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महत्त्वपूर्ण संस्थान/संगठन

अंतर्राष्ट्रीय संबंध

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष

  • 12 Oct 2020
  • 31 min read

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष 189 सदस्य देशों वाला एक संगठन है जिनमें से प्रत्येक देश का इसके वित्तीय महत्त्व के अनुपात में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के कार्यकारी बोर्ड में प्रतिनिधित्व हैं। इस प्रकार वैश्विक अर्थव्यवस्था में जो देश अधिक शक्तिशाली है उस देश के पास अधिक मताधिकार है।

उद्देश्य

  • वैश्विक मौद्रिक सहयोग को बढ़ावा देना।
  • वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना।
  • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और सतत् आर्थिक विकास को प्रोत्साहन देना।
  • दुनिया भर में गरीबी को कम करना।

इतिहास

  • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की अभिकल्पना जुलाई 1944 में संयुक्त राज्य के 'न्यू हैम्पशायर' में संयुक्त राष्ट्र के ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में की गई थी।
  • उक्त सम्मेलन में 44 देशों नें एक साथ मिलकर आर्थिक-सहयोग हेतु एक फ्रेमवर्क के निर्माण की बात की ताकि प्रतिस्पर्द्धा अवमूल्यन की पुनरावृत्ति से बचा जा सके जिसके कारण वर्ष 1930 के दशक में आए विश्वव्यापी महामंदी जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई थी।
  • जब तक कोई देश अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का सदस्य नहीं बनता, तब तक उसे विश्व बैंक की शाखा अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (International Bank for Reconstruction and Development-IBRD) में सदस्यता नहीं मिलती है।
  • ब्रेटन वुड्स समझौते के अनुरूप अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सहयोग को प्रोत्साहित करने के लिये IMF ने निश्चित विनिमय दरों पर मुद्रा परिवर्तन की एक प्रणाली स्थापित की और आधिकारिक भंडार के लिये सोने को यू.एस. डॉलर (प्रति औंस गोल्ड पर 35 यूएस डॉलर) से प्रतिस्थापित किया।
  • वर्ष 1971 में ब्रेटन वुड्स प्रणाली (स्थायी विनिमय दरों की प्रणाली) के समाप्त हो जाने के पश्चात् IMF ने अस्थायी विनिमय दरों की प्रणाली को प्रोत्साहित किया है। देश अपनी विनिमय व्यवस्था को चुनने के लिये स्वतंत्र हैं जिसका अर्थ है कि बाज़ार की शक्तियाँ एक दूसरे के सापेक्ष मुद्रा के मूल्यों को निर्धारित करती है। यह प्रणाली आज भी जारी है।
  • वर्ष 1973 के तेल संकट के दौरान वर्ष 1973 और 1977 के बीच तेल-आयात करने में 100 विकासशील देशों के विदेशी ऋण में 150 प्रतिशत तक की वृद्धि हो गई जिसने आगे दुनिया भर में अस्थायी विनिमय दरों को लागू करना कठिन बना दिया। IMF ने वर्ष 1974-1976 के दौरान एक न्यू लेंडिंग प्रोग्राम (New Lending Program) की शुरुआत की जिसे 'तेल सुविधा' (Oil Facility) कहते हैं। तेल आयातक राष्ट्रों एवं अन्य उधारदाताओं (Lenders) द्वारा वित्तपोषित यह सुविधा
  • उन राष्ट्रों के लिये उपलब्ध है जो तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण व्यापार-संतुलन (Balance Of Trade) बनाए रखने में समस्याओं से गुज़र रहे हों।
  • IMF, अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली के प्रमुख संगठनों में से एक है। IMF की संरचना अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवाद के पुनर्निर्माण को राष्ट्रीय आर्थिक संप्रभुता एवं मानव कल्याण के उच्चतम मूल्यांकन (Maximisation) के साथ संतुलित करने में सुविधा प्रदान करती है। इस प्रणाली को सन्निहित उदारवाद (Eembedded Liberalism) कहते हैं।
  • IMF ने पूर्व सोवियत ब्लाक के देशों की केंद्रीय योजना आधारित अर्थव्यवस्था को बाज़ार संचालित अर्थव्यवस्था में परिवर्तित करने में प्रमुख भूमिका निभाई है।
  • वर्ष 1997 के दौरान पूर्व एशिया में थाइलैंड से लेकर इंडोनेशिया और कोरिया तक एक वित्तीय संकट ने दस्तक दी थी। IMF ने इस संकट से प्रभावित अर्थव्यवस्थाओं के लिये एक राहत पैकेज़ शृंखला की शुरुआत की ताकि उन्हें डिफॉल्ट से बचने, बैंकिंग एवं वित्तीय व्यवस्था में सुधार के लिये सक्षम बनाया जा सके।
  • वैश्विक आर्थिक संकट (2008): IMF ने वैश्वीकरण एवं पूरी दुनिया को आर्थिक तौर पर जोड़ने तथा निगरानी तंत्र को मज़बूत करने हेतु प्रमुख पहलें की हैं। इन पहलों में स्पिल-ओवर (जब किसी एक देश की आर्थिक नीतियाँ किसी अन्य देशों को प्रभावित कर सकती हो) को कवर करने, वित्तीय प्रणाली एवं जोखिमों के विश्लेषण की निगरानी हेतु कानूनी ढाँचे का पुनर्निर्माण करना, आदि शामिल था।

