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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विविधीकरण

  • 31 May 2023
  • 23 min read

यह एडिटोरियल 29/05/2023 को ‘हिंदू बिजनेस लाइन’ में प्रकाशित ‘‘India’s rural economy diversifying?’’ लेख पर आधारित है। इसमें उस आँकड़े के बारे में चर्चा की गई है जो दर्शाता है कि कृषि से परे अवसरों की कमी के कारण ग्रामीण रोज़गार विविधीकरण व्युत्क्रमित हो सकता है।

प्रिलिम्स के लिये:

NFHS-5, महिला LFPR, दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM), महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGS), दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना (DDU-GKY), NRHM (आशा), आंगनवाड़ी (PM- पोषण), बैंकिंग पत्राचार (BC-सखी), श्यामा प्रसाद मुखर्जी रुर्बन मिशन

मेन्स के लिये:

वैतनिक और अवैतनिक कार्यों में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रोज़गार का विविधीकरण, ग्रामीण क्षेत्र में रोज़गार के अवसरों की खाई को पाटने की आवश्यकता है।

भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रोज़गार विविधीकरण की धीमी गति ने एक अस्थिर और अव्यवहार्य स्थिति उत्पन्न कर दी है जहाँ कृषि क्षेत्र में कामगारों की बड़ी संख्या संलग्न बनी हुई है, जबकि कृषि क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद