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हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारतीय पहुँच

  • 22 Jun 2019
  • 14 min read

संदर्भ

हिंद-प्रशांत क्षेत्र हाल के वर्षों में भू-राजनीतिक रूप से विश्व की विभिन्न शक्तियों के मध्य कूटनीति एवं संघर्ष का नया मंच बन चुका है। साथ ही यह क्षेत्र अपनी अवस्थिति के कारण महत्त्वपूर्ण हो गया है। वर्तमान में विश्व व्यापार के 75 प्रतिशत वस्तुओं का आयात-निर्यात इसी क्षेत्र से होता है तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र से जुड़े हुए बंदरगाह विश्व के सर्वाधिक व्यस्त बंदरगाहों में शामिल हैं। विश्व GDP के 60 प्रतिशत का योगदान इसी क्षेत्र से होता है। यह क्षेत्र ऊर्जा व्यापार (पेट्रोलियम उत्पाद) को लेकर उपभोक्ता और उत्पादक दोनों राष्ट्रों के लिये संवेदनशील बना रहता है।

चीन की सी जिनपिंग सरकार इस क्षेत्र अपनी नीतियों को वैश्विक आयाम देने का प्रयास कर रही है, वन बेल्ट वन रोड नीति (Belt & Road Initiative) चीन की की इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है। जहाँ एक ओर BRI नीति के एक प्रमुख घटक के रूप में चीन के लिये हिंद-प्रशांत क्षेत्र का महत्त्व है, तो वहीं दूसरी ओर अमेरिका (USA) ने भी हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर अपनी रणनीति में बदलाव किया है। अमेरिका इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है, ताकि वह चीन के प्रसार को कम कर सके और अमेरिकी हितों को साध सके। अमेरिका और चीन के साथ ही भारत, जापान, आसियान (ASEAN) तथा फ्राँस भी अपनी भूमिका इस क्षेत्र में बढ़ाने पर बल दे रहे हैं। विभिन्न राष्ट्रों की नीतियों ने इस क्षेत्र को विश्व राजनीति के पटल पर ला दिया है।

क्या है हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र ?

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है हिंद (Indo) यानी हिंद महासागर (Indian Ocean) और प्रशांत (Pacific) यानी प्रशांत महासागर के कुछ भागों को मिलाकर जो समुद्र का एक हिस्सा बनता है, उसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific Area) कहते हैं। विशाल हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के सीधे जलग्रहण क्षेत्र में पड़ने वाले देशों को ‘इंडो-पैसिफिक देश’ कहा जा सकता है। पूर्वी अफ़्रीकी तट, हिंद महासागर तथा पश्चिमी एवं मध्य प्रशांत महासागर मिलकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र बनाते हैं।

Asia & Indo pacific region

पिछले कुछ वर्षों में समुद्री सुरक्षा और सहयोग का महत्त्व बढ़ा है, विभिन्न देशों के संयुक्त वक्तव्य एवं संगठनों के घोषणा-पत्रों में समुद्री समझौतों को लेकर उच्च प्राथमिकता देखी जा सकती है। इसी परिप्रेक्ष्य में चीन ने अपनी नीति में बदलाव किया है, चीन एक समान और समतापूर्ण विश्व व्यवस्था पर ज़ोर दे रहा है। अमेरिका की एक रिपोर्ट (US Indo-Pacific Strategy Report) जो हाल ही में प्रकाशित हुई है, में साझेदारी पर बल देकर इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखने पर ज़ोर दिया गया है। इस रिपोर्ट में अमेरिका नें चीन की नीतियों की आलोचना करते हुए उसको प्रमुख प्रतिद्वंद्वी माना है, साथ ही इस रिपोर्ट में ‘नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय आर्डर’ (Rules-based International Order) तथा ‘फ्री और ओपन इंडो-पैसिफिक’ (Free and Open Indo-Pacific) क्षेत्र की वकालत की गई है।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की स्थिति

