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देश देशांतर : ओआईसी में भारत

  • 05 Mar 2019
  • 14 min read

संदर्भ

अबु धाबी में आयोजित ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन (Organisation of Islamic Cooperation-OIC) की 46वीं बैठक में भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने वैश्विक शांति और भाइचारे पर ज़ोर दिया और आतंकवाद पर दो टूक कहा कि कुछ देश आतंकवाद को पालने में लगे हुए हैं। आतंकवाद को पनाह और फंडिंग बंद होनी चाहिये क्योंकि बढ़ता आतंकवाद पूरी दुनिया के लिये खतरा है। उन्होंने साफ किया कि लड़ाई आतंकवाद के खिलाफ है और इसका किसी मज़हब से कोई लेना-देना नहीं है।

  • OIC के संस्थापक सदस्य देश पाकिस्तान ने हमेशा की तरह भारत को आमंत्रित करने का विरोध किया लेकिन वह कामयाब नहीं हो सका।
  • यह पहला मौक़ा है जब OIC ने भारत को 'गेस्ट ऑफ़ ऑनर' के तौर पर विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेने के लिये आमंत्रित किया है।
  • 57 सदस्यों वाले OIC के मंच पर भारत पिछले करीब 50 वर्षों के इतिहास में पहली बार शामिल हुआ है। इसे भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव और पाकिस्तान को बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है।

भारत OIC का सदस्य क्यों नहीं बन सका है?

  • दुनिया में भारत में मुसलमानों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है (इंडोनेशिया पहले स्थान पर है) फिर भी भारत OIC का सदस्य नहीं है।
  • OIC का पहला सम्मेलन 1969 में रबात (मोरक्को की राजधानी) में आयोजित किया गया था। उस समय पाकिस्तान दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश था।
  • पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल याह्या खान ने धमकी दी थी कि अगर भारत को सदस्यता की अनुमति दी गई तो वह इस सम्मेलन का बहिष्कार करेंगे।
  • OIC के लिये यह एक कूटनीतिक आपदा होती, अगर दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश इससे बाहर हो जाता।
  • इसलिये जॉर्डन के राजा हसन जो इस सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे थे, ने अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए भारत को दिये गए निमंत्रण को वापस ले लिया और फखरुद्दीन अली अहमद के नेतृत्व वाले भारतीय प्रतिनिधिमंडल को मोरक्को में प्रवेश करने से रोक दिया। इस प्रकार भारत OIC का सदस्य नहीं बन सका।
  • उस समय इस संगठन का नाम ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक कंट्रीज था जिसे वर्तमान में ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक को-ऑपरेशन के नाम से जाना जाता है।

ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक को-ऑपरेशन

  • यह एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है जिसकी स्थापना 1969 में हुई थी, जिसमें 57 सदस्य राष्ट्र शामिल हैं। यह संयुक्त राष्ट्र के बाद दूसरा सबसे बड़ा अंतर-सरकारी संगठन है।
  • अंतर-सरकारी संगठन (Inter-governmental Organization-IGO) शब्द संधि द्वारा बनाई गई एक इकाई को संदर्भित करता है, जिसमें दो या दो से अधिक राष्ट्र शामिल होते हैं जो सामान्य हित के मुद्दों पर आपसी विश्वास के साथ काम करते हैं। संधि के अभाव में IGO का कानूनी रूप से अस्तित्व नहीं होता है।
  • OIC के पास संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ के स्थायी प्रतिनिधिमंडल हैं। इसका प्रशासनिक केंद्र (मुख्यालय) जेद्दा, सऊदी अरब में स्थित है।
  • इसका उद्देश्य मुस्लिम जगत की सामूहिक आवाज़ उठाना तथा अंतर्राष्ट्रीय शांति और सद्भाव को बढ़ावा देने की भावना से मुस्लिम दुनिया के हितों की रक्षा और सुरक्षा के लिये सामूहिक रूप से काम करना है।

