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सुरक्षा बलों के मानवाधिकार का मुद्दा

  • 09 Mar 2019
  • 14 min read

संदर्भ

सुप्रीम कोर्ट ने ड्यूटी के दौरान भीड़ के हमलों का शिकार होने वाले सुरक्षा बलों के जवानों के मानवाधिकारों के संरक्षण हेतु दायर याचिका पर सुनवाई के लिये सहमति जताई है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने 19 वर्षीय प्रीती केदार गोखले और 20 वर्षीय काजल मिश्रा की याचिका पर केंद्र सरकार, रक्षा मंत्रालय, जम्मू कश्मीर सरकार और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को नोटिस जारी किये।

क्या कहा गया है याचिका में?

  • याचिकाकर्त्ताओं का कहना है कि वे जम्मू-कश्मीर में सैनिकों और सेना के काफिलों पर उग्र और विघटनकारी भीड़ के हमलों की घटनाओं से काफी विचलित हैं। दोनों याचिकाकर्ता सैन्य अधिकारियों की बेटियाँ हैं।
  • याचिका में कहा गया है कि ड्यूटी के दौरान उग्र भीड़ के हमलों का शिकार होने वाले सुरक्षा बल के कार्मिकों के मानवाधिकारों के उल्लंघन पर अंकुश लगाने के लिये एक नीति तैयार की जाए।
  • सैन्यकर्मियों के मानवाधिकारों के उल्लंघन के अनेक कृत्यों पर कारगर कदम उठाने में प्रतिवादियों के विफल रहने का नतीजा है कि उनके अपने कर्त्तव्यों के निर्वहन में बाधा आ रही है और तैनाती के स्थानों पर सुरक्षा बलों की सुरक्षा को भी खतरा उत्पन्न हो रहा है।
  • भारतीय सेना की टुकड़ियों पर उग्र भीड़ के पथराव की घटनाओं के बाद सुरक्षा बनाए रखने की ज़िम्मेदारी निभा रहे सैन्यकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज किये जाने की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा गया है कि पथराव करने वालों के खिलाफ आत्मरक्षा के लिये की गई कार्रवाई पर भी मामले दर्ज किये जा रहे हैं।

याचिका में जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा विधानसभा में की गई घोषणा को स्तब्ध करने वाला बताया गया है कि पथराव करने वालों के खिलाफ दर्ज 9760 प्राथमिकी सिर्फ इसलिये वापस ली जाएंगी क्योंकि यह उनका पहला अपराध था।

इसके विरोध में तर्क यह दिया गया है कि सरकार दंड प्रक्रिया संहिता-रणबीर प्रक्रिया संहिता में प्रदत्त कानूनी प्रक्रिया का पालन किये बगैर किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई प्राथमिकी वापस नहीं ले सकती ।

सुरक्षा बलों के मानवाधिकारों का ड्यूटी के दौरान उल्लंघन होता है। उन पर उग्र भीड़ और लोग पथराव तथा हमले करते हैं, इससे उनके स्वतंत्रता और जीवन के मानवाधिकार का उल्लंघन होता है। जम्मू-कश्मीर में हिंसा भड़कने के दौरान सुरक्षा बलों की जान को खतरा रहता है और उन्हें अपनी ड्यूटी करने में परेशानी होती है। लेकिन इस ओर सरकार तथा किसी संस्था द्वारा कोई पहल नहीं की जाती है।

सहमति के तर्क

  • वर्दी पहन लेने का यह अर्थ कदापि नहीं कि सशस्त्र बलों के कर्मियों के मानवाधिकारों का हनन नहीं होता है। एक सैनिक भी किसी अन्य मनुष्य की तरह है।
  • सशस्त्र बलों के कर्मी भी भारत के नागरिक हैं और उनके मूल अधिकारों की भी रक्षा की जानी चाहिये।
  • चीन और इज़राइल जैसे कुछ देश पत्थरबाज़ों या हथियारबंद नागरिकों के खिलाफ अस्त्रों के उपयोग की अनुमति देते हैं।
  • कई बार देखने में यह जाता है कि सैनिक के मानवाधिकारों का उल्लंघन भीड़ द्वारा उस समय किया जाता है जब वह अपना वैध कर्त्तव्य निभा रहा होता है।
  • सैनिक अपने स्वयं के मानवाधिकारों की रक्षा नहीं कर पाते हैं यानी कि वे मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिये अपने खिलाफ दायर की जा सकने वाली संभावित FIR के डर से भीड़ द्वारा फेंके जा रहे पत्थरों या इस्तेमाल किये जा रहे हथियारों का जवाब उसी प्रकार नहीं दे सकते।
  • देखा यह गया है कि राज्य प्रायः सैनिकों की तुलना में नागरिकों का पक्ष लेते हैं।