कार्य

  • वित्तीय सहयोग प्रदान करना: भुगतान संतुलन की समस्याओं से जूझ रहे सदस्य देशों को वित्तीय सहयोग प्रदान करना और अंतर्राष्ट्रीय भंडार की भरपाई करने, मुद्रा विनिमय को स्थिर करने और आर्थिक विकास के लिये ऋण वितरण करना।
  • IMF निगरानी तंत्र: यह अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक प्रणाली का निरीक्षण करता है एवं अपने 189 सदस्य देशों की आर्थिक और वित्तीय नीतियों की निगरानी करता है। इस प्रक्रिया के एक भाग के रूप में यह निगरानी किसी एक देश के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भी की जाती है। IMF आर्थिक स्थिरता के संबंध में संभावित जोखिमों पर प्रकाश डालने के साथ ही आवश्यक नीति समायोजन (Needed policy Adjustments) पर भी सलाह देता है।
  • क्षमता विकास: यह केंद्रीय बैंकों, वित्त मंत्रालयों, कर अधिकारियों एवं अन्य आर्थिक संस्थानों को प्रौद्योगिकी सहयोग और प्रशिक्षण प्रदान करता है। यह राष्ट्रों के सार्वजनिक राजस्व को बढ़ाने, बैंकिंग प्रणाली का आधुनिकीकरण करने, मज़बूत कानूनी ढाँचे का विकास करने, शासन में सुधार करने में सहयोग करता है और वित्तीय आँकड़ों एवं व्यापक आर्थिक रिपोर्टिंग को प्रोत्साहित करता है। यह राष्ट्रों को सतत् विकास लक्ष्य (SDG) की ओर प्रगति करने में भी सहयोग करता है।

