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सामाजिक अंकेक्षण में सुधार –तेलंगाना में मनरेगा के अंकेक्षण से सीख

  • 12 May 2018
  • 15 min read

संदर्भ

MGNREGA-1

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के शब्दों में “पारदर्शिता” एवं “जवाबदेहिता” लोकतंत्र के दो स्तंभ हैं- एक अवधारणा के रूप में सामाजिक अंकेक्षण पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता-दोनों के उद्देश्यों की जमीनी स्तर पर पूर्ती करता है।“ सामाजिक अंकेक्षण को 2005 में ही महात्मा गाँधी रोज़गार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) के लिये अनिवार्य बनाया गया था, लेकिन अभी तक अधिकाँश राज्यों में इसके क्रियान्वयन में ढिलाई दिखाई गयी है तथा इसके द्वारा अनेक चुनौतियों का सामना किया जा रहा है। इस मामले में तेलंगाना द्वारा नियमित तथा समावेशी सामाजिक अंकेक्षण का एक उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत किया गया है।

क्या है सामाजिक अंकेक्षण

  • सामाजिक अंकेक्षण या सोशल ऑडिट एक विधिक रूप से अनिवार्य प्रक्रिया है, जहाँ संभावित तथा विधिक लाभार्थी किसी कार्यक्रम के क्रियान्वयन का मूल्यांकन करते हैं तथा इस प्रयोजनार्थ आधिकारिक रिकॉर्ड से जमीनी  वास्तविकता की तुलना की जाती है।

सामाजिक अंकेक्षण की पृष्ठभूमि

  • सामाजिक अंकेक्षण की शुरुआत स्वैच्छिक संस्था “मज़दूर किसान शक्ति संगठन” द्वारा की गयी, जिसमें सरकारी कार्यों एवं व्यय हेतु राजस्थान के रायपुर (पाली) में जन सुनवाई हुई। इसके पश्चात् “हमारा पैसा, हमारा हिसाब” नामक आंदोलन से इस अवधारणा को दुरुस्त किया गया।
  • पंचायती राज अधिनियम द्वारा ग्राम सभा को पंचायत निर्वाचित प्रतिनिधियों एवं सरकार के कार्यों की स्थानीय निगरानी का कार्य सौंपा गया।
  • सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005, ई-गवर्नेंस आदि के द्वारा  सामाजिक अंकेक्षण की नींव रखी गयी तथा जनता को सरकारी रिकॉर्डों तक पहुँच प्रदान की गयी।
  • भारत में राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम ऐसा प्रथम राष्ट्रीय कानून है, जिसमें  सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया को विधिवत् स्वीकार किया गया है। 
  • MGNREGA के अतिरिक्त, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम हेतु सामाजिक अंकेक्षण को अनिवार्य बनाया गया है।
  • मेघालय ऐसा पहला राज्य बना है, जिसमें सभी विभागों को कवर करने के लिये सामाजिक अंकेक्षण कानून पारित किया गया है।
  • फरवरी 2018 में नेशनल कमिटी फॉर सेंट्रल लेजिस्लेशन ऑन कंस्ट्रक्शन लेबर (NCC-CL) द्वारा भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक (रोज़गार नियमन एवं सेवा शर्तें) अधिनियम, पर दर्ज याचिका पर निर्णय लेते समय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह निर्णय दिया कि इसके उचित एवं अधिक कारगर क्रियान्वयन हेतु, इसका सामाजिक अंकेक्षण किया जाए।
  • विकास अंकेक्षण: इस प्रकार के अंकेक्षण में पर्यावरणीय प्रभाव आदि को भी सम्मिलित किया जाता है लेकिन सामाजिक अंकेक्षण के विपरीत यह हाशिये के समुदायों पर परियोजनाओं एवं योजनाओं के प्रभाव का मूल्यांकन करने में अक्षम रहता है।
  • सतर्कता अंकेक्षण: इसमें  धन के दुरुपयोग अथवा धोखाधड़ी का परीक्षण किया जाता है।

