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मानवाधिकार संरक्षण विधेयक, 2019 तथा NHRC

  • 19 Aug 2019
  • 15 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस आलेख में मानवाधिकार संरक्षण विधेयक तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की चर्चा की गई है, साथ ही NHRC से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर भी प्रकाश डाला गया है। आवश्यकतानुसार यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

कुछ समय पूर्व मानवाधिकार संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2019 को संसद द्वारा पारित कर दिया गया। इसमें प्रस्तावित संशोधन मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के कुछ प्रावधानों को विस्थापित करेंगे। इस विधेयक में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission-NHRC) तथा राज्य मानवाधिकार आयोग (State Human Rights Commission-SHRC) की संरचना एवं कार्यकाल से संबंधित कुछ बदलाव किये गए हैं। चूँकि लंबे समय से आयोग की सीमाओं और कमज़ोरियों को लेकर चर्चा होती रही है ऐसे में इस संशोधन में आयोग की शक्ति में विस्तार करने जैसे प्रावधानों की कमी चिंता का विषय है। इस आधार पर कुछ विश्लेषकों ने विधेयक की आलोचना की है, यद्यपि कुछ संशोधन ऐसे भी है जिसकी सराहना की जा सकती है।

मानवाधिकार (Human Rights)

संयुक्त राष्ट्र (UN) की परिभाषा के अनुसार ये अधिकार जाति, लिंग, राष्ट्रीयता, भाषा, धर्म या किसी अन्य आधार पर भेदभाव किये बिना सभी को प्राप्त हैं। मानवाधिकारों में मुख्यतः जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार, गुलामी और यातना से मुक्ति का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार और काम एवं शिक्षा का अधिकार, आदि शामिल हैं। कोई भी व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के इन अधिकारों को प्राप्त करने का हकदार होता है।

क्या है राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग?

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission-NHRC) एक स्वतंत्र वैधानिक संस्था है, जिसकी स्थापना मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के प्रावधानों के तहत 12 अक्तूबर, 1993 को की गई थी। मानवाधिकार आयोग का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है। यह संविधान द्वारा दिये गए मानवाधिकारों जैसे- जीवन का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार एवं समानता का अधिकार आदि की रक्षा करता है और उनके प्रहरी के रूप में कार्य करता है।

आयोग की संरचना (संशोधन के उपरांत)

NHRC एक बहु-सदस्यीय संस्था है। इसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति (प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा का उप-सभापति, संसद के दोनों सदनों के मुख्य विपक्षी नेता तथा केंद्रीय गृहमंत्री) की सिफारिशों के आधार पर की जाती है। अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल 3 वर्षों या 70 वर्ष की उम्र, जो भी पहले हो, तक होता है। इन्हें इनके पद से केवल तभी हटाया जा सकता है जब उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की जाँच में इन पर दुराचार या असमर्थता के आरोप सिद्ध हो जाएं। इसके अतिरिक्त आयोग में पाँच विशिष्ट विभाग (विधि विभाग, जाँच विभाग, नीति अनुसंधान एवं कार्यक्रम विभाग, प्रशिक्षण विभाग और प्रशासन विभाग) भी होते हैं। राज्य मानवाधिकार आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा राज्य के मुख्यमंत्री, राज्य के गृह मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष के परामर्श पर की जाती है।

