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भारत में तंबाकू नियंत्रण एवं भारत की तंबाकू नीति

  • 19 Jan 2018
  • 14 min read

परिचय

  • गौरतलब है कि भारत तंबाकू आधारित उत्पादों का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता और उत्पादक है। तंबाकू का सेवन, बहुत सारे रोगों जैसे-  कैंसर, फेफड़ों की बीमारियों और हृदय रोगों सहित स्वास्थ्यगत बीमारियों के मुख्य कारकों में से एक है।
  • भारत में तंबाकू का उपयोग विभिन्न रूपों में होता है। इसके अलावा, देश में तंबाकू का सेवन सिगरेट, बीड़ी और सिगार तथा अधिकत्तर धूम्रमुक्त रूप में किया जाता है।
  • भारत न केवल सबसे बड़े तंबाकू उत्पादक देशों में से एक है बल्कि विश्व में तंबाकू के सेवन से होने वाली मौतों के 1/6वें हिस्से का ज़िम्मेदार भी है।
  • इतना ही नहीं किशोरों में तंबाकू के सेवन का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है और भारत की वर्तमान तंबाकू नीति में कई विसंगतियाँ भी देखी जा रही हैं।
  • ऐसे में हमें एक बेहतर एवं तमाम समस्याओं को संज्ञान में लेने वाली तंबाकू नीति के निर्माण की ज़रूरत है।

भारत द्वारा तंबाकू नियंत्रण हेतु किये गए प्रयास

Tobaco

  • राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कानून:

⇒ भारत सरकार ने मई 2003 में राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कानून पारित किया था।
⇒  इस कानून को "सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद" (विज्ञापन का प्रतिषेध और व्यापार तथा वाणिज्य, उत्पादन, प्रदाय और वितरण का विनियमन) अधिनियम का नाम दिया गया।

  • डब्ल्यूएचओ-फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन टोबैको कंट्रोल की पुष्टि:

⇒ उल्लेखेनीय है कि डब्ल्यूएचओ-फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन टोबैको कंट्रोल यानी तंबाकू नियत्रण के संबंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन के  फ्रेमवर्क कन्वेंशन की भारत द्वारा पुष्टि कर दी गई है।
⇒ डब्ल्यूएचओ-फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन टोबैको कंट्रोल सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) के एक अभिन्न अंग के रूप में है।

  • राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम (एनटीसीपी)

⇒ भारत सरकार ने तंबाकू नियंत्रण कानून के प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने हेतु वर्ष 2007 में राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम (एनटीसीपी) का शुभारंभ किया।
⇒ इसका उद्देश्य तंबाकू नियंत्रण कानून और तंबाकू के उपयोग द्वारा होने वाले हानिकारक प्रभावों के बारे में अधिक-से-अधिक जागरूकता प्रसारित करना भी है।

तंबाकू नियंत्रण आवश्यक क्यों?

  • तंबाकू के कारण आर्थिक नुकसान:

⇒ तंबाकू सेवन के कारण चिकित्सा खर्च में वृद्धि होती है और घरेलू आय में कमी आती है, जिससे गरीबी बढ़ती है।
⇒ उल्लेखनीय है भारत में तंबाकू प्रयोग की आर्थिक लागत अनुमानतः 1,04,500 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष है।
⇒ कई देशों द्वारा तंबाकू नियंत्रण को गरीबी समाप्त करने वाली नीतियों के रूप में वर्गीकृत किया गया है, भारत को इस दिशा में आगे कदम बढ़ाना चाहिये।
⇒ भारत ने तंबाकू नियंत्रण पर डब्ल्यूएचओ फ्रेमवर्क कन्वेंशन की पुष्टि करने के बाद से तंबाकू नियंत्रण के संबंध में पर्याप्त प्रगति की अपेक्षा है।

  • नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करना:

⇒ अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सरकार की है। अतः तंबाकू नियंत्रण नीतियों की पहुँच विशेष रूप से शहरी मध्यवर्गीय तक बनानी होगी।
⇒ गाँवों में रहने वाले अधिकांश गरीबों के पास टेलीविज़न की सुविधा उपलब्ध नहीं है। अतः धूम्रपान के खिलाफ चेतावनी देने वाले अभियानों से ज़रूरी लाभ नहीं मिल पाता है।