पिछले कुछ वर्षों में भारत की नीति में इस क्षेत्र के संबंध में बदलाव आया है। पहले भारत की नीति में इस क्षेत्र के लिये अलगाव की स्थिति थी। लेकिन अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिये भारत की नीति भारतीय सामुद्रिक हितों से परिचालित हो रही है। सागर पहल (Security and Growth for All in the Region-SAGAR) द्वारा भारत इस क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा पर ज़ोर दे रहा है। साथ ही इस रणनीति को मूर्तरूप देने के लिये सागरमाला परियोजना पर कार्य कर रहा है, ताकि भारत अपनी तटीय अवसंरचना को सुदृढ़ करके अपनी क्षमता में वृद्धि कर सके। इस तरह भारत न सिर्फ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपने हितों को साध सकेगा बल्कि ब्लू इकॉनमी के लक्ष्य को भी प्राप्त कर सकेगा। ब्लू इकॉनमी पर बल देने तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र के महत्त्व को देखते हुए ही नई सरकार ने अपने शपथ ग्रहण में बिम्सटेक (BIMSTEC) देशों को आमंत्रित किया, इतना ही नहीं भारतीय प्रधानमंत्री नें अपनी पहली विदेश यात्रा के लिये मालदीव और श्रीलंका चुना। कुछ वर्षों में भारत द्वारा हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर किये गए प्रयास इस क्षेत्र के संबंध में भारत की बदलती नीति को प्रदर्शित करते हैं तथा इस क्षेत्र के महत्त्व को भी इंगित करते हैं।

भारत के उपर्युक्त प्रयासों के बावजूद कुछ ऐसे कदम हैं जिनको उठाया जाना आवश्यक है-

प्रथम, इस क्षेत्र में भारत को और अधिक सक्रिय रूप से समुद्री हितों को लेकर नीति को गति देने की आवश्यकता है, जिससे इस क्षेत्र में विकसित हो रहे नैरेटिव में वह प्रमुख भूमिका निभा सके। अतः भारत को सागर (SAGAR) पहल पर बल देना होगा और इसके लिये एक ऐसे ढाँचे का निर्माण करना होगा जिससे उचित रूप से क्रियान्वित किया जा सके। भारत द्विपक्षीय, त्रिपक्षीय और बहुपक्षीय साझेदारियों के माध्यम से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी स्थिति को मजबूत कर सकता है और इसके लिये भारत को सागरमला परियोजना पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। यह परियोजना अवसंरचना को तटीय भागों में सुदृढ़ करेगी जिससे विनिर्माण, व्यापार तथा पर्यटन को प्रोत्साहन मिलेगा।

द्वितीय, विश्व के लगभग सभी देश समुद्र में स्वतंत्र नौ-परिवहन को लेकर एक मत हैं लेकिन विभिन्न देशों में नौ-परिवहन की स्वतंत्रता की परिभाषा को लेकर गहरे मतभेद बने हुए हैं। इसका कारण कई देशों के कानूनों का अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानून (International Maritime Law-IML) से भिन्न होना है। इस विषय पर भारत अन्य देशों के मध्य मतभेदों को समाप्त करने और एक निश्चित परिभाषा पर सहमत होने के लिये नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है। भारत का IML का के पालन करने का रिकॉर्ड और समुद्री शक्ति के रूप में इसकी विश्वसनीयता, इसे इस तरह के प्रयास का नेतृत्व करने के लिये एक आदर्श स्थिति प्रदान करते हैं।

तृतीय, भारत को चाहिये कि वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी पहुँच में वृद्धि करे। परिचालन द्वारा भारत अपनी उपस्थिति को इस क्षेत्र में मज़बूती से दर्ज करा सकता है। यह इस क्षेत्र में भारत के दीर्घकालीन हितों की पूर्ति करेगा, साथ ही इस क्षेत्र की स्थिरता को भी मज़बूती प्रदान करेगा। इस क्षेत्र में भारत के जापान जैसे सहयोगी पहले से ही मौज़ूद हैं, जो भारत को आवश्यकता के समय लॉजिस्टिक सपोर्ट उपलब्ध करा सकते हैं।

चतुर्थ, सागरमाला परियोजना जैसी अन्य परियोजनाओं को भी आरंभ किया जा सकता है। इन परियोजनाओं के माध्यम से बंदरगाहों के विकास, बेहतर कनेक्टिविटी, बंदरगाह आधारित औद्योगीकरण, तटों के करीब रहने वाले लोगों का सामाजिक-आर्थिक विकास, निवेश तथा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से नई नौकरियों के सृजन पर ध्यान दिया जा सकता है। इन परियोजनाओं को लागू करते समय इनके प्रभावों और अवधि का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिये, ताकि निश्चित समय में परियोजनाओं को पूरा किया जा सके। इसके अतिरिक्त अन्य मित्र राष्ट्रों के साथ मिलकर क्षमता निर्माण एवं अन्य संभावनाओं पर भी विचार किया जा सकता है।

