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सामाजिक अंकेक्षण में सुधार –तेलंगाना में मनरेगा के अंकेक्षण से सीख | 12 May 2018 |

संदर्भ

MGNREGA-1

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के शब्दों में “पारदर्शिता” एवं “जवाबदेहिता” लोकतंत्र के दो स्तंभ हैं- एक अवधारणा के रूप में सामाजिक अंकेक्षण पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता-दोनों के उद्देश्यों की जमीनी स्तर पर पूर्ती करता है।“ सामाजिक अंकेक्षण को 2005 में ही महात्मा गाँधी रोज़गार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) के लिये अनिवार्य बनाया गया था, लेकिन अभी तक अधिकाँश राज्यों में इसके क्रियान्वयन में ढिलाई दिखाई गयी है तथा इसके द्वारा अनेक चुनौतियों का सामना किया जा रहा है। इस मामले में तेलंगाना द्वारा नियमित तथा समावेशी सामाजिक अंकेक्षण का एक उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत किया गया है।

क्या है सामाजिक अंकेक्षण

सामाजिक अंकेक्षण की पृष्ठभूमि

सामाजिक अंकेक्षण के लाभ

social

  social-audit

MGNREGA तथा सामाजिक अंकेक्षण

भारत के 73वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से ग्रामीण इलाकों में पंचायती राज व्यवस्था सुदृढ़ करने का प्रावधान किया गया, ताकि विकेन्द्रित नियोजन प्रणाली के माध्यम से ग्रामीण विकास किया जा सके। इस उद्देश्य से केन्द्र सरकार द्वारा 2 फरवरी, 2006 में देश के चुने हुए 200 अति पिछड़े जनपदों में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना लागू की गई। द्वितीय चरण में देश के 330 अन्य जनपदों को भी योजना में सम्मिलित किया गया तथा 1 अप्रैल, 2008 से रोज़गार गारंटी योजना को पूरे देश में चलाया जा रहा है जिसे 2 अक्तूबर, 2009 से केन्द्र सरकार द्वारा नाम संशोधित करके महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) कर दिया गया है। 

वर्तमान स्थिति

सामाजिक अंकेक्षण के राह में आने वाली बाधाएं :

आन्ध्र एवं तेलंगाना का उदाहरण 

आगे की राह :

निष्कर्ष

यह सिद्ध हो चुका है कि मनरेगा ने देश में रोज़गार प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सामाजिक अंकेक्षण इनके लाभों को और अधिक व्यापक रूप से जन जन तक पहुँचाने में सहायता कर रहा है। समय की मांग है कि सामाजिक अंकेक्षण प्रक्रिया की चुनौतियों का समाधान खोजने हेतु देश के थिंक टैंक का प्रयोग किया जाए एवं भविष्य हेतु रणनीति निर्धारित की जाए। तेलंगाना के एक दशक लम्बे अनुभव से सीख लेते हुए अन्य राज्यों में बेहतर योजनाओं का निरूपण इस सुधार हेतु एक अपरिहार्य कदम है।