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सौर ऊर्जा अपशिष्ट प्रबंधन

  • 21 Mar 2022
  • 14 min read

यह एडिटोरियल 17/03/2022 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “Clean Energy Should use the Battery of A Circular Economy” लेख पर आधारित है। इसमें सौर ऊर्जा अपशिष्ट प्रबंधन परिदृश्य और इस संबंध में चक्रीय अर्थव्यवस्था के महत्त्व के बारे में चर्चा की गई है।

संदर्भ

अपने बजट संभाषण में भारत की वित्त मंत्री ने भारत के भविष्य के आर्थिक विकास में सौर ऊर्जा एवं बैटरी जैसी स्वच्छ प्रौद्योगिकियों की भूमिका पर बल दिया था। ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (Council on Energy, Environment and Water- CEEW) के एक अध्ययन में यह अनुमान लगाया गया है कि भारत को वर्ष 2070 में अपने शुद्ध-शून्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिये 5,630 गीगावाट सौर ऊर्जा और 1,792 गीगावाट पवन ऊर्जा की आवश्यकता होगी। जबकि भारत ने महत्त्वाकांक्षी सौर ऊर्जा स्थापना लक्ष्य निर्धारित किये हैं, उसके पास अभी तक उपयोग किये गए सौर पैनलों या निर्माण प्रक्रिया से उत्पन्न अपशिष्ट के प्रबंधन पर कोई ठोस नीति मौजूद नहीं है। एक सुदृढ़ नवीकरणीय अपशिष्ट प्रबंधन और पुनर्चक्रण पारितंत्र लोगों को और देश को पर्यावरणीय क्षति को कम करने, ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करने तथा नए रोज़गार पैदा करने में मदद कर सकता है।

स्थापित नवीकरणीय क्षमता में भारत की अब तक की उपलब्धियाँ:

  • भारत ने वर्ष 2030 तक गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों से अपनी स्थापित विद्युत् क्षमता का 40% हासिल करने का लक्ष्य नवंबर 2021 में प्राप्त कर लिया है।
    • देश की स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy- RE) क्षमता 30 नवंबर 2021 तक की स्थिति के अनुसार 150.54 गीगावाट (सौर-48.55 GW, पवन-40.03 GW, लघु जल विद्युत-4.83 GW, जैव शक्ति-10.62 GW, वृहत जल विद्युत-46.51 GW) है। जबकि इसकी परमाणु ऊर्जा आधारित स्थापित बिजली क्षमता 6.78 गीगावाट है।
  • स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता में 15 गुना से अधिक की वृद्धि हुई है और अब यह 50 GW संचयी स्थापित सौर क्षमता को पार कर गई है (28 फरवरी 2022 तक की स्थिति)। वर्ष 2017 के बाद से इसका वार्षिक नवीकरणीय ऊर्जा योग कोयला आधारित थर्मल पावर की तुलना में अधिक रहा है।
    • भारत ने वर्ष 2021 में अपनी संचयी स्थापित क्षमता में रिकॉर्ड 10 गीगावाट सौर ऊर्जा को जोड़ा है। यह 12 माह की अवधि में उच्चतम क्षमता वृद्धि है जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 200% की वृद्धि को दर्ज करती है।

अपशिष्ट उत्पादन परिदृश्य:

  • अंतर्राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) के अनुसार भारत की कुल स्थापित सौर क्षमता से उत्पन्न संचयी अपशिष्ट वर्ष 2030 तक 325 किलो टन के उच्च स्तर तक पहुँच सकता है।
    • इसने यह भी अनुमान लगाया है कि सोलर पीवी अपशिष्ट (Solar PV Waste) से पुनर्प्राप्ति योग्य सामग्री का वैश्विक मूल्य 15 बिलियन डॉलर से अधिक हो सकता है।
    • वर्तमान में केवल यूरोपीय संघ (EU) ने सोलर पीवी अपशिष्ट के प्रबंधन हेतु निर्णायक कदम उठाए हैं।
  • IRENA का अनुमान है कि वैश्विक फोटोवोल्टिक अपशिष्ट (Photovoltaic Waste) वर्ष 2050 तक 78 मिलियन टन तक पहुँच जाएगा जहाँ भारत विश्व के शीर्ष पाँच फोटोवोल्टिक अपशिष्ट उत्पादकों में से एक बन सकता है।
  • जबकि फोटोवोल्टिक वैश्विक बिजली का केवल 3% उत्पन्न करते हैं, वे विश्व के 40% टेल्यूरियम, 15% चाँदी, सेमीकंडक्टर-ग्रेड क्वार्ट्ज का एक बड़ा हिस्सा और इंडियम, जस्ता, टिन और गैलियम का (कम लेकिन फिर भी उल्लेखनीय मात्रा में) उपभोग करते हैं।
  • नवीकरणीय ऊर्जा पुनर्चक्रण पारितंत्र संवहनीयता के परे भविष्य की पीढ़ियों के लिये गुणवत्तापूर्ण रोज़गार के अवसर भी प्रदान कर सकता है क्योंकि अपशिष्ट प्रबंधन एवं पुनर्चक्रण की संपूर्ण मूल्य शृंखला में नई नौकरियाँ पैदा होंगी।
    • भारत का अधिकांश पुनर्चक्रण क्षेत्र अनौपचारिक है और श्रमिकों को मानकीकृत मज़दूरी के बिना असुरक्षित वातावरण में कार्य करना पड़ता है।

