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आर्थिक सर्वेक्षण

भारतीय अर्थव्यवस्था

अध्याय 1

  • 20 Apr 2020
  • 22 min read

धन संपदा सृजन: विश्वास भरे अदृश्य हाथों की भूमिका  

Wealth Creation: The Invisible Hand Supported by the Hand of Trust

आर्थिक इतिहास की तीन-चौथाई से अधिक अवधि तक भारत वैश्विक स्तर पर प्रमुख आर्थिक शक्ति रहा है तथा विश्व की जीडीपी में महत्त्वपूर्ण अंशदाता है। इतनी लंबी अवधि तक आर्थिक भागीदारी केवल अकस्मात् न होकर भारत की दक्षता को स्पष्ट करती है। इस संदर्भ में सर्वेक्षण में कहा गया है कि हमारी सदियों पुरानी परंपराओं ने हमेशा धन सृजन की सराहना की है। 

  • अर्थ सृजन पर बल देने वाली समृद्ध परंपरा होने के बावजूद भारत ने स्वतंत्रता के बाद के अनेक दशकों तक इस मॉडल को नहीं अपनाया, हालाँकि भारत ने वर्ष 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद अपनी मूल अर्थ सृजन की विचारधारा को अपनाया। 
  • उदारीकरण के बाद भारत की जीडीपी एवं प्रति व्यक्ति जीडीपी में हुई वृद्धि स्टाक बाज़ार के धनार्जन के अनुरूप है।

world-bank

बाज़ार के अदृश्य हाथों के माध्यम से धन सृजन

(WEALTH CREATION THROUGH THE INVISIBLE HAND OF MARKETS):

  • किसी भी अर्थव्यवस्था में धन सृजन तब होता है जब सही नीति के विकल्प का अनुसरण किया जाता है कई उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में धन सृजन और आर्थिक विकास का मार्गदर्शन एडम स्मिथ के ‘अदृश्य हाथ’ दर्शन के अनुसार किया जाता है जिसमे स्वतंत्र रूप से कार्य करने वाले कारोबारियों की भूमिका होती है। 
  • समाजवाद के प्रति झुकाव के बावजूद सहस्राब्दी के इतिहास में चार दशक की अल्पकालिक अवधि में भारत ने बाज़ार आदर्श को अपनाया है जो हमारी परंपरागत विरासत का प्रतिनिधित्व करता है। हालाँकि बाज़ार अर्थव्यवस्था से मिलने वाले लाभों पर संदेह अभी भी बना हुआ है।
  • भारत की प्राचीन आर्थिक समृद्धि में आतंरिक एवं बाह्य व्यापार मुख्य सहभागी थे दो मुख्य व्यापारिक मार्ग उत्तरपथा (उत्तरी सड़क) और दक्षिणपथा (दक्षिणी सड़क) व इनकी सहभागी सड़कें उपमहाद्वीप का जोड़ती थी। हालाँकि भारत ने पश्चिमी तटीय बंदरगाहों के साथ मिस्र, रोम, ग्रीस, फारस एवं अरब और पूर्व में चीन, जापान तथा दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार किया। इस व्यापार में अधिकतर बड़े कार्पोरेट समूह जो कि आज की बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हैं, की अहम भागीदारी थी। इस प्रकार वाणिज्य और समृद्धि के पीछे भारतीय सभ्यता के लोकाचार का एक आंतरिक हिस्सा है।
  • जैसा कि धन सृजन एक विशेष प्रक्रिया द्वारा होता है, आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 का व्यापक विषय धन सृजन और नीतिगत विकल्प हैं जो इसे सक्षम बनाते हैं। इस समीक्षा के मूल में नीतियाँ, संसाधन व अवरोधों के समूह के अंतर्गत अधिकतम सामाजिक कल्याण की अपेक्षा करती हैं। 
  • वर्ष 1991 के बाद के आँकड़ों से पता चलता है कि आर्थिक उदारीकरण का समग्र तौर पर और विभिन्न सेक्टरों के अंदर संपदा संवर्द्धन पर व्यापक प्रभाव रहा था।  
  • बाज़ार अर्थव्यवस्था इस सिद्धांत पर आधारित होती है कि संसाधनों का इष्टतम आवंटन तब होता है जब नागरिक उन उत्पादों या सेवाओं का स्वतंत्रता पूर्वक चयन करने में सक्षम होते हैं। 

