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भारतीय राजनीति

देश-देशांतर: न्यायिक सेवा के लिये UPSC या NEET जैसी अखिल भारतीय परीक्षा

  • 19 Jun 2018
  • 20 min read

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि 

ऐसे में जब सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति का मुद्दा सरकार और कॉलेजियम के बीच झूल रहा है, सरकार इस बात का प्रयास कर रही है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा की तर्ज पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (All India Judicial Service-AIJS) का गठन किया जाए। यदि ऐसा हो जाता है तो न्यायिक सुधारों की दिशा में एक बड़ा कदम होगा, क्योंकि तमाम प्रयासों के बावजूद पिछले 60 सालों से यह मुद्दा यूं ही लटकता आ रहा है।

  • सरकार का मानना है कि इससे अपेक्षाकृत युवा न्यायाधीशों को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों में प्रोन्नति का मौका मिल सकेगा। 
  • यह कोई पहली बार नहीं है जब सरकार इस दिशा में आगे बढ़ने की सोच रही है। पूर्व में कई बार अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की स्थापना की सिफारिश की गई, लेकिन कोई प्रगति नहीं हो सकी। 
  • कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद भी हाल ही में कह चुके हैं कि अधीनस्थ अदालतों में युवा प्रतिभाओं को मौका देने के लिये राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा होनी चाहिये। 
  • सरकार ने पिछले साल भी अखिल भारतीय न्यायिक सेवा परीक्षा कराने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन तब 9 हाई कोर्टों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था, 8 अन्य ने प्रस्तावित ढाँचे में बदलाव की मांग की थी, जबकि केवल दो ने इस विचार का समर्थन किया था। 

मुद्दा आखिर है क्या?
वर्तमान में लगभग सभी सरकारी विभागों में अखिल भारतीय सेवाएँ अस्तित्व में हैं परंतु न्याय का क्षेत्र ही ऐसा है जिसमें उच्च न्यायालय से नीचे स्तर की सभी अदालतों में नियुक्तियाँ राज्य शासन के द्वारा ही की जाती हैं।

विभिन्न स्तरों पर हो चुकी है सिफारिश 

  • अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन का विचार नया नहीं है। विधि आयोग तीन बार--पहली, आठवीं और 116वीं रिपोर्ट में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन की सिफारिश कर चुका है। 
  • इसके अलावा 1961, 1963 और 1965 के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन का पक्ष लिया गया था, लेकिन यह मुद्दा अब तक सिरे नहीं चढ़ सका है। 
  • विधि और न्याय से संबंधित संसदीय समिति ने भी अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन की न केवल सिफारिश की थी, बल्कि विधि मंत्रालय को इस संबंध में उचित कार्यवाही करने का सुझाव भी दिया था।
  • प्रथम राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग और राष्ट्रीय परामर्शदाता परिषद ने भी अखिल भारतीय सेवा के गठन को उचित माना। 
  • संविधान में भी इस बात का उल्लेख है। इसके अनुच्छेद-312 में यह प्रावधान है कि संसद विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित कर एक नई अखिल भारतीय सेवा की स्थापना कर सकती है। 
  • उपरोक्त अनुच्छेद के तहत इस सेवा की स्थापना करने के लिये 1977 में संविधान संशोधन किया गया था। 
  • इसके लिये आवश्यक विधियों को अधिनियमित कर संसद को समर्थ बनाने के लिये राज्यसभा द्वारा दो-तिहाई बहुमत से पारित एक संकल्प अपेक्षित है। 

सुप्रीम कोर्ट ने भी 1991 और 1992 में इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ और अन्य बनाम भारत सरकार एवं अन्य के मामले में 21 मार्च 2002 के अपने निर्णय में उच्चतर न्यायिक सेवा में भर्ती के बारे में प्रथम राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया था। उसने अन्य बातों के अलावा वरिष्ठता व सीमित प्रतियोगी परीक्षा के आधार पर और योग्य अधिवक्ताओं में से सिविल जज (सीनियर डिविजन) की भर्ती के लिये कोटा भी निर्धारित किया था तथा साथ ही उच्च न्यायालयों को यथासंभव शीघ्र उचित नियम तैयार करने का भी निर्देश दिया था।

(टीम दृष्टि इनपुट)

गाड़ी आगे क्यों नहीं बढ़ी?