प्रशासन

  • बोर्ड ऑफ गवर्नर: इसमें एक गवर्नर एवं प्रत्येक सदस्य देश के लिये एक वैकल्पिक गवर्नर होते है। प्रत्येक सदस्य देश अपने दो गवर्नर नियुक्त करते हैं।
    • यह कार्यकारी बोर्ड के लिये कार्यकारी निदेशकों के चयन या नियुक्ति के लिये उत्तरदायी है।
    • कोटा (Quota) वृद्धि, विशेष आहरण अधिकार के आवंटन का अनुमोदन करना।
    • नये सदस्यों का प्रवेश, सदस्य की अनिवार्य वापसी।
    • समझौते के अनुच्छेदों एवं उप-नियमों की शर्तों में संशोधन।
    • मंत्री स्तरीय समिति, अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक एवं वित्तीय समिति (IMFC) और विकास समिति बोर्ड ऑफ गवर्नर को सलाह देती हैं।
    • सामान्यतः IMF एवं विश्व बैंक समूह के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की वर्ष में एक बार बैठक होती हैं, बैठक के दौरान उनके संबंधित संस्थानों के कार्यों पर चर्चा की जाती है।
  • मंत्रालय-संबंधी समितियाँ: दो मंत्री स्तरीय समितियों द्वारा बोर्ड ऑफ गवर्नर को सलाह दी जाती है।
    • अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक एवं वित्तीय समिति (IMFC): IMFC में 24 सदस्य होते हैं जिन्हें 189 गवर्नर में से चुना जाता है और ये सभी सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
      • यह समिति अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक एवं वित्तीय समिति (IMFC) के प्रबंधन पर चर्चा करती है।
      • यह समझौते के अनुच्छेदों में संशोधन के प्रस्ताव पर भी चर्चा करती है।
      • इसके साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले अन्य सामान्य मुद्दों पर भी चर्चा की जाती है।
    • विकास समिति: विकास समिति IMF के बोर्ड ऑफ गवर्नर एवं विश्व बैंक के 25 सदस्यों वाली एक संयुक्त समिति है। इस समिति का कार्य विकासशील देशों, उभरते बाज़ार एवं आर्थिक विकास से संबंधित मुद्दों पर IMF और विश्व बैंक के बोर्ड ऑफ गवर्नर को सलाह देना है।
      • यह विकास के महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर अंतर-सरकारी सहमति स्थापित करने के लिये एक मंच के रूप में कार्य करता है।
  • कार्यकारी बोर्ड: यह 24 सदस्यों वाला एक बोर्ड है जिनका चुनाव बोर्ड ऑफ गवर्नर द्वारा किया जाता है।
    • यह IMF के दैनिक कार्यों का संचालन करता है और बोर्ड ऑफ गवर्नर द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करता हैं।
    • यह IMF स्टाफ के सदस्य देशों की अर्थव्यवस्था की वार्षिक स्थिति की जाँच से लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिये प्रासंगिक नीतिगत मुद्दों तक IMF के कार्यों (Fund's work) के सभी पहलुओं पर चर्चा करता है।
    • सामान्यतः बोर्ड सहमति के आधार पर निर्णय लेता है, लेकिन कभी कभी औपचारिक मतदान भी किया जाता है।
    • प्रत्येक सदस्य का वोट उसके बेसिक वोट एवं कोटा आधारित वोट के जोड़ के बराबर होता है। एक सदस्य का कोटा उसकी मतदान शक्ति को निर्धारित करता है।
  • IMF प्रबंधन: IMF के प्रबंधन निदेशक IMF के कार्यकारी बोर्ड का अध्यक्ष एवं IMF का प्रमुख दोनों होता है। प्रबंधन निदेशक की नियुक्ति कार्यकारी बोर्ड द्वारा वोटिंग या सहमति के माध्यम से की जाती है।
  • IMF सदस्यता: कोई अन्य देश चाहे वह UN का सदस्य हो या न हो, वह बोर्ड ऑफ गवर्नर द्वारा निर्धारित शर्तों एवं IMF की अनुबंध शर्तों को अपनाकर इसका सदस्य बन सकता हैं।
    • IMF की सदस्यता अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (International Bank for Reconstruction and Development-IBRD) की सदस्यता के लिये एक शर्त है।
    • कोटा सदस्यता हेतु भुगतान: प्रत्येक सदस्य देश IMF से जुड़ने पर कुछ मुद्रा का योगदान करता है जिसे कोटा सदस्यता (Quota Subscription) कहते हैं जो देश की संपदा एवं आर्थिक प्रदर्शन पर आधारित होती है। जहाँ संयुक्त राष्ट्र महासभा में सभी सदस्यों को एक वोट का अधिकार मिलता है वहीं IMF में यह अधिकार एक कोटे के रूप में प्रदान किया जाता है जो कि एक सदस्य एक वोट के बजाय कुछ कम या ज़्यादा भी हो सकता है यह कोटा या मतदान अधिकार निम्नलिखित सूत्र से निर्धारित किया जाता है-
      • यह जीडीपी का भारित औसत है। (50% भारांक)
      • जीडीपी खुलापन (आर्थिक नीतियों में उदारीकरण)। (30% भारांक)
      • आर्थिक परिवर्तनशीलता। (15% भारांक)
      • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा भंडार। (15% भारांक)
  • सदस्य देशों की जीडीपी का मापन बाज़ार आधारित विनिमय दरों (60% भारांक) एवं पीपीपी विनिमय दरों (40% भारांक) पर आधारित मिश्रित जीडीपी के माध्यम से किया जाता है।
    • विशेष आहरण अधिकार (SDRs) IMF खाता की एक इकाई है न कि एक मुद्रा।
      • SDR की मुद्रा कीमत का निर्धारण यूएस डॉलर में मूल्यों को जोड़कर किया जाता है, जो बाज़ार विनिमय दर, मुद्राओं की एक SDR बास्केट पर आधारित होता है।
      • मुद्राओं की SDR बास्केट में यूएस डॉलर, यूरो, जापानी येन, पौंड स्टर्लिंग एवं चीनी रॅन्मिन्बी (वर्ष 2016 में शामिल) हैं।
      • SDR मुद्रा के मूल्यों का दैनिक मूल्यांकन (अवकाश को छोड़कर या जिस दिन IMF व्यावसायिक गतिविधियों के लिये बंद हो) होता है एवं मूल्यांकन बास्केट की समीक्षा तथा इसका समायोजन प्रत्येक 5 वर्ष के अंतराल पर किया जाता है। कोटा (Quotas) को SDRs में इंगित किया गया है।
      • सदस्य देशों का मतदान अधिकार सीधे उनके कोटे से संबंधित होता है।
      • IMF प्रत्येक सदस्य देशों को अपनी मुद्रा के विनिमय मूल्य की निर्धारण प्रक्रिया को चुनने की अनुमति देता है। इसके लिये आवश्यक है कि सदस्य देश अपनी मुद्रा की कीमतों का आधार स्वर्ण से तय न करते हों और अन्य सदस्यों को मुद्रा कीमतों के निर्धारण की सूचना विधि पूर्वक करते हों।

