पूरा किया जाये।

अभ्यास प्रश्न: पूर्वोत्तर में विभिन्न विद्रोही समूह का सरकार के शांति वार्ता पर संक्षिप्त टिप्पणी करते हुए इसके प्रभावों की चर्चा कीजिये।

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