  • इन सब के बावजूद इस प्रस्ताव पर ठोस कार्यवाही नहीं हुई है। इसका मुख्य कारण कुछ राज्यों और कुछ उच्च न्यायालयों द्वारा किया गया विरोध है, जिसकी वज़ह से केंद्र सरकार इस संबंध में कोई उचित निर्णय नहीं ले पा रही। 
  • अखिल भारतीय सेवा के अभाव में उतनी नियुक्तियाँ नहीं हो पा रही है, जितने न्यायाधीशों की आवश्यकता है। जैसे 19,726 न्यायिक पद स्वीकृत हैं परंतु उनमें से 15,438 पद भरे हुए हैं शेष लगभग 4,000 पद अभी भी खाली हैं।

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की स्थापना से लाभ

  • सबसे पहला लाभ तो यह है कि न्यायविदों की नियुक्ति में UPSC के समान निष्पक्ष एजेंसी की भूमिका होगी। इससे न्यायिक सेवा में प्रतिभावान विधि स्नातक शामिल किये जा सकेंगे, जो साधारणत: न्यायिक सेवा में भर्ती न होकर सरकारी और निजी क्षेत्र में अन्य ऐसे पदों की तलाश में रहते हैं, जहाँ उन्हें ज्यादा आर्थिक लाभ मिल सके। 
  • यदि केंद्रीय लोक सेवा आयोग से भर्ती करवाई जाएगी तो न्यायाधीशों को अन्य अखिल भारतीय सेवा के सदस्यों के समान सुविधाएँ प्राप्त होंगी। अभी स्थिति यह है कि सफल अधिवक्ता अपनी मोटी कमाई को छोड़कर न्यायपालिका में शामिल नहीं होना चाहते। 
  • इसके अलावा विभिन्न राज्यों में निम्न श्रेणी की अदालतों से लेकर हाई कोर्ट तक नियुक्ति और पदोन्नति में एकरूपता नहीं रहती है। चूंकि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश उच्च न्यायालयों से लिये जाते हैं इसलिये वह एकरूपता और प्रतिभा सर्वोच्च न्यायालय तक भी नहीं पहुँच पाती। यदि अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन होता है तो पूरी तरह से सक्षम व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचेंगे।
  • न्यायिक सेवा बनने से न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में जो पक्षपात के आरोप आए दिन लगते हैं वे भी नहीं लगेंगे। न्यायिक निर्णयों की क्षमता में भी विकास होगा। 
  • इसके साथ ही चूँकि विभिन्न केंद्रीय सेवाओं के समान वेतन, भत्ते और सेवाएँ न्यायिक सेवा में भी उपलब्ध होंगे, इसलिये अनेक प्रतिभाशाली व्यक्ति न्यायिक सेवा में नियुक्ति पाने के लिये प्रतियोगिता में शामिल होंगे।
  • वर्तमान व्यवस्था के अनुसार, उच्च न्यायालय के नीचे की अदालतों के न्यायाधीश अपने पूरे करियर में उसी राज्य में रहते हैं जहाँ उनकी नियुक्ति होती है। जब न्यायिक सेवा का चरित्र अखिल भारतीय हो जाएगा तो इन न्यायाधीशों को भी दूसरे राज्यों में सेवा करने का अवसर मिलेगा।

राज्य सरकारों एवं संबंधित उच्च न्यायालयों द्वारा विरोध 

  • इस सेवा की स्थापना के विरोध का प्रमुख कारण भाषा से संबंधित है। चूँकि CrPC एवं CPC के प्रावधानों के अनुसार अधीनस्थ न्यायालयों में लिखित आदेशों के लिये भी स्थानीय भाषा का प्रयोग किया जा सकता है। 
  • AIJS की स्थापना के पश्चात् अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों का भी अन्य राज्यों में स्थानांतरण किया जा सकेगा, जिससे उस न्यायाधीश द्वारा दूसरे राज्य में (अगर उस राज्य की स्थानीय भाषा अलग है) कार्य करना मुश्किल हो जाएगा जो न्याय की गुणवत्ता को प्रभावित करेगा। 
  • इसके अलावा अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की स्थापना से राज्य न्यायिक सेवा अधिकारियों की प्रगति में बाधा पहुँचेगी।
  • हालाँकि कुछ उच्च न्यायालय और राज्य सरकारें इसके पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे नियुक्तियों में उनकी भूमिका सिमट सकती है और वे अपना अधिकार छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
  • इनका यह मानना है कि अधीनस्थ न्यायपालिका के लिये अखिल भारतीय प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से न्यायाधीशों का चयन करना देश के संघीय ढाँचे के खिलाफ होगा।

अभी क्या है व्यवस्था?