धन सृजन के लिये उपकरण

(THE INSTRUMENTS FOR WEALTH CREATION):

1. दक्षता बढ़ाना (Enhancing Efficiency): धन सृजन के लिये दक्षता बढ़ाना आवश्यक है। दक्षता का एक महत्त्वपूर्ण आयाम अवसर से संबंधित है।

2. समान अवसर (Equal Opportunity): नए प्रवेशकों को समान अवसर देना महत्त्वपूर्ण है क्योंकि एक ज़िले में नई फर्मों में 10% की वृद्धि से सकल घरेलू ज़िला उत्पाद (Gross Domestic District Product- GDDP) में 1.8% की वृद्धि होती है। वर्ष 2006-2014 के मध्य नई फर्मों की संख्या में 3.8% की संचयी वार्षिक वृद्धि दर से वृद्धि हुई है, वहीं वर्ष 2014 से 2018 तक विकास दर 12.2% रही है।

  • वर्ष 2014 में स्थापित की गई लगभग 70,000 नई फर्मों की संख्या वर्ष 2018 में लगभग 80% बढ़कर 1,24,000 हो गई है।    
  • उद्यमिता में नए प्रवेशकों के लिये समान अवसर कुशल संसाधन आवंटन एवं उनके उपयोग को सक्षम बनाता है जो रोज़गार सृजन में सहायक होता है। उत्पाद विविधता के माध्यम से व्यापार वृद्धि एवं उपभोक्ता अधिशेष को बढ़ावा मिलता है तथा आर्थिक गतिविधि की समग्र सीमाओं को बढ़ाता है।
  • वर्ष 1991 के बाद की आर्थिक घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि धन सृजन के लिये प्रतिस्पर्द्धी बाज़ारों को मज़बूत करने हेतु नए प्रवेशकों को समान अवसर देने से लाभ हुआ है।
  • भारत की $ 5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा, व्यवसाय समर्थक नीतियों को बढ़ावा देने पर निर्भर करती है जो नए प्रवेशकों को समान अवसर प्रदान करती हैं।

3. बाज़ार अर्थव्यवस्था (Market Economy): एक बाज़ार अर्थव्यवस्था में अधिक-से-अधिक धन सृजन सभी नागरिकों के कल्याण को बढ़ावा देता है। उदाहरण के तौर पर सेंसेक्स वर्ष 1999 में पहली बार 5,000 अंक तक पहुँच गया था, जबकि वर्ष 1978 में यह 100 अंकों तक ही सीमित था।

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  • वर्ष 1999 के बाद सेंसेक्स में हुई इस अभूतपूर्व वृद्धि को तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है। 
    • चरण-I (वर्ष 1999 से वर्ष 2007 तक):  इस अवधि में सेंसेक्स में वृद्धि देखी गई जिसमें लगातार वृद्धि के साथ 5000 अंक के लक्ष्य तक पहुँचने में कम-से-कम समय लगा।
    • चरण-II (वर्ष 2007 से वर्ष 2014 तक): इस चरण में सेंसेक्स की वृद्धि में मंदी देखी गई। 
    • चरण-III (वर्ष 2014 से अब तक): इस चरण में संरचनात्मक सुधारों की प्रतिक्रिया में पुनः प्रवर्तन देखा गया। इस चरण में सेंसेक्स केवल दो वर्षों में 30,000 अंक से बढ़कर 40,000 अंक पर पहुँच गया।
  • जैसा कि चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (Compound Annual Growth Rate- CAGR) को उपरोक्त चित्र में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है, इससे यह पता लगाया जा सकता है कि सेंसेक्स में तेज़ी आधार प्रभाव (Base Effect) के कारण नहीं थी। बल्कि उच्च सीएजीआर के कारण आई तेज़ी है। इस प्रकार वर्ष 1991 से भारतीय अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व धन सृजन हुआ है।