पंचम, सरकार को हिंद-प्रशांत क्षेत्र को समर्पित एक अध्ययन केंद्र के निर्माण की संभावना पर भी विचार करना चाहिये। यदि संभव हो तो ऐसे केंद्र की स्थापना अंडमान निकोबार द्वीप में हो सकती है जिसमें इस क्षेत्र से संबंधित विभिन्न पाठ्यक्रमों को शामिल किया जाना चाहिये। ऐसे केंद्र के निर्माण के लिये सार्वजनिक निजी भागीदारी मॉडल का उपयोग किया जा सकता है जो संसाधन के साथ-साथ विशेषज्ञता के संदर्भ में भी उपयोगी होगा।

निष्कर्ष

हाल के वर्षों में हिंद-प्रशांत क्षेत्र आर्थिक गतिविधियों का केंद्रबिंदु बनकर उभरा है। आर्थिक महत्ता की वृद्धि ने इस क्षेत्र को भू-राजनीति के मंच पर ला दिया है। इसी आधार पर विभिन्न राष्ट्र अपने हितों को पूरा करने के लिये इस क्षेत्र पर प्रभाव स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। भारत के हितों की दृष्टि से आवश्यक है कि भारत भी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करे। आर्थिक रूप से मज़बूत किंतु विनम्र (benign) राष्ट्र की छवि भारत के लिये सहयोगी बनाने में प्रायः सहायक ही है, इन सहयोगियों के साथ चलकर भारत इस क्षेत्र में मज़बूत स्थिति को प्राप्त कर सकता है तथा चीन की प्रसार की नीति के बावजूद अपने हितों को पूरा करने में सफल हो सकता है।

सागरमाला परियोजना (Sagarmala Project)

सागरमाला कार्यक्रम की शुरुआत 25 मार्च, 2015 को की गई थी। इसे भारत में बंदरगाह आधारित आर्थिक विकास के व्यापक उद्देश्यों के साथ शुरू किया गया है। भारत के 7,500 किलोमीटर लंबे तटवर्ती क्षेत्रों, 14,500 किलोमीटर संभावित जलमार्ग और प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्गों के रणनीतिक स्थानों के दोहन के उद्देश्य से सरकार ने महत्त्वाकांक्षी सागरमाला कार्यक्रम तैयार किया है।

नीली अर्थव्यवस्था ( Blue Economy)

नीली अर्थव्यवस्था का तात्पर्य ऐसी अर्थव्यवस्था से है जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सागरों अथवा महासागरों से जुडी हो। हिंद महासागर क्षेत्र में भारत रणनीतिक स्‍थान पर है और वह अपने सतत् समावेशी और जन केंद्रित रूप में नीली अर्थव्‍यवस्‍था के विकास को स्‍वीकृति देता हैं। भारत द्वारा अपनी महत्त्वाकांक्षी सागरमाला कार्यक्रम के अंतर्गत 600 से अधिक परियोजनाएँ चिह्नित की गई हैं और इनमें वर्ष 2020 तक लगभग 8 लाख करोड़ रुपए (120 बिलियन डॉलर) के निवेश का प्रावधान है। भारत अपने मैरीटाइम ढाँचे के साथ-साथ अंतर्देशीय जलमार्गों तथा महत्त्वाकांक्षी सागरमाला कार्यक्रम के माध्‍यम से तटीय जहाज़रानी (Coastal Shipment) को विकसित कर रहा है।

नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय आदेश

(Rules Based International Order)

नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय आदेश को आमतौर पर सभी देशों द्वारा साझा नियमों के अनुसार अपनी गतिविधियों का संचालन करने के लिये प्रतिबद्धता के रूप में वर्णित किया जा सकता है, जो समय के साथ विकसित होते हैं, जैसे कि अंतर्राष्ट्रीय कानून, क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था, व्यापार समझौते, आव्रजन प्रोटोकॉल और सांस्कृतिक आयोजन।

प्रश्न- हिंद-प्रशांत क्षेत्र की राजनीति में हाल के वर्षों में व्यापक बदलाव प्रदर्शित हुए है इन बदलावों का भारत के संदर्भ में क्या निहितार्थ हैं, साथ ही यह भी बताइये कि किस प्रकार भारत इस क्षेत्र में अपनी पहुँच में विस्तार कर सकता है ?

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