  • संविधान के अनुच्छेद 309 और अनुच्छेद 233 एवं 234 द्वारा प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए राज्य सरकारें अपने-अपने उच्च न्यायालयों की सलाह से राज्य न्यायिक सेवा के सदस्यों के बारे में नियम और विनियम तैयार करती हैं। 
  • इसी प्रकार ज़िला/अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायिक अधिकारियों की भर्ती, नियुक्ति, स्थानांतरण और सेवा की अन्य शर्तें भी संबद्ध राज्य सरकारें तैयार करती हैं। 
  • कुछ राज्यों में चयन की प्रक्रिया राज्य लोक सेवा आयोगों के ज़रिये और कुछ अन्य राज्यों में उच्च न्यायालयों के ज़रिये संचालित की जाती हैं।

कॉमन परीक्षा भी है एक विकल्प

  • देशभर में न्यायिक सेवाओं के लिये एक ही प्रतियोगी परीक्षा कराने का विचार सरकार ने सामने रखा है। 
  • जिस तरह से IAS/IPS के चयन के लिये अखिल भारतीय स्तर पर प्रतियोगी परीक्षा होती है, उसी तरह से न्यायिक अधिकारियों के चयन के लिये ऐसी परीक्षा के आयोजन का प्रस्ताव है। 
  • देश में UPSC द्वारा की जाने वाली भर्ती प्रक्रिया काफी पारदर्शी मानी जाती है। यदि इसी तर्ज पर जिला जजों की भर्ती की जाती है तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये। 
  • ऐसी व्यवस्था से परीक्षा का पाठ्यक्रम तो एकसमान हो ही सकेगा, पेपर लीक होने या भाई-भतीजावाद की शिकायतों पर भी लगाम लगेगी।

इस संबंध में कोई प्रक्रिया तो सामने नहीं आई है, पर यह माना जा सकता है कि फिलहाल राज्यों में अधीनस्थ न्यायिक सेवा व उच्च न्यायिक सेवा के लिये आयोजित की जा रही परीक्षाओं में एकरूपता लाने के लिहाज से ही ऐसा विचार किया जा रहा है। 

केवल ज़िला जज के स्तर पर होंगी नियुक्तियाँ
42वें संविधान संशोधन के बाद अनुच्छेद 312 में किये गए प्रावधान के दायरे से ज़िला न्यायाधीश से नीचे के न्यायिक पदों को बाहर रखा गया है। अर्थात् अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के माध्यम से केवल ज़िला न्यायाधीशों के पद के लिये ही अभ्यर्थियों का चयन होगा और शेष पदों के लिये पहले की तरह ही परीक्षाओं का आयोजन करके उनकी नियुक्तियाँ होती रहेंगी।

  • उल्लेखनीय है कि देशभर की ज़िला अदालतों में इस समय लगभग पौने तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं। इन मुकदमों के तेज़ी से निपटारे के लिये इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर न्यायिक सुधारों की आवश्यकता है। 
  • सरकार को लगता है कि अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के माध्यम से देश में सक्षम न्यायाधीशों का एक पूल तैयार किया जा सकता है जिनकी सेवाएँ विभिन्न राज्यों में ली जा सकती हैं।
  • अधीनस्थ न्यायपालिका में इस समय न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के 21,320 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से करीब 25 प्रतिशत रिक्त हैं।

नीट (NEET) जैसे मॉडल का प्रस्ताव

  • इस मुद्दे पर केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट को बता चुकी है कि मेडिकल पाठ्यक्रमों में स्नातक एवं स्नातकोत्तर में प्रवेश के लिये नेशनल एलीजिबिलिटी कम एन्ट्रेन्स टेस्ट (NEET) के लिये अपनाए जाने वाले केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) मॉडल पर भी विचार किया जा सकता है।
  • सरकार ने न्यायालय को विभिन्न मॉडलों का सुझाव दिया है ताकि अधीनस्थ अदालतों में रिक्तियों को तेजी से भरा जा सके।
  • नीट मॉडल के अलावा कानून मंत्रालय ने यह प्रस्ताव भी किया है कि अभ्यर्थियों के चयन के लिये प्रस्तावित भर्ती निकाय सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक केंद्रीकृत परीक्षा आयोजित कर सकता है।
  • सरकार ने यह प्रस्ताव भी दिया कि संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) से न्यायिक अधिकारियों की भर्ती के लिये परीक्षा आयोजित करने को कहा जा सकता है, जो ऐसी विशिष्ट परीक्षा के आयोजन के लिये उच्च न्यायालयों से परामर्श कर अपनी प्रक्रियाओं में बदलाव कर सकता है।
  • यह भी सुझाव दिया गया कि निचली अदालतों में न्यायाधीशों की भर्ती के लिये इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग एंड पर्सनल सलेक्शन (IBPS) की कुछ प्रक्रियाओं का पालन किया जा सकता है।
  • उल्लेखनीय है कि वर्तमान में न्यायिक अधिकारियों की भर्ती के लिये विभिन्न हाई कोर्ट और राज्य सेवा आयोग परीक्षाओं का आयोजन करते हैं। 