OIC का निमंत्रण भारत के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • भारतीय विदेश मंत्री का अबु धाबी दौरा सिर्फ इसीलिये खास नहीं है कि OIC की इस बैठक में भारत को ‘गेस्ट ऑफ़ ऑनर’ के रूप में बुलाया गया, बल्कि इसलिये भी कि मुस्लिम दुनिया के करीब आने का हमारे लिये यह एक सुनहरा मौका है। बरसों का वह टूटा नाता एक बार फिर जुड़ता हुआ दिख रहा है।
  • OIC कई मोर्चों पर भारत के लिये फायदेमंद है। कश्मीर के मसले पर अब भारत मुस्लिम राष्ट्रों तक अपनी बात आसानी से पहुँचा सकता है।
  • असल में इस संगठन के सभी 57 सदस्य मुस्लिम देश हैं, जिनका एक ‘कश्मीर कॉन्टेक्ट ग्रुप’ भी है और इस ग्रुप पर पूरी तरह से पाकिस्तान का कब्ज़ा है।
  • पाकिस्तान इसका इस्तेमाल कश्मीर पर अपनी सियासत चमकाने में करता रहा है। यही कारण है कि पिछले दो दशकों से कश्मीर मसले पर यह ग्रुप जो भी बयान जारी करता रहा, वह एकतरफा होता था। भारत का पक्ष उसमें रखा ही नहीं जाता था। किंतु अब यह तस्वीर बदल सकती है।
  • 2018 में विदेश मंत्रियों के शिखर सम्मेलन के 45वें सत्र में मेज़बान देश बांग्लादेश ने इस ओर ध्यान दिलाया कि भारत में दुनिया के 10% से अधिक मुस्लिम रहते हैं।
  • बांग्लादेश ने इस सम्मेलन में भारत को पर्यवेक्षक का दर्जा देने का प्रस्ताव रखा लेकिन पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव का विरोध किया।
  • इसलिये वर्तमान निमंत्रण भारत में 185 मिलियन मुसलमानों की उपस्थिति और इसके बहुलवादी लोकाचार में उनके योगदान की एक स्वागत योग्य मान्यता है। इसलिये इसे नई दिल्ली के लिये एक महत्त्वपूर्ण कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है।
  • इसे पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने के भारत के प्रयासों के एक हिस्से के रूप में भी देखा जा सकता है।
  • यह संपूर्ण रूप से सऊदी अरब, यूएई और खाड़ी देशों के साथ भारत के बेहतर संबंधों का संकेत देता है।

भारत के राजनयिक प्रयासों की सफलता

  • बैठक में शामिल होने से भारत को रोकने में पाकिस्तान की अक्षमता और मुस्लिम दुनिया का भारत के पक्ष में खड़ा होना बड़े बदलाव को रेखांकित करता है। यह मध्य-पूर्व में पाकिस्तान के प्रभाव में गिरावट की ओर भी इशारा करता है।
  • पाकिस्तान अब इस्लामी दुनिया में भारत की संभावनाओं को वीटो करने की स्थिति में नहीं है।
  • खाड़ी के देशों के साथ भारत के रिश्ते काफी सुधरे हैं और भारत सऊदी अरब तथा संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के काफी करीब आया है, जबकि इन देशों को पाकिस्तान का करीबी माना जाता रहा है।
  • वर्तमान में संपूर्ण वैश्विक परिदृश्य बदल रहा है। OIC के सभी सदस्य देशों के साथ भारत का गहरा संबंध है। सऊदी अरब के साथ ऊर्जा सुरक्षा तथा UAE के साथ इकोनॉमिक अफेंडर प्रत्यर्पण समझौते हुए हैं।
  • पश्चिम एशिया में लगभग 8 मिलियन भारतीय रहते हैं। सिर्फ सऊदी अरब से हर साल 11 बिलियन डॉलर की धनराशि भारत आता है, इससे स्पष्ट होता है कि इन देशों से भारत के कितने गहरे ताल्लुकात हैं।
  • इंडोनेशिया तथा बांग्लादेश के साथ भी भारत के गहरे संबंध हैं। बांग्लादेश ने प्रस्ताव दिया है कि भारत को OIC में पर्यवेक्षक का दर्जा दिया जाए।
  • रूस में मुस्लिम आबादी 16-20 मिलियन है जिसे पर्यवेक्षक का दर्जा मिला हुआ है, जबकि भारत में 180-190 मिलियन मुस्लिम आबादी है तो उसे पर्यवेक्षक का दर्जा क्यों नहीं मिल सकता।
  • पिछले 50 सालों में पाकिस्तानी रणनीति के चलते भारत को इस्लामिक देशों से अलग-थलग करने की कोशिश की गई लेकिन यह भारत की विदेश नीति की सफलता है कि सभी इस्लामिक देशों जैसे-टर्की, सऊदी अरब, मिस्र, मोरक्को के साथ हमारे संबंध मज़बूत हुए हैं।
  • हमारे कामगार ओमान, बहरीन, क़तर तथा कुवैत समेत सभी खाड़ी देशों के विकास में योगदान दे रहे हैं।
  • मुस्लिम देशों में ज़रूरत पड़ने पर भारत ने UN पीसकीपिंग फ़ोर्स के तहत हज़ारों की तादाद में सोल्जर भेजे हैं चाहे वह गोलन की पहाड़ी हो, लेबनान हो, मिस्र हो, इराक व कुवैत में उत्पन्न तनाव हो भारत ने अपनी फ़ोर्स भेजी है।
  • भारत ने स्माल एंड मीडियम इंडस्ट्री के क्षेत्र में इस्लामिक देशों के साथ द्वीपक्षीय सहयोग को बढ़ाया है। इन देशों से हज़ारों की तादाद में छात्र अध्ययन हेतु भारत आते रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर OIC का क्या रुख रहा है?