महत्त्वपूर्ण है सचित्र चेतावनियाँ

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  • सार्वजनिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं के संबंध में मई 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि तंबाकू के पैकेट पर 85% सचित्र चेतावनी मानदंड का पालन करना होगा।
  • दरअसल, पैकेट के दोनों किनारों पर बड़ी सचित्र चेतावनी धूम्रपान करने वालों से स्वास्थ्य जोखिमों के बारे संवाद करने का सबसे प्रभावी और शक्तिशाली तरीका है।
  • उल्लेखनीय है कि कनाडा के कैंसर सोसायटी की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत तंबाकू उत्पादों पर सर्वाधिक बड़े सचित्र चेतावनी जारी करने वाले देशों में से एक है।
  • साथ ही अध्ययनों से पता चलता है कि ग्राफिक चेतावनियों के कारण कनाडा में 58 प्रतिशत, ब्राजील और थाईलैंड में लगभग 54 प्रतिशत धूम्रपान करने वाले लोग, धूम्रपान के स्वास्थ्य परिणामों के बारे में अपनी राय बदल चुके हैं।

किशोरों में धूम्रपान की लत: एक गंभीर समस्या

तंबाकू की खपत का स्तर अनपढ़ बच्चों और निम्न आय समूहों के बच्चों में अधिक है।

कंपनियाँ पूरी तरह से अवगत हैं कि एक व्यक्ति जब छोटी उम्र में धूम्रपान शुरू कर देता है तो संभावना यह है कि वह एक वयस्क के रूप में भी धूम्रपान जारी रखेगा।

  • समस्या के कारण:

⇒ उल्लेखनीय है कि कई देशों में सिगरेट की दुकानों के लिये लाइसेंस जारी किये जाते हैं, जबकि हमारे यहाँ बिना लाइसेंस के ही सिगरेट और बीड़ी बेची जाती है।
⇒ बच्चों एवं किशोरों को तंबाकू उत्पादों की बिक्री पर अंकुश लगाने के लिये कड़े दंड की व्यवस्था की गई है। हालाँकि, इन उपायों का क्रियान्वयन नहीं हो पाता है।

  • क्या हो समाधान?

⇒ युवाओं को तंबाकू से दूर रखने के लिये एक बृहत् दृष्टिकोण आवश्यक है।
⇒ स्कूलों के पास के क्षेत्र में तंबाकू के विज्ञापनों के होर्डिंग, बैनर आदि को प्रतिबंधित कर देना चाहिये।
⇒ साथ ही स्कूलों के 100 मीटर के आस-पास के क्षेत्र में तंबाकू की बिक्री पर प्रतिबंध को लागू करने और फिर उसके समुचित पालन पर ध्यान देने की ज़रूरत है।
⇒ यदि सिगरेट के मूल्य बढ़ेंगे तो भी युवा इसके प्रयोग को हतोत्साहित होंगे।

भारत की तंबाकू नीति की खामियाँ

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  • तंबाकू उपभोग का विशिष्ट व जटिल पैटर्न:

⇒ विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के "ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे" के अनुसार भारत के तंबाकू उपभोग का विशिष्ट पैटर्न देखने को मिलता है।
⇒ तंबाकू उत्पादों के उपभोग का पैटर्न भारत में जटिल है, क्योंकि इसका सिगरेट, बीड़ी, चबाने वाली तंबाकू और खैनी जैसे कई रूपों में सेवन किया जाता है।

  • सिगरेट से ज़्यादा खतनाक है बीड़ी:

⇒ भारत में सिगरेट की बाज़ार हिस्सेदारी केवल 14 प्रतिशत है, जबकि बीड़ी की 48 प्रतिशत।
⇒ दरअसल, भारत में सिगरेट से ज़्यादा बीड़ी का सेवन इसलिये किया जाता है क्योंकि सिगरेट बीड़ी के मुकाबले काफी महँगी है।
⇒ बीड़ी पर कर लगाने की सबसे बड़ी बाधा यह है कि गरीब बीड़ी कामगारों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
⇒ हालाँकि, यह विडंबना ही कही जाएगी कि धूम्रपान जनित स्वास्थ्य चिंताओं से सबसे अधिक प्रभावित गरीब जनता ही होती है।

  • तंबाकू उत्पादों का सस्ता होना:

⇒ चूँकि भारत की कराधान व्यवस्था आय वृद्धि और मुद्रास्फीति से जुड़ी हुई नहीं है।
⇒ इसलिये तंबाकू उत्पाद अधिकांश जनता की आय की तुलना में कम मूल्य पर उपलब्ध हैं।