4. चुनने की स्वतंत्रता (Freedom To Choose):

  • चुनने की स्वतंत्रता बाज़ार के माध्यम से किसी अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाती है जहाँ क्रेता एवं विक्रेता एक साथ आते हैं और एक मूल्य तंत्र (Price Mechanism) के माध्यम से सौदेबाजी करते हैं।
  • जहाँ संसाधनों की कमी है वहाँ दुर्लभ संसाधनों के उपयोग के लिये क्रेता एवं विक्रेताओं का एक तंत्र विकसित किया जाना चाहिये। जो बाज़ार प्रतिस्पर्द्धा के अवसरों के बीच विकल्प को हल करने के लिये सबसे अच्छा तंत्र प्रदान करता है। यह बाज़ार अर्थव्यवस्था का मूल सिद्धांत है।
  • नियंत्रित अर्थव्यवस्थाओं के विपरीत जहाँ कीमतें सरकार द्वारा निर्धारित की जाती हैं, बाज़ार अर्थव्यवस्था में आपूर्ति एवं मांग के आधार पर उचित कीमत का निर्धारण होता है।

5. संसाधनों का इष्टतम उपयोग (Optimal use of Resources):

  • चूँकि संसाधन सीमित हैं, संसाधनों का इष्टतम उपयोग सुनिश्चित करने हेतु संसाधनों के आवंटन के लिये एक राष्ट्र को सटीक रणनीति बनानी होगी। उदाहरण के लिये अपने जनसांख्यिकीय लाभांश को देखते हुए क्या भारत को पूंजी प्रधान उद्योगों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय श्रम प्रधान उद्योगों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये?
  • सर्वेक्षण के आँकड़ों के आधार पर कहा गया है कि यदि ‘मेक इन इंडिया’ में ‘विश्व के लिये असेम्बल इन इंडिया’ को एकीकृत कर दिया जाए तो भारत वर्ष 2025 तक 4 करोड़ और वर्ष 2030 तक 8 करोड़ रोज़गार उत्पन्न कर सकता है।
  • भारत की व्यापार नीति सक्षम होनी चाहिये क्योंकि निर्यात में वृद्धि रोज़गार सृजन में सहायक होती है।

6. ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस (Ease of Doing Business):

  • ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस में पिछले पाँच वर्षों में काफी सुधार हुआ है जो अधिक आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान करता है। भारत ने वर्ष 2014 में वर्ल्ड बैंक की डूइंग बिज़नेस रैंकिंग में 142वें स्थान से वर्ष 2019 में 63वें स्थान की बढ़त हासिल की है।
  • डूइंग बिज़नेस 2020 की रिपोर्ट ने भारत को उन 10 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया है जिन्होंने सबसे अधिक सुधार किये है।
  • फिर भी ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस के तहत सुधारों की गति को बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि भारत को शीर्ष 50 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया जा सके।

7. एक मजबूत वित्तीय क्षेत्र (An Efficient Financial Sector): 

  • अर्थव्यवस्था को गति देने के लिये एक मज़बूत वित्तीय क्षेत्र होना बेहद महत्त्वपूर्ण है। ऐतिहासिक रूप से पिछले 50 वर्षों में विश्व की शीर्ष पाँच अर्थव्यवस्थाओं को उनके बैंकों द्वारा हमेशा समर्थन दिया गया है। जैसे- संयुक्त राज्य अमेरिका को आर्थिक महाशक्ति बनाने में अमेरिकी बैंकिंग प्रणाली का योगदान सबसे महत्त्वपूर्ण था, इसी तरह 1980 के दशक में जापानी अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने में जापान के शीर्ष 25 सबसे बड़े बैंकों में से 15 बैंकों का अहम योगदान था।
  • हाल के दिनों में चीन के आर्थिक महाशक्ति बनने में उसके अपने बैंकों का अहम योगदान है। वैश्विक रूप से शीर्ष चार सबसे बड़े बैंक चीन के हैं। विश्व का सबसे बड़ा बैंक इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल बैंक ऑफ चाइना विश्व के 5वें (जापान) तथा 6वें (संयुक्त राज्य अमेरिका) सबसे बड़े बैंकों से लगभग दो गुना बड़ा है।