सामाजिक अंकेक्षण के लाभ

social

  • सामाजिक अंकेक्षण सामाजिक कल्याण के लिये उठाएगए कदमों के उद्देश्यों और वास्तविकता के बीच अंतर को पाटने का काम करता है।
  • सामाजिक अंकेक्षण सरकारी धन के उपयोग का गुणवत्तापरक एवं परिमाणात्मक परीक्षण करता है तथा पारदर्शिता बहाल करता है।
  • यह विकास कार्यों में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करता है तथा इस प्रकार लोकतंत्र एवं स्थानीय स्व-शासन की अवधारणा को मज़बूती प्रदान करता है।
  • यह जनता को उसके अधिकारों के प्रति जागरूक करता है तथा सरकारी योजनाओं एवं कल्याण कार्यों की सूचना प्रदान करता है।
  • यह सरकार तथा नौकरशाही को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाता है तथा भ्रष्टाचार को कम करने में सहायता करता है।
  • यह हाशिये पर स्थित समुदायों तक सरकारी लाभों को पहुँचाने में तथा उनकी शिकायतों के निपटान के लिये एक उपकरण के रूप में कार्य करता है।
  • सामाजिक अंकेक्षण योजनाओं की निगरानी एवं जनता की आवश्यकताओं के अनुसार उनमें संशोधन करने में सक्षम करता है। 

  social-audit

MGNREGA तथा सामाजिक अंकेक्षण

भारत के 73वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से ग्रामीण इलाकों में पंचायती राज व्यवस्था सुदृढ़ करने का प्रावधान किया गया, ताकि विकेन्द्रित नियोजन प्रणाली के माध्यम से ग्रामीण विकास किया जा सके। इस उद्देश्य से केन्द्र सरकार द्वारा 2 फरवरी, 2006 में देश के चुने हुए 200 अति पिछड़े जनपदों में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना लागू की गई। द्वितीय चरण में देश के 330 अन्य जनपदों को भी योजना में सम्मिलित किया गया तथा 1 अप्रैल, 2008 से रोज़गार गारंटी योजना को पूरे देश में चलाया जा रहा है जिसे 2 अक्तूबर, 2009 से केन्द्र सरकार द्वारा नाम संशोधित करके महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) कर दिया गया है। 

  • राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम , 2005 के क्रियान्वयन में सामाजिक अंकेक्षण हेतु, निम्नलिखित पक्ष को सम्मिलित किया गया है:
    ♦ लाभार्थियों का पंजीकरण 
    ♦ जॉब कार्ड का निर्गमन एवं उसमें अद्यतन प्रविष्टियाँ 
    ♦ कार्य चाहने वाले आवेदन पत्रों की पावती 
    ♦ परियोजनाओं का चयन 
    ♦ कार्यों का निष्पादन 
    ♦ प्रमुख दस्तावेज़ों का संधारण 
    ♦ पारिश्रमिक भुगतान 
  • सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, राज्यों में स्वतंत्र सामाजिक अंकेक्षण इकाइयों (SAU) के गठन का प्रावधान किया गया है।
  • CAG द्वारा भी सामाजिक अंकेक्षण मानकों का निरूपण किया गया है, जिन्हें प्रत्येक राज्य द्वारा लागू किया जाना अनिवार्य है।

वर्तमान स्थिति

  • MGNREGA में सामाजिक अंकेक्षण की स्थिति पर 2017 में CAG द्वारा प्रस्तुत की गयी रिपोर्ट में 25 राज्यों में इस हेतु स्थापित की गयी सामाजिक अंकेक्षण इकाइयों (SAU) का मूल्यांकन किया गया था।
  • इस रिपोर्ट में यह पाया गया कि जहाँ कई राज्यों में सामाजिक अंकेक्षण इकाइयों की स्थापना नहीं की गई थी वहीं बिहार, हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे अन्य राज्यों में वे राज्य सरकारों के ग्रामीण विकास विभाग के भीतर एक सेल के रूप में काम कर रहे थे जबकि नियमानुसार, उन्हें स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहिये था।
  • यह भी देखा गया कि ऐसे अंकेक्षण करने वाले कर्मचारियों का भारी अभाव था तथा अधिकाँश राज्यों में इसके लिये वार्षिक कैलेंडर तक तैयार नहीं किया गया था।
  • इसके अलावा, ग्रामीण समुदायों की सहभागिता में कमी, ग्राम सभा की बैठकों का न होना, जन सुनवाई आदि न आयोजित किया जान जैसी कई समस्याएँ भी सामने आईं।

सामाजिक अंकेक्षण के राह में आने वाली बाधाएं :