अधिनियम में बदलाव

  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) का ढाँचा:
    • इस अधिनियम के अंतर्गत आयोग के अध्यक्ष के रूप में केवल उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ही नियुक्त किया जा सकता था। किंतु संशोधन के पश्चात् अध्यक्ष पद के लिये उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीश भी योग्य होंगे।
    • इस अधिनियम में ऐसे दो सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान था जिन्हें मानवाधिकारों के क्षेत्र की व्यापक समझ एवं ज्ञान हो। संशोधन के बाद इस संख्या को बढ़ाकर तीन कर दिया गया है, इसमें कम-से-कम एक महिला सदस्य का होना आवश्यक है।
    • इस अधिनियम के अंतर्गत पूर्व में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC), राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) तथा राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) के अध्यक्ष ही मानवाधिकार आयोग के सदस्य होते थे लेकिन अब राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC), बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष तथा दिव्यांगों के लिये मुख्य आयुक्त को भी NHRC का सदस्य नियुक्त किया जाएगा।
  • राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC): संशोधन से पूर्व SHRC का अध्यक्ष उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को नियुक्त किया जाता था लेकिन अब उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीश भी SHRC के अध्यक्ष बन सकेंगे।
  • कार्यकाल: अधिनियम के अंतर्गत NHRC तथा SHRC के अध्यक्ष का कार्यकाल पाँच वर्ष अथवा 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले पूर्ण हो) होती थी। संशोधन के बाद अब इस कार्यकाल को घटा कर 3 वर्ष कर दिया गया है हालाँकि आयु सीमा पूर्ववत ही है। इसके अतिरिक्त 5 वर्ष की अवधि के लिये NHRC तथा SHRC के अध्यक्ष की पुनर्नियुक्ति का भी प्रावधान किया गया है।
  • शक्तियाँ: अधिनियम के अंतर्गत NHRC के महासचिव तथा SHRC के सचिव उन्हीं शक्तियों का उपयोग करते थे जो उन्हें सौंपी जाती थी। संशोधन के पश्चात् उपर्युक्त अधिकारी अपने अध्यक्ष के अधीन सभी प्रशासनिक एवं वित्तीय शक्तियों का उपयोग कर सकेंगे यद्यपि इसमें न्यायिक शक्तियाँ शामिल नहीं है।
  • संघशासित क्षेत्र: संशोधन के बाद संघशासित क्षेत्र से संबंधित मामलों को केंद्र सरकार SHRC को प्रदान कर सकती है। किंतु दिल्ली से संबंधित मामले NHRC द्वारा निपटाए जाएँगे।

ज़रूरी बदलाव अभी भी उपेक्षित

  • वर्तमान सरकार ने एक बार फिर मानवाधिकार आयोग के चार्टर में संशोधन किया है। संसद द्वारा पारित मानवाधिकार संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2019 में व्यापक परिवर्तन किये गए हैं जिनका आयोग की संरचना पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। संशोधित अधिनियम के अंतर्गत अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की अध्यक्षता केवल सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि न्यायालय के किसी भी सेवानिवृत न्यायाधीश को यह पद सौंपा जा सकता है। हालाँकि इस परिवर्तन के परिणाम आना शेष है।
  • पहले अधिनियम के अंतर्गत ऐसे सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान जिन्हें मानवाधिकारों से संबंधित मामलों का ज्ञान अथवा अनुभव हो। ऐसे सदस्यों की संख्या को बढ़ाकर अब तीन कर दिया गया है जिनमें से एक महिला सदस्य होगी, लेकिन इन प्रतिष्ठित पदों का सरकार की पसंद के किसी भी व्यक्ति के लिये खुला रहना अब भी जारी रखा गया है। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार न्यायशास्त्र तीव्रता से विकसित हो रहा है और इसमें विशेषज्ञता रखने वाले प्रख्यात विद्वानों की कोई कमी नहीं, लेकिन क्रमिक सरकारों ने ऐसे किसी विशेषज्ञ अथवा किसी प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकता को आयोग की सदस्यता सौपने पर कभी विचार नहीं किया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पदेन सदस्य बनने वाले विभिन्न आयोगों के अध्यक्षों की सूची में दो अन्य आयोगों के अध्यक्षों को शामिल किया गया है – पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष और बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष। इसके साथ ही दिव्यांग व्यक्तियों के लिये मुख्य आयुक्त को भी इसका सदस्य बनाया गया है। इस प्रकार मानवाधिकार आयोग में पूर्णकालिक सदस्यों से अधिक संख्या अनुबद्ध किये गए सदस्यों की होगी।
  • आयोग की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से यह अधिनियम इसके अध्यक्षों व सदस्यों की सरकारी पद पर नियुक्ति पर प्रतिबंध लगाता है। लेकिन इन प्रतिबंधों का पालन नहीं हुआ। आयोग के पहले कार्यकाल से ही इसके उदाहरण मिलने शुरू हो गए जब इसके दो पदस्थ सदस्यों को राज्यपाल बना दिया गया और अब तक यह उल्लंघन जारी है। नए संशोधन विधेयक में अधिनियम के इस प्रावधान में कोई संशोधन नहीं किया गया है।
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का मुख्य कार्य ‘मानवाधिकारों का उल्लंघन अथवा इसका दुष्प्रेरण, अथवा ऐसे उल्लंघनों पर रोक लगाने हेतु लोक सेवक द्वारा की गई लापरवाही’ की शिकायतों की जाँच करना है। लेकिन निष्कर्षों के आधार पर वह अपने निर्णयों को निष्पादित नहीं कर सकता। इसके लिये इस उच्चस्तरीय निकाय को केंद्र या राज्य सरकार अथवा न्यायिक पदानुक्रम (शीर्ष न्यायालय से लेकर निचले स्तर पर मजिस्ट्रेट तक) पर निर्भर रहना पड़ता है। नए संशोधनों में इस आशय के वैधानिक प्रावधानों को भी स्पर्श नहीं किया गया है।
  • NHRC के पास जाँच करने के लिये कोई भी विशेष तंत्र नहीं है। अधिकतर मामलों में यह संबंधित सरकार को मामले की जाँच करने का आदेश देता है। NHRC की किसी भी मामले पर शक्तियाँ सिर्फ सलाहकारी प्रकृति की ही हैं। सिफारिशों को लागू करवाने के लिये किसी प्रकार का विशेष तंत्र मौजूद नहीं है।
  • कई बार धन की अपर्याप्ता भी NHRC के कार्य में बाधा डालती है।
  • NHRC उन शिकायतों की जाँच नहीं कर सकता जो घटना के एक साल बाद दर्ज कराई जाती हैं और इसीलिये कई शिकायतें बिना जाँच के ही रह जाती हैं, इसके साथ ही, अक्सर सरकार या तो NHRC की सिफारिशों को पूरी तरह से खारिज कर देती है या उन्हें आंशिक रूप से ही लागू किया जाता है।