असहमति के तर्क

  • आत्मरक्षा के लिये सुरक्षा कर्मियों द्वारा की गई कार्रवाई के कारणों की जाँच करना मुश्किल है।
  • भारत में कानून सैनिकों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करते हैं और ऐसे में उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई कर पाना आसान नहीं है।

सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) के तहत किसी अशांत घोषित इलाके में कानून के खिलाफ काम करने वाले किसी व्यक्ति को चेतावनी देने के बाद सशस्त्र बलों को गोली चलाने का या अन्य शक्तियों का इस्तेमाल करने का अधिकार होता है, चाहे इससे किसी की मौत ही क्यों न हो जाए। साथ ही इस कानून में यह व्यवस्था भी है कि ऐसे किसी भी कृत्य के लिये उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती।

  • दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 321 में स्पष्ट कहा गया है कि कोई भी FIR अदालत की अनुमति से ही वापस ली जा सकती है।

सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) क्या है?

  • सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) 1958 में एक अध्यादेश के माध्यम से लाया गया था तथा तीन माह के भीतर इसे कानूनी रूप दे दिया गया था।
  • भारत में संविधान लागू होने के बाद से ही पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ रहे अलगाववाद, हिंसा और विदेशी आक्रमणों से प्रतिरक्षा के लिये मणिपुर और असम में 1958 में AFSPA लागू किया गया था।
  • 1972 में कुछ संशोधनों के बाद इसे असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम और नगालैंड सहित समस्त पूर्वोत्तर भारत में लागू किया गया था।
  • इन राज्यों के समूह को Seven Sisters के नाम से जाना जाता है। त्रिपुरा में उग्रवादी हिंसा के चलते 16 फरवरी, 1997 को AFSPA लागू किया गया था, जिसे स्थिति सुधरने पर 18 साल बाद मई 2015 में हटा लिया गया था। इसके कुछ वर्षों बाद केंद्र सरकार ने मेघालय के अलावा अरुणाचल प्रदेश के 16 में से 8 थाना क्षेत्रों से भी इसे हटा लिया गया था।
  • पंजाब में बढ़ते अलगाववादी हिंसक आंदोलन से निपटने के लिये सेना की तैनाती का रास्ता साफ करते हुए 1983 में केंद्र सरकार द्वारा AFSPA (Punjab & Chandigarh) अध्यादेश लाया गया जो 6 अक्तूबर को कानून बन गया। यह कानून 15 अक्तूबर, 1983 को पूरे पंजाब और चंडीगढ़ में लागू कर दिया गया। लगभग 14 वर्षो तक लागू रहने के बाद 1997 में इसे वापस ले लिया गया।
  • जम्मू-कश्मीर में हिंसक अलगाववाद का सामना करने के लिये सेना को विशेष अधिकार देने की प्रक्रिया के चलते यह कानून लाया गया, जिसे 5 जुलाई, 1990 को पूरे राज्य में लागू कर दिया गया, लेकिन राज्य का लेह-लद्दाख क्षेत्र इस कानून के अंतर्गत नहीं आता।