अपशिष्ट प्रबंधन के संबंध में व्याप्त चिंताएँ

  • किसी विनियमन के अभाव में नवीकरणीय ऊर्जा अपशिष्ट के प्रबंधन के लिये भूमि-संभरण (Landfilling) सबसे सस्ते और आम अभ्यास के रूप में प्रचलित है, जो निस्संदेह पर्यावरणीय रूप से संवहनीय नहीं है।
  • सभी स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियाँ धातुओं और गैर-धातुओं के उपयोग पर आधारित हैं जो विभिन्न स्तरों की विषाक्तता रखते हैं। यदि अपशिष्ट खुले में फेंके जाते हैं तो ये तत्त्व पर्यावरण में रिसकर खाद्य शृंखला में प्रवेश कर सकते हैं।
  • सोलर फोटोवोल्टिक मॉड्यूल में ‘पॉलिमेरिक एनकैप्सुलेंट लेयर’ के ज्वलन से सल्फर डाइऑक्साइड जैसी ज़हरीली गैसों और कुछ वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों का उत्सर्जन करता है।
  • पुनर्चक्रण पारिस्थितिकी तंत्र में अभिकर्त्ताओं के लिये वित्त तक पहुँच एक प्रमुख बाधा है। अपशिष्ट प्रबंधन के लिये नवीन वित्तपोषण मार्गों का निर्माण करना होगा।
  • गुणवत्ताहीन घटक आरंभिक जीवन क्षति के कारण पर्याप्त अपशिष्ट उत्पन्न करते हैं जो प्रायः अपूरणीय होता है और घटकों को प्रायः त्यागना पड़ता है।
  • भारत वर्तमान में सौर अपशिष्ट को इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के अंग के रूप में ही देखता है और इसका अलग से प्रबंधन नहीं करता है। इसके अलावा भारत में सौर ई-अपशिष्ट (Solar e-Waste) के लिये कोई वाणिज्यिक कच्चा माल रिकवरी सुविधा उपलब्ध नहीं है।

चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy):

  • यह ऐसी अर्थव्यवस्था है जहाँ उत्पादों को स्थायित्व, पुन: उपयोग एवं पुनर्चक्रण के लिये डिज़ाइन किया जाता है और इस प्रकार लगभग हर चीज का पुन: उपयोग, पुन: निर्माण, और कच्चे माल में पुनर्नवीनीकरण या ऊर्जा स्रोत के रूप में उपयोग किया जाता है।
    • इसमें 3 R's (Reduce, Reuse and Recycle) का दृष्टिकोण शामिल है।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था अधिक संवहनीय उत्पादन एवं खपत पैटर्न के उभार की ओर ले जा सकती है और इस प्रकार यह विकसित एवं विकासशील देशों को ‘सतत विकास के लिये 2030 एजेंडा’ के अनुरूप आर्थिक विकास और समावेशी एवं सतत् औद्योगिक विकास (Inclusive and Sustainable Industrial Development- ISID) प्राप्त करने के अवसर प्रदान करती है।