द्वितीय राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग का गठन

न्यायिक सुधार का एक महत्त्वपूर्ण पहलू अदालत की कार्यप्रणाली और न्यायिक प्रक्रियाओं को पुनः संरचित करना है ताकि मामलों का शीघ्र निपटारा किया जा सके। इसी क्रम में पिछले वर्ष नवंबर में केंद्र सरकार ने अधीनस्थ न्यायपालिका के लिये द्वितीय राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग का गठन सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस (सेवानिवृत्त) जे.पी. वेंकटरामा रेड्डी की अध्यक्षता में किया था, जिसमें केरल उच्च न्यायालय के पूर्व जज आर. बसंत सदस्य हैं।

  • यह आयोग 18 माह की अवधि के भीतर राज्य सरकारों को अपनी सिफारिशें सौंप देगा।
  • यह आयोग राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों के न्यायिक अधिकारियों के वेतन व सेवा की दशाओं के वर्तमान ढाँचे की समीक्षा करेगा। 
  • इस आयोग का उद्देश्य उन सिद्धांतों का प्रतिपादन करना है जो देश में अधीनस्थ न्यायपालिका से संबंधित न्यायिक अधिकारियों के वेतनमान व अन्य परिलब्धियों को प्रशासित करने का कम करेंगे। 
  • यह आयोग वेतन के अलावा कार्यप्रणाली के तौर-तरीकों की जाँच के साथ-साथ न्यायिक अधिकारियों को मिल रहे विभिन्न भत्तों तथा गैर-नकदी लाभों की समीक्षा करेगा और इनको युक्तिसंगत बनाने व सरलीकरण के लिये भी सुझाव देगा।
  • यह आयोग इस कार्य के लिये स्वयं ही प्रक्रिया तथा जरूरी तौर-तरीके तैयार करेगा। 
  • इस आयोग का उद्देश्य देश भर में न्यायिक अधिकारियों के वेतनमान और सेवा की दशाओं को एकसमान बनाना भी है।
  • आयोग की सिफारिशें न्याय प्रशासन में दक्षता लाने और न्यायपालिका आदि में सुधार लाने तथा पूर्ववर्ती सिफारिशों में विसंगतियों को समाप्त करने में मददगार होंगी।

(टीम दृष्टि इनपुट)

निष्कर्ष: संविधान के अनुच्छेद 312 में अधीनस्थ न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के सृजन का प्रावधान किये जाने के बावजूद लगभग 60 वर्षों से यह मसला अधर में लटका है। सुप्रीम कोर्ट, विधि आयोग और केंद्र सरकार हालाँकि 1960 से ही अधीनस्थ न्यायपालिका के लिये भारतीय न्यायिक सेवा के गठन के पक्ष में रहे हैं। मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलनों में भी इस बारे में कई बार प्रस्ताव पारित किये गए, लेकिन गंभीर मतभेदों के कारण यह मूर्त रूप नहीं ले पा रहा है। केंद्र सरकार एक बार फिर इस दिशा में प्रयास कर रही है।

देश की ज़िला अदालतों में अभी जो स्थिति है, उसमें अखिल भारतीय न्यायिक सेवा अवश्य ही न्यायपालिका को अधिक जवाबदेह, दक्ष, पेशेवर एवं पारदर्शी बनाकर न्याय की गुणवत्ता एवं पहुँच में वृद्धि करेगी। नवनियुक्त न्यायाधीशों को स्थानीय भाषा सिखाकर अथवा अधीनस्थ न्यायपालिका के न्यायाधीशों का केवल राज्य के अंदर ही स्थानांतरण करने जैसे प्रावधानों से राज्यों की चिंताओं को दूर किया जा सकता है ताकि राज्य एवं उच्च न्यायालय इस सेवा की स्थापना को सहर्ष स्वीकार करें।

देश की शीर्ष अदालत का भी मानना है कि यदि अधीनस्थ न्यायपालिका में नियुक्तियों के लिये परीक्षा आयोजित करने की एक केंद्रीकृत व्यवस्था होगी तो इससे कानून की बेहतर जानकारी रखने वाले प्रतिभाशाली और योग्य व्यक्तियों का चयन संभव हो सकेगा। इससे न्यायपालिका की छवि में सुधार होगा।

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