भारत और IMF

  • मुद्रा के क्षेत्र में IMF द्वारा विनियमित अंतर्राष्ट्रीय विनियमन ने भारतीय अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के विस्तार में निश्चित रूप से सहयोग किया है। भारत इन लाभदायक परिणामों से इस हद तक लाभान्वित हुआ है।
  • स्वतंत्रता और विभाजन के बाद की अवधि में भारत में अत्यधिक संकटपूर्ण आर्थिक स्थिति थी जिससे भारत में गंभीर भुगतान संतुलन घाटे की स्थिति उत्पन्न हुई। भारत का भुगतान घाटा विशेष तौर कठोर विनिमय दर वाले देशों के साथ अधिक गंभीर स्थिति में था। इसके अतिरिक्त वर्ष 1965 एवं 1971 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद उत्पन्न वित्तीय कठिनाइयों से निपटने में IMF ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया।
  • इन परिस्थितियों में भारत को अपने आयात, खाद्य, तेल एवं उर्वरक के कीमतों में तेज़ी से वृद्धि के मद्देनज़र IMF से कर्ज लेना पड़ा था। उदाहरणस्वरुप IMF की स्थापना से 31 मार्च 1971 तक भारत ने 817.5 करोड़ रुपए के मूल्यों की विदेशी मुद्रा का सहयोग कर्ज के रूप में प्राप्त कर उसका भुगतान किया गया।
  • स्वतंत्रता के पश्चात् तीव्र और समावेशी आर्थिक विकास के लिये भारत को संचार विकास, भूमि सुधार योजनाओं एवं अपने विभिन्न नदी परियोजनाओं के लिये अधिक विदेशी पूंजी की ज़रूरत थी। बड़े पैमाने पर आवश्यक पूंजी की प्राप्ति निजी विदेशी निवेशकों से संभव नहीं थी ऐसी परिस्थितियों में भारत द्वारा आवश्यक पूंजी की प्राप्ति अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (अर्थात् विश्व बैंक) से कर्ज के रूप में की गई थी।
  • उपरोक्त आर्थिक संकट की स्थिति के अतिरिक्त भारत सरकार द्वारा वर्ष 1981 में भुगतान-संतुलन के चालू खाते की स्थिति में भी बड़े पैमाने पर लगभग 5000 करोड़ रुपए का कर्ज लिया गया था।
  • इस प्रकार भारत ने IMF की विशिष्ट सुविधाओं (Services of Specialists of the IMF) का लाभ उठाया जिसका उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था का समावेशी आर्थिक विकास था जिससे आर्थिक विकास के साथ ही साथ लोगों के सामाजिक स्तर में सुधार कर मानव विकास की स्थिति प्राप्त करना था।
  • अक्तूबर 1973 से तेल कीमतों में वृद्धि के कारण भारत के भुगतान-संतुलन की स्थिति असंतुलित हो गई तब इस समस्या से निपटने हेतु IMF द्वारा गठित एक विशेष कोष के माध्यम से तेल की सुविधा का प्रयोग किया गया था।
  • वर्ष 1990 के दशक के प्रारंभ में जब भारत में मात्र दो सप्ताह का सुरक्षित विदेशी मुद्रा कोष बचा (आम तौर पर विदेशी मुद्रा कोष का 'सुरक्षित न्यूनतम भंडार' तीन महीने के बराबर होता है), भारत सरकार ने तत्काल प्रतिक्रिया करते हुए जमानत (सुरक्षा) के रूप में भारतीय गोल्ड रिज़र्व से 67 टन सोने के प्रयोग से अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से 2.2 बिलियन डॉलर का आपातकालीन ऋण प्राप्त किया।
  • भारत ने IMF से आने वाले वर्षों में विभिन्न संरचनात्मक सुधार का वादा किया जैसे- भारतीय मुद्रा का अवमूल्यन, बजट और राजकोषीय घाटे को कम करना, सरकारी खर्च एवं सब्सिडी में कमी करना, आयात उदारीकरण, औद्योगिक नीति में सुधार, व्यापार नीति में सुधार, बैंकिंग सुधार, वित्तीय क्षेत्र में सुधार, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का निजीकरण, आदि।
  • वर्तमान में भारत ने कोष के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में एक विशेष स्थान प्राप्त कर लिया है। इस प्रकार भारत ने कोष के नीतियों के निर्धारण में एक विश्वसनीय भूमिका निभाई थी। इसने अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारत की प्रतिष्ठा को बढ़ावा मिला है।