सुझाव

NHRC को सही मायनों में मानवाधिकारों के उल्लंघन का एक कुशल प्रहरी बनाने के लिये उसमें कई सुधार किये जाने की आवश्यकता है। सरकार द्वारा आयोग के निर्णयों को पूरी तरह से लागू करके उसकी प्रभावशीलता में वृद्धि की जा सकती है। NHRC की संरचना में भी परिवर्तन करने की आवश्यकता है तथा इसमें आम नागरिकों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाना चाहिये। NHRC को जाँच के लिये उचित अनुभव वाले कर्मचारियों का एक नया काडर तैयार करना चाहिये ताकि सभी मामलों की स्वतंत्र जाँच की जा सके। भारत में मानवाधिकार की स्थिति को सुधारने और मज़बूत करने के लिये राज्य अभिकर्त्ताओं और गैर-राज्य अभिकर्त्ताओं (State & Non-state Actors) को एक साथ मिलकर काम करना होगा।

निष्कर्ष

भारत मानवाधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग जैसे कार्यक्रमों का हिस्सा रहा है इस बात को ध्यान में रखकर ही वर्ष 1993 में राष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम पारित किया गया। वर्ष 2018 में ही इस अधिनियम की 25वीं वर्षगाँठ मनाई गई। हालाँकि अभी भी इस अधिनियम के आदर्श को प्राप्त करना शेष है। NHRC की कार्यशैली, शक्तियों एवं अन्य कारकों (जिसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है) से इसकी आलोचना की जाती रही है। इसी संदर्भ में पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी ने इसे ‘India’s teasing illusion’ की संज्ञा दी है। वर्तमान में किये गए संशोधन भी NHRC में ज़रूरी बदलावों को संबोधित नहीं करते हैं जिसके कारण आवश्यक प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं। इन प्रश्नों को हल करके ही एक शक्तिशाली मानवाधिकार संगठन का निर्माण किया जा सकता है जो असल मायने में मानव के अधिकारों की सुरक्षा एवं संरक्षा कर सकेगा।

प्रश्न: हाल ही में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम में संशोधन किया गया है, फिर भी NHRC से संबंधित कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिन्हें संबोधित करना आवश्यक है। विवेचना कीजिये।

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