आगे की राह

  • अनियंत्रित भीड़ का सामना करते हुए सुरक्षा बलों के अधिकारों और कर्त्तव्यों पर स्पष्ट नीति इसका एक समाधान हो सकती है।
  • चूँकि APSPA सरकार द्वारा बनाया गया एक कानून है, इसलिये सरकार का यह दायित्व है कि इसके तहत उनको मिली छूट की संरक्षा करे।
  • इसके अलावा समाज का भी यह कर्त्तव्य है कि वह इस बात को समझे कि जिन पर देश की रक्षा की ज़िम्मेदारी है, वे भी उनकी तरह मनुष्य हैं और उनके भी कुछ अधिकार हैं।
  • जो देशवासियों को यह महसूस कराते हैं कि उनके रहते वे महफूज़ हैं, उनके लिये भी कानूनों का पालन प्रभावी तरीके से होना चाहिये।

राष्ट्रीय एवं राज्य मानवाधिकार आयोग

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights C0mmision-NHRC) एक सांविधिक निकाय है, जिसका गठन मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत 12 अक्तूबर, 1993 को किया गया था। इसका गठन उन सिद्धांतों के अनुरूप है, जिन्हें अक्तूबर 1991 में पेरिस में मानव अधिकार संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिये राष्ट्रीय संस्थानों पर आयोजित पहली अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला में अंगीकृत किया गया था तथा 20 दिसंबर, 1993 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा स्वीकृत किया गया था। यह निकाय मानवाधिकारों के संरक्षण के क्षेत्र में भारत की सर्वोच्च संस्था है जो भारतीय संविधान एवं अंतर्राष्ट्रीय संधियों के आधार पर व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता, गरिमा जैसे मानवाधिकारों के सरंक्षण एवं प्रसार का कार्य करती है। इसके अलावा, मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत राज्य स्तर पर राज्य मानवाधिकार आयोग लगभग सभी राज्यों में बनाए गए हैं। राज्य मानवाधिकार आयोग भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में राज्य सूची और समवर्ती सूची के अंतर्गत शामिल विषयों से संबंधित मानव अधिकारों के उल्लंघन की जाँच कर सकता है।

आयोग की प्रमुख शक्तियाँ

  • मानवाधिकार उल्लंघन के मामले से संबंधित गवाहों को समन भेजना
  • किसी दस्तावेज़ को ढूंढना और प्रस्तुत करना
  • किसी पब्लिक रिकॉर्ड को मांगना अथवा किसी न्यायालय अथवा कार्यालय से उसकी प्रति मांगना
  • गवाहों और दस्तावेज़ों की जाँच के लिये शासन पत्र जारी करना

संवैधानिक प्रावधान

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 13 प्रत्येक नागरिक को मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है। यह संसद और राज्य विधानसभाओं को ऐसे कानून बनाने से रोकता है जो देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करने वाले हो सकते हैं।

मूलभूत अधिकार

  • समानता का अधिकार
  • स्वतंत्रता का अधिकार
  • शोषण के खिलाफ अधिकार
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
  • सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार
  • संवैधानिक उपाय इस्तेमाल करने का अधिकार

संविधान का अनुच्छेद 33 मौलिक अधिकारों का एक अपवाद है। यह संसद को सशस्त्र बलों, अर्द्धसैनिक बलों, पुलिस, गुप्तचर सेवाओं में कार्यरत व्यक्तियों और उक्त संगठनों के लिये स्थापित संचार प्रणालियों के संबंध में मौलिक अधिकारों के दायरे को प्रतिबंधित या निरस्त करने का अधिकार देता है।

सेना अधिनियम 1950, नौसेना अधिनियम 1957 और वायु सेना अधिनियम 1950 को केवल इस अनुच्छेद के मद्देनज़र अधिनियमित किया गया है। ये अधिनियम भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, एक स्थान पर एकत्र होने की स्वतंत्रता और संघों और यूनियनों के गठन की स्वतंत्रता जैसे अधिकारों को प्रतिबंधित करते हैं।

भारत के संविधान में मानव अधिकारों को स्वीकार्यता देते हुए राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों के अंतर्गत लोक कल्याणकारी राज्य के निर्माण के दृष्टिकोण से तथा मौलिक अधिकारों के रूप में प्रतिष्ठापूर्ण और गरिमामयी माहौल में जीवन जीने का अधिकार प्रदान करने की गारंटी दी गई है। इसका उल्लंघन करने पर सज़ा का भी प्रावधान किया गया है।

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