  • प्रशासनिक एवं राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी : ऐसा देखा गया है कि सत्ताधारी दल एवं नौकरशाही द्वारा सामाजिक अंकेक्षण के क्रियान्वयन में ढिलाई बरती जाती है और कई बार अपने भ्रस्ताचार को छिपाने के लिये इन्हें आगे बढ़ने से रोका भी जाता है।
  • SAU की स्वतंत्रता में कमी: सामाजिक अंकेक्षण इकाईयाँ अभी तक स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर पा रही हैं तथा वे क्रियान्वयन एजेंसियों के अधीन हैं।
  • आगे की कार्यवाही नहीं: सामाजिक अंकेक्षण की निर्धारित मानकों का अनुपालन न करने की दिशा में कोई निश्चित कानूनी प्रक्रिया निर्धारित नहीं की गयी है।
  • इन्हें नीति निर्माताओं द्वारा मूलभूत आँकड़ों के रूप में नहीं देखा जाता है और न ही इनके आधार पर निवर्तमान योजनाओं में परिवर्तन किये जाते हैं।
  • जन जागरूकता की कमी : इस कारण जनता द्वारा अभी भी इन अंकेक्षणों में हिस्सा नहीं लिया जा रहा है। साथ ही पंचायती राज्य सस्थाओं द्वारा भी इन्हें पर्याप्त समर्थन प्राप्त नहीं हो रहा है।

आन्ध्र एवं तेलंगाना का उदाहरण 

  • जहाँ अन्य राज्यों में सामाजिक अंकेक्षण अप्रभावी रहा है, वहीं तेलंगाना तथा आंध्र प्रदेश में 2008 से NREGA पर नियमित रूप से सामाजिक अंकेक्षण किया जा रहा है।
  • तेलंगाना द्वारा 8 राउंड्स में 9,125 जन सुनवाई एवं 21,827 पंचायतों का अंकेक्षण किया गया है।
  • सोसाइटी फॉर सोशल ऑडिट अकाउंटेबिलिटी एंड ट्रांसपेरेंसी (SSAAT-तेलंगाना) के सहयोग से किये गए एक अध्ययन में पाया गया कि जहाँ एक ओर नरेगा भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं के निवारण के लिये बनाया गया था, वहीं दूसरी ओर ये श्रमिकों की व्यक्तिगत शिकायतों के निवारण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
  • जन सुनवाई से पूर्व कुल प्राप्त शिकायतों में से 32% का निवारण SSAAT द्वारा ही कर दिया गया। 
  • सामाजिक अंकेक्षण सुविधा-प्रदाताओं में से अधिकांश दलित थे, जिन्होंने कहा कि उनके द्वारा किये गए सामाजिक अंकेक्षणों में से 50% ने भ्रष्टाचार को रोकने में मदद की।
  • यह भी देखा गया कि राज्य सरकार द्वारा कमजोर प्रतिक्रिया एवं वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा सहयोग में कमी सामाजिक अंकेक्षण में दो महत्त्वपूर्ण बाधाएं थीं।
  • इस प्रकार इन दोनों राज्यों ने मनरेगा में सामाजिक अंकेक्षण को सुधार के एक महत्त्वपूर्ण साधन के रूप में प्रयोग किया है तथा पारदर्शिता, सहभागिता तथा जवाबदेहिता की मांगों के अनुरूप इसे संरेखित भी किया है।

आगे की राह :

  • सामाजिक अंकेक्षणों को महत्त्वपूर्ण संदर्भ बिंदु का दर्जा दिया जाना चाहिये। नीति-निर्माण से पूर्ण सामाजिक अंकेक्षण से प्राप्त आँकड़ों को आधार के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिये।
  • इसके लिये उपयुक्त प्रक्रियाएँ एवं तंत्र स्थापित किये जाने चाहिये एवं एक निगरानी इकाई को स्वतंत्र रूप से इन पर नज़र रखने का कार्यभार सौंपा जाना चाहिए। 
  • जनता की अधिकाधिक भागीदारी को सुनिश्चित करने हेतु, यह आवश्यक है कि इन्टरनेट तथा सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें जागरूक किया जाए। इसके अतिरिक्त सामाजिक अंकेक्षण को पारदर्शी बनाने हेतु यह भी ज़रूरी है कि स्मार्टफ़ोन एवं एप्स आदि के प्रयोग द्वारा इस प्रक्रिया को गोपनीय एवं पारदर्शी बनाया जाए।

निष्कर्ष

यह सिद्ध हो चुका है कि मनरेगा ने देश में रोज़गार प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सामाजिक अंकेक्षण इनके लाभों को और अधिक व्यापक रूप से जन जन तक पहुँचाने में सहायता कर रहा है। समय की मांग है कि सामाजिक अंकेक्षण प्रक्रिया की चुनौतियों का समाधान खोजने हेतु देश के थिंक टैंक का प्रयोग किया जाए एवं भविष्य हेतु रणनीति निर्धारित की जाए। तेलंगाना के एक दशक लम्बे अनुभव से सीख लेते हुए अन्य राज्यों में बेहतर योजनाओं का निरूपण इस सुधार हेतु एक अपरिहार्य कदम है।

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