IMF की आलोचना

  • IMF की संरचना एक विवाद का क्षेत्र हैं क्योंकि इसमें यूरोप एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के पास असंतुलित मतदान और कोटा अधिकार है।
  • ऋण प्राप्त करने हेतु निर्धारित मानक बहुत ही अंतर्वेधी (Intrusive) है और वे ऋण प्राप्तकर्त्ता देश की आर्थिक एवं राजनीतिक संप्रभुता को प्रभावित करते हैं। मानक से अभिप्राय अधिक सशक्त शर्तों से हैं जो अक्सर ऋण को पॉलिसी टूल (policy tool) में बदल देते हैं। ये राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों, बैंकिंग विनियमन, सरकारी घाटे और पेंशन नीतियों जैसे मुद्दों को शामिल करते हैं। IMF देशों की विशिष्ट विशेषताओं को समझें बिना ही उन पर नीतियों को लागू करते हैं जिससे उपरोक्त देशों द्वारा उन नीतियों को पूरा करना मुश्किल हो जाता है।
  • नीतियों को एक उपयुक्त क्रम में लागू करने की बजाय एक ही बार में लागू किया गया। IMF यह मांग करता है कि देश तेज़ी से सरकारी सेवाओं का निजीकरण करें। इसके परिणामस्वरूप मुक्त बाज़ार में एक अनुशासनहीनता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