चक्रीय अर्थव्यवस्था: आगे की राह

  • वर्तमान ई-अपशिष्ट प्रबंधन नियमों को संशोधित करना: ये नियम विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्त्व (Extended Producer Responsibility- EPR) पर आधारित हैं जो घटक उत्पादकों को उनके अपशिष्ट उत्पादों के प्रबंधन के लिये उत्तरदायी निकायों के रूप में चिह्नित करते हैं।
    • भारतीय नवीकरणीय ऊर्जा उद्योग की एक जटिल संरचना है जिसमें विभिन्न निर्माता, असेंबलर, आयातक और वितरक शामिल हैं।
    • संशोधित विनियमों में नवीकरणीय ऊर्जा मूल्य शृंखला में शामिल विभिन्न हितधारकों की ज़िम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना चाहिये और अपशिष्ट के संग्रहण एवं पुनर्चक्रण के लिये वार्षिक लक्ष्य प्रदान करना चाहिये।
  • R&D निवेश: नवीकरणीय ऊर्जा उद्योग को पुनर्चक्रण प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान एवं विकास में निवेश करना चाहिये।
    • पुनर्चक्रण एक बहु-चरणीय प्रक्रिया है, जिसमें ‘डिसमैंटलिंग’ (Dismantling)—जो मुख्यतः एक मैनुअल प्रक्रिया है, ‘डिसअसेंबली’ (Disassembly)—जो तापीय या रासायनिक रूप से यांत्रिक तरीके से किया जाता है, और निष्कर्षण या ‘एक्सट्रैक्शन’ (Extraction) शामिल है।
    • इन पारंपरिक तरीकों के अलावा अनुसंधान एवं विकास में निवेश पुनर्चक्रण के नए तरीकों की खोज में मदद कर सकता है, जिससे उच्च दक्षता और पर्यावरणीय रूप से कम क्षतिकारी फुटप्रिंट का परिणाम प्राप्त होगा।
    • उद्योगों को घरेलू अपशिष्ट पुनर्चक्रण सुविधाओं की स्थापना के लिये वैश्विक पुनर्चक्रण फर्मों के साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के अवसर की भी तलाश करनी चाहिये।
  • अपशिष्ट प्रबंधन के लिये अभिनव मार्ग: केंद्र सरकार को सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों को नवीकरणीय ऊर्जा अपशिष्ट पुनर्चक्रण सुविधाओं की स्थापना के लिये वितरित ऋणों पर कम ब्याज दर वसूलने के लिये प्रेरित करना चाहिये।
    • इन सुविधाओं के संचालन के लिये न्यूनतम अपशिष्ट मात्रा का आश्वासन और पुनर्चक्रण करने वालों को प्रदर्शन-आधारित ‘ग्रीन सर्टिफिकेट’ जारी करना (जिनका अपशिष्ट प्रबंधन हेतु धन जुटाने के लिये प्रयोग किया जा सकता हो) वित्तीय बोझ को कम करने में भी मदद करेगा।
    • नवीकरणीय ऊर्जा और अन्य प्रासंगिक विनिर्माण उद्योगों द्वारा अनिवार्य खरीद के माध्यम से पुनर्नवीनीकरण सामग्री के लिये एक बाज़ार का निर्माण भी किया जा सकता है।
  • विषाक्त अपशिष्ट का प्रबंधन: विभिन्न घटकों की डंपिंग एवं जलाने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये और उत्पाद के डिज़ाइन एवं गुणवत्ता में सुधार लाने की आवश्यकता है।
    • नवीकरणीय ऊर्जा घटक निर्माताओं को अपने उत्पादों में प्रयुक्त कैडमियम और सीसा जैसी ज़हरीली धातुओं के विकल्प खोजने चाहिये और पुनर्चक्रण चरणों को कम करने के लिये उत्पाद डिज़ाइन को सरल बनाना चाहिये।
    • प्रक्रिया दक्षता में इस तरह के सुधार स्रोत पर अपशिष्ट निर्माण और पर्यावरण पर इसके परिणामी प्रभाव को रोकने में दीर्घकालिक योगदान कर सकते हैं।
    • घटकों की समय-पूर्व जीवनकाल समाप्ति (Premature End-of-Life) और परिणामी अपशिष्ट निर्माण को रोकने के लिये केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी निविदाओं में उपयोग किये जाने वाले घटकों के लिये कठोर गुणवत्ता नियंत्रण मानक निर्धारित करने चाहिये।

अभ्यास प्रश्न: ‘‘एक चक्रीय अर्थव्यवस्था के निर्माण को प्रोत्साहित करना महत्त्वपूर्ण है क्योंकि आने वाले दशकों में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं द्वारा उत्पन्न भारी अपशिष्ट के प्रबंधन के लिये एक कुशल अपशिष्ट प्रबंधन पारिस्थितिकी तंत्र का होना आवश्यक है।’’ चर्चा कीजिये।

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