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यात्रा/सफर

  • 18 Nov 2018
  • 1 min read

हम चले
तो घास ने हट कर हमें रास्ता दिया
हमारे कदमों से छोटी पड़ जाती थी पगडंडियाँ
हम घूमते रहे घूमती हुई पगडंडियों के साथ।
-कुमार अनुपम।

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं।
-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना।

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंजिल।
कोई हमारी तरह उम्र भर सफर में रहा।
-अहमद फराज।

है कोई जो बताए शब के मुसाफिरों को
कितना सफर हुआ है कितना सफर रहा है।
-शहरयार

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