8. भारत का बैंकिंग क्षेत्र (India’s Banking Sector):

  • भारत का बैंकिंग क्षेत्र अर्थव्यवस्था के आकार के हिसाब से बहुत ही कम विकसित है। उदाहरण के लिये वैश्विक स्तर पर शीर्ष 100 में भारत का केवल एक बैंक शामिल है। 
  • भारतीय बैंकिंग प्रणाली में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की 70% बाज़ार हिस्सेदारी है, अतः भारतीय अर्थव्यवस्था को समर्थन देने एवं आर्थिक विकास को बढ़ावा देने का भार इन बैंकों पर पड़ता है। फिर भी प्रत्येक प्रदर्शन पैरामीटर के आधार पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक निजी बैंकों की तुलना में अक्षम हैं।

9.  शैडो बैंकिंग सेक्टर (Shadow Banking Sector): 

  • शैडो बैंकिंग प्रणाली वित्तीय मध्यस्थों का एक समूह है जो वैश्विक वित्तीय प्रणाली में साख (क्रेडिट) निर्माण का कार्य करते हैं, किंतु इसके सदस्य नियामक निगरानी के अधीन नहीं होते।
  • भारत में शैडो बैंकिंग क्षेत्र, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ पारंपरिक बैंकिंग क्षेत्र की पहुँच नहीं है, काफी बढ़ गया है।

10. निजीकरण (Privatization): 

  • निजी क्षेत्र द्वारा संचालित व्यवसाय से प्राप्त होने वाले महत्त्वपूर्ण दक्षता लाभों को देखते हुए केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों (Central Public Sector Enterprises- CPSEs) के निजीकरण पर बल देता है। 
  • अपने समकक्ष हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) से तुलना करके भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) के निजीकरण की घोषणा करने के बाद BPCL के स्टॉक मूल्य में तेज़ी देखी गई।

11. वित्तीय संकेतक (Financial Indicators): 

  • मुख्य फर्मों की तुलना में निजीकरण के बाद प्रमुख वित्तीय संकेतक जैसे कि शुद्ध मूल्य, शुद्ध लाभ और निजीकृत CPSE की संपत्ति पर औसत लाभ में काफी वृद्धि हुई है। प्रत्येक CPSE के मामले में यह बेहतर प्रदर्शन सच साबित हुआ है।

12. सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product-GDP):

  • सकल घरेलू उत्पाद (GDP) अर्थव्यवस्था के आर्थिक प्रदर्शन का एक बुनियादी माप है, यह एक वर्ष में एक राष्ट्र की सीमा के भीतर सभी अंतिम माल और सेवाओं का बाज़ार मूल्य होता है।
  • निवेशक किसी देश की GDP के आँकड़ों के आधार पर उस देश में निवेश करने का निर्णय लेते हैं, GDP के आँकड़ों की अनिश्चितता देश में निवेश को प्रभावित कर सकती है।

13. अधिक क्रय शक्ति (More Purchasing Power):

  • अर्थव्यवस्था में धन सृजन के लिये अधिक क्रय शक्ति हेतु रणनीतियों का विकास करके सामान्य व्यक्ति की आजीविका को बढ़ाना चाहिये। आम आदमी के लिये पौष्टिक भोजन अतिआवश्यक है जिसके लिये प्रत्येक व्यक्ति हर दिन संघर्ष करता है।
  • इसलिये आर्थिक नीतियों का विश्लेषण किया जाना चाहिये कि सरकार की नीतियाँ सामान्य आदमी को प्रत्येक दिन एक थाली पौष्टिक भोजन का भुगतान करने में सक्षम बनाती हैं या नहीं।

14. नज का व्यावहारिक अर्थशास्त्र (Behavioural Economics of Nudge):