  • आमतौर पर OIC कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख का समर्थन करता रहा है। इसने पहले भी राज्य में कथित भारतीय अत्याचारों (Atrocities) की आलोचना करते हुए बयान जारी किये हैं।
  • OIC के विदेश मंत्रियों के 2017 के सत्र में कश्मीरी लोगों के लिये अटूट समर्थन की पुष्टि करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया था।
  • हाल ही में दिसंबर 2018 में भी OIC ने भारतीय कब्ज़े वाले कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा निर्दोष कश्मीरियों की हत्या की कड़ी निंदा की थी तथा आतंकवादी बुरहान वानी की हत्या को ‘न्यायिक परिधि से बाहर’ (extra-judicial) करार दिया था तथा कश्मीर में चुनाव को ‘हास्यास्पद’ बताया था।
  • इसने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से कश्मीर विवाद के न्यायपूर्ण और स्थायी समाधान के लिये सार्थक प्रयास करने का आह्वान किया था।

OIC का भारत विरोधी रुख बरक़रार

  • OIC की इस बैठक में भी जम्मू-कश्मीर पर एक प्रस्ताव पारित किया गया। प्रस्ताव में भारत पर कश्मीरियों के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगाया गया है।
  • OIC के प्रस्ताव में कहा गया कि जम्मू-कश्मीर पर भारत का अवैध कब्ज़ा है। प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि OIC देशों को कश्मीरियों की मदद करनी चाहिये।
  • प्रस्ताव में कश्मीर में कथित मानवाधिकार हनन के मुद्दे पर गहरी चिंता जताई गई और कहा गया कि कश्मीर विवाद पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों को लागू करना अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का दायित्व है।

निष्कर्ष

अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में कमज़ोर पड़ने के साथ ही विश्व स्तर पर बदनाम हो रहे पाकिस्तान को OIC के मौजूदा नेतृत्व से बदलते ज़माने के साथ चलना सीखना चाहिये। पाकिस्तान भारत के प्रति अपने बैर को छोड़ने के लिये तैयार नहीं है इसलिये उससे सतर्क रहने की ज़रूरत है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिये कि पाकिस्तान का अभी भी सऊदी अरब के साथ गहरा संबंध है। पाकिस्तान के सोल्जर वहाँ प्रशिक्षण देते हैं तथा कई मोर्चों पर तैनात भी हैं। UAE के साथ भी पाकिस्तान के अच्छे ताल्लुकात हैं। मुस्लिम देशों को यह समझ है कि पाकिस्तान के साथ उनको ताल्लुकात बनाए रखना होगा लेकिन वह भारत को नज़रंदाज़ भी नहीं कर सकते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि इस्लामिक देशों द्वारा यह संतुलन बनाने का एक प्रयास है। भारत को इन देशों के साथ संबंध और बेहतर बनाने की ज़रूरत है। भारत को अपने अगले कदम के रूप में OIC में पर्यवेक्षक की स्थिति प्राप्त करने के लिये अभियान शुरू करने पर होना चाहिये।

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