  • जीएसटी के बाद आपेक्षित सुधारों का अभाव:

⇒ जीएसटी के तहत, सभी तंबाकू उत्पादों को 28%  के कर स्लैब में रखा गया है।
⇒ फलस्वरूप सिगरेट के मूल्य में अच्छी खासी वृद्धि हुई है, जबकि बीड़ी के छोटे बंडल की कीमतों में गिरावट देखी गई है। 
⇒ जीएसटी के रोल-आउट के बाद भी बीड़ी के एक बड़े बंडल की कीमत में मामूली वृद्धि हुई है।

आगे की राह

GST

  • जीएसटी में सुधार की ज़रूरत:

⇒ जीएसटी में सभी तंबाकू उत्पादों को 28% के कर स्लैब में रखने के बावजूद कुछ उत्पादों जैसे बीड़ी का मूल्य इसलिये नहीं बढ़ पाया क्योंकि पहले से ही इनके मूल्य काफी कम हैं।
⇒ ऐसे में सिगरेट को ध्यान में रखकर जीएसटी में सुधार इसलिये ज़्यादा कारगर साबित नहीं होगा क्योंकि अधिकांश लोग बीड़ी का सेवन करते हैं न कि सिगरेट का।
सिगरेट के अलावा अन्य तंबाकू उत्पादों के जैसे बीड़ी और धुआँ-रहित तंबाकू पर करों में उल्लेखनीय वृद्धि की आवश्यकता है। यदि दाम बढ़ेंगे तो लोग इनके प्रयोग को हतोत्साहित होंगे।
⇒ हालाँकि, इन परिस्थितियों में बीड़ी बनाने के कार्य में शामिल श्रमिकों द्वारा विरोध अवश्यंभावी है, लेकिन  स्वास्थ्य सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिये।

  • सचित्र चेतावनियों को और व्यापक बनाए जाने की ज़रूरत:

⇒ कई अध्ययनों द्वारा यह प्रमाणित हो चुका है कि तंबाकू उत्पादों पर सचित्र चेतावनियाँ तंबाकू उपभोग को सीमित करने में काफी अहम् साबित हुई हैं।
⇒ 2016 में सुप्रीम कोर्ट आदेश के बाद तंबाकू उत्पादों के पैकेटों पर चेतावनियों को व्यापक बनाया गया, हालाँकि इसे अभी भी और व्यापक बनाया जा सकता है।
⇒ सिगरेट के पैकेटों पर दी जाने वाली 85 प्रतिशत सचित्र चेतावनियों को बढ़ाकर 90 प्रतिशत तक करने की ज़रूरत है जैसा कि नेपाल ने किया है।
⇒ साथ ही बीड़ी के बंडलों पर भी सामान्य पैकेजिंग पर ही सही सचित्र चेतावनियाँ जारी की जानी चाहियें।

  • सिंगल स्टिक सेल को बढ़ावा 

⇒ तंबाकू उत्पाद निर्माता कंपनियों की प्रभावशाली उपस्थिति के कारण न तो सिंगल स्टिक सेल अनिवार्य हो पाया है और न ही सिगरेट जैसे अन्य तंबाकू उत्पादों के लिये लाइसेंस जारी करने की व्यवस्था अमल में आ पाई है।
⇒ सिंगल स्टिक सेल एक ऐसा उपाय है जो धूम्रपान कम करने में अहम् भूमिका निभा सकता है और इस संबंध में सरकार को प्रयास करने चाहियें।

  • एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाए जाने की ज़रूरत:

⇒ तंबाकू नियत्रण हेतु लोगों को शिक्षित एवं जागरूक बनाना होगा और इसके लिये एक व्यापक दृष्टिकोण को अपनाया जाना चाहिये।
⇒ तंबाकू उत्पादों की अवैध बिक्री को रोकने में सरकार को अहम् भूमिका निभानी होगी लेकिन साथ-ही-साथ आम जनता की सहभागिता भी अनिवार्य है।

निष्कर्ष

गौरतलब है कि राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 48 में कहा गया है कि राज्य को सार्वजनिक स्वास्थ्य में लगातार बेहतरी के प्रयास करते रहने चाहियें। अतः भारत जैसे एक आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य को अपने सामाजिक दायित्वों के पालन हेतु वर्तमान तंबाकू नीति में विद्यमान खामियों पर गौर करते हुए आगे बढ़ना होगा।

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