  • व्यावहारिक अर्थशास्त्र के नज सिद्धांत (Nudge Theory) का उपयोग नीति निर्माण के दृष्टिकोण से बेहद महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, व्यक्ति को अपने व्यवहार में ज़रूरी सकारात्मक परिवर्तन करने के लिये प्रेरित किया जाता है। साथ ही व्यक्ति के चुनने के अधिकार को भी सुरक्षित रखा जाता है। 
  • नज सिद्धांत का मानना है कि लोगों को समाज या देश के मूल्यों के अनुरूप व्यवहार करने के लिये मार्गदर्शन तथा प्रोत्साहन की आवश्यकता है। इस विचार को ध्यान में रखकर विभिन्न सरकारें एवं संस्थान नीतियों का निर्माण करते हैं।

इस शताब्दी के शुरुआती वर्षों में विश्वास का टूटना

(THE BREAKDOWN OF TRUST IN THE EARLY YEARS OF THIS MILLENNIUM):

  • एक बाज़ार अर्थव्यवस्था में भी राज्य को अदृश्य हाथ की सहायता करने के लिये नैतिक हाथ सुनिश्चित करने की आवश्यकता होती है। बाज़ार हर कीमत पर लाभ की खोज में नैतिकता से विचलित हो सकते हैं।
  • वर्ष 2011-13 के वैश्विक वित्तीय संकट और उसके बाद की घटनाओं के कारण बाज़ार अर्थव्यवस्था पर विश्वास में कमी आई है, वहीं ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी भ्रष्टाचार धारणा सूची में भारत की रैंकिंग में वर्ष 2013 के बाद उल्लेखनीय सुधार हुआ, जबकि वर्ष 2011 में यह निम्नतम बिंदु पर था।

International-transparency

  • सर्वेक्षण ‘विश्वास’ को एक सार्वजनिक वस्तु के रूप में पेश करता है जिसे अधिक उपयोग के साथ बढ़ाया जाता है। अर्थव्यवस्था के प्रति विश्वास जितना अधिक होगा आर्थिक गतिविधियाँ उतनी ही अधिक होंगी जिससे अवसरों के लिये क्षमता निर्माण में वृद्धि होगी।   

विश्वास (Trust): 

  • र्वेक्षण में ‘विश्वास’ को एक सार्वजनिक वस्तु के रूप में पेश किया गया है। विश्वास को गैर-बहिष्करण की विशेषताओं के साथ सार्वजनिक रूप से अच्छा माना जा सकता है अर्थात् नागरिक बिना किसी प्रत्यक्ष वित्तीय लागत के इसका लाभ ले सकते हैं।
  • विश्वास में गैर-लाभकारी उपभोग (Non-Rival Consumption) की विशेषताएँ भी विद्यमान हैं अर्थात् इस सार्वजनिक वस्तु की आपूर्ति की सीमांत लागत शून्य है।
  • विश्वास गैर-अस्वीकार्य (Non-Rejectable) भी है अर्थात् सभी नागरिकों के लिये सामूहिक आपूर्ति का अर्थ है कि इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है।
  • ‘विश्वास’ को बढ़ाने के लिये सर्वेक्षण जन डेटाबेस और प्रवर्तन प्रणाली के मानकीकरण के माध्यम से ‘सूचना असमितिता’ को कम करने का सुझाव देता है।
    • ‘सूचना असमितिता’ किसी भी आर्थिक विनिमय में अवसरवाद की क्षमता को बढ़ाती है।    
  • प्रौद्योगिकी में महत्त्वपूर्ण निवेश के साथ-साथ हमारे नियामकों (CCI, RBI, SEBI, IBBI) की संख्या एवं जनशक्ति की गुणवत्ता में महत्त्वपूर्ण वृद्धि के माध्यम से पर्यवेक्षण की गुणवत्ता बढ़ाना और इन नियामकों की विश्लेषण क्षमता को मज़बूत बनाने की ज़रूरत है।

निष्कर्ष:

  • इस प्रकार सर्वेक्षण में अनुमान लगाया गया है कि $ 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने की भारत की महत्त्वाकांक्षा बाज़ार के ‘अदृश्य हाथ’ एवं ‘विश्वास’ जो कि बाज़ार का समर्थन करता है, दोनों को सुदृढ़ करने पर निर्भर है।
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