IMF सुधार

  • IMF कोटा: एक सदस्य देश वार्षिक तौर पर अपने कोटा का 200 प्रतिशत तक एवं संचित रूप में 600 प्रतिशत का उधार ले सकता हैं।
  • IMF कोटा का सामान्य अर्थ IMF के अंतर्गत वोट देने के अधिकार एवं ऋण लेने की अनुमति से होता हैं। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि IMF कोटे को इस प्रकार तैयार किया गया है कि USA का कोटा 17.7% है जो विभिन्न देशों के संचयी से भी अधिक है। G7 समूह 40% से अधिक कोटा रखता है हालाँकि IMF में भारत और रूस जैसे देशों के पास केवल 2.5% का ही कोटा है।
  • IMF के साथ असंतोष के कारण, ब्रिक्स देशों ने एक नया संगठन स्थापित किया है जिसे ब्रिक्स बैंक कहते हैं। इसकी स्थापना का उद्देश्य विश्व बैंक एवं IMF के प्रभाव को कम करना एवं विश्व में अपनी स्थिति को मज़बूत करना है। ब्रिक्स देश विश्व जीडीपी के ⅕ और विश्व जनसंख्या के ⅖ के लिये ज़िम्मेदार हैं।
  • वर्तमान कोटा प्रणाली में कोई भी सुधार असंभव है क्योंकि इसके लिये कुल वोट के 85% से अधिक की आवश्यकता है। असंतुलित मतदान अधिकार के कारण सुधार की भी बहुत ही सीमित संभावना है क्योंकि अधिक मतदान क्षमता वाले देशों द्वारा अपने विशेषाधिकारों का सीमित या कम कम करने का कोई भी व्यावहारिक प्रयास नहीं किया जा रहा है।
  • बोर्ड ऑफ गवर्नर द्वारा अनुमोदित कोटा सुधार 2010 को विलंब के साथ वर्ष 2016 में लागू किया गया था जिसका कारण अमेरिकी प्रतिबद्धता का अभाव था।
  • IMF का संयुक्त कोटा (या वे देश जो योगदान देते हैं) 238.5 बिलियन SDR (लगभग 329 बिलियन डॉलर) से बढ़कर 477 बिलियन SDR (लगभग 659 बिलियन डॉलर) हो गया है। विकासशील देशों के लिये इसमें 6% कोटा शेयर की वृद्धि हुई है जिससे विकसित देशों के कोटे में 6% शेयर में कमी हुई हैं।
  • अधिक प्रतिनिधित्व वाला कार्यकारी बोर्ड: कोटा सुधार 2010 में अनुबंध की शर्तों हेतु (Articles of Agreement) एक संशोधन भी शामिल किया गया जिसने सभी निर्वाचित कार्यकारी बोर्ड की स्थापना की, जो एक और अधिक प्रतिनिधित्व कार्यकारी बोर्ड की सुविधा देता है।
  • 15वें सामान्य कोटा समीक्षा (प्रक्रिया में) कोष के संसाधनों या स्रोत को प्रदान करते हैं और शासन सुधार की प्रक्रिया को जारी रखता है।

IMF और विश्व बैंक की तुलना

  • विश्व बैंक नीति सुधार कार्यक्रमों और परियोजनाओं के लिये ऋण देता है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष केवल नीति सुधार कार्यक्रमों के लिये ही ऋण देता है।
  • इन दोनों संस्थाओं में एक अंतर यह भी है कि विश्व बैंक केवल विकासशील देशों को ऋण देता है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के संसाधनों का इस्तेमाल निर्धन राष्ट्रों के साथ-साथ धनी देश भी कर सकते हैं।

IMF द्वारा जारी की जाने वाली रिपोर्ट्स

  • IMF द्वारा आमतौर पर एक वर्ष में दो बार वर्ल्ड इकॉनोमिक आउटलुक रिपोर्ट प्रकाशित की जाती है। इस रिपोर्ट में समष्टि अर्थशास्त्र के विभिन्न पहलुओं जैसे- आर्थिक गतिविधि, रोज़गार मुद्रास्फीति, कीमत, विदेशी मुद्रा और वित्तीय बाज़ार, बाहरी भुगतान, वित्त पोषण तथा ऋण पर विचार करते हुए अर्थव्यवस्थाओं के विकास का विश्लेषण प्रस्तुत किया जाता है।
  • ग्लोबल फाइनेंशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट (Global Financial Stability Report- GFSR) अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की एक अर्द्धवार्षिक रिपोर्ट है जो वैश्विक वित्तीय बाज़ारों की स्थिरता और उभरते-बाज़ारों के वित्तपोषण का आकलन करती है। सामान्यतः यह रिपोर्ट प्रति वर्ष दो बार, अप्रैल और अक्तूबर में जारी की जाती है।
  • IMF द्वारा प्रकाशित की जाने वाली राजकोषीय निगरानी रिपोर्ट (Fiscal Monitor Report), वैश्विक वित्तीय संकट के बाद राजकोषीय चुनौतियों से निपटने हेतु मानकों की रूपरेखा तैयार करती है।

IMF पदाधिकारी

  • वर्तमान में बुल्गारिया की अर्थशास्त्री क्रिस्टालिना जार्वीवा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की प्रमुख हैं, यह पहला मौका है जब किसी उभरती अर्थव्यवस्था से IMF के प्रमुख का चयन हुआ है।
  • जार्वीवा ने क्रिस्टीन लेगार्ड का स्थान लिया था, जिन्हें अगले पाँच साल के लिये नियुक्त किया गया है वह इससे पहले विश्व बैंक की मुख्य कार्यकारी अधिकारी थीं।

कोविड-19 महामारी के संदर्भ में IMF की भूमिका

  • वैश्विक महामारी COVID-19 ने अंतर्राष्ट्रीय ऋण की माँग में वृद्धि करते हुए उसे नए स्तर पर पहुँचा दिया है। वर्ष 2019 के अंत की तुलना में वर्ष 2021 तक उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में ऋण अनुपात सकल घरेलू उत्पाद का 20 प्रतिशत, उभरती बाज़ार अर्थव्यवस्थाओं में सकल घरेलू उत्पाद का 10 प्रतिशत और निम्न-आय वाले देशों में लगभग 7 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है।
  • विकासशील एवं निम्न आय वाले देशों की स्थिति:
    • विकासशील और निम्न आय वाले देशों की आबादी कुल वैश्विक आबादी की 70 प्रतिशत है और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में इनकी हिस्सेदारी करीब 33 प्रतिशत है। COVID-19 महामारी के कारण वैश्विक गरीबी अपने पाँव पसार रही है।
    • विश्व खाद्य कार्यक्रम के अनुसार, यह महामारी भूख से पीड़ित लोगों की संख्या में करीब दोगुनी वृद्धि (26.5 करोड़) कर सकती है। इसके अलावा आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (Organisation for Economic Cooperation and Development-OECD) की नीतिगत रिपोर्ट के अनुसार, इस वैश्विक आर्थिक संकट के चलते वर्ष 2019 के स्तर की तुलना में वर्ष 2020 में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में बाह्य निजी वित्तपोषण 700 अरब यूएस डॉलर तक सिकुड़ सकता है।
    • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund-IMF) के अनुसार, विकासशील देशों को महामारी और इसके दुष्प्रभावों से निपटने के लिये तुरंत 2.5 खरब (ट्रिलियन) अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता है।
    • अंकटाड (United Nations Conference on Trade and Development–UNCTAD) के महासचिव मुखिसा कित्युई (Mukhisa Kituyi) के अनुसार, विकासशील देशों पर कर्ज का भुगतान बढ़ रहा है, क्योंकि इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को कोविड-19 महामारी से उत्पन्न वित्तीय कठिनाइयों के कारण भारी नुकसान हुआ है, ऐसे में इस बढ़ते वित्तीय दबाव को दूर करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को तुरंत और कदम उठाने चाहिये।
  • तत्काल कार्रवाई वाले क्षेत्र:
    • ऋण सेवा निलंबन पहल (The Debt Service Suspension Initiative): सर्वप्रथम वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऋण सेवा निलंबन पहल को वर्ष 2021 तक बढ़ाया जाना चाहिये ताकि अनिश्चित ऋण समस्याओं से निपटने के लिये प्रोत्साहन मिल सके। ऋण सेवा निलंबन पहल में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक को भी शामिल करना चाहिये जिससे ऋण सुभेद्यताओं को कम किया जा सके।
    • ऋण सुभेद्य देशों का पुनर्गठन: ऋण सुभेद्य देशों में ऋण प्रबंधन और विकास को बहाल करने के उपायों के संयोजन के माध्यम से तत्काल प्रयास करने होंगे। जिन देशों में ऋण प्रबंधन की व्यवस्था अस्थिर है उनका पुनर्गठन किया जाना चाहिये। ऋण प्रबंधन के लिये निजी क्षेत्र के दावों को भी शामिल किया जाना चाहिये।
    • ऋण का मुद्रीकरण: सभी देशों की सरकारों को प्रत्यक्ष रूप से ऋण का मुद्रीकरण करना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से व्यय और वृद्धि की लागत कम करने में मदद मिलेगी। चूँकि माँग में कमी बनी हुई है इसलिये इससे मुद्रास्फीति में वृद्धि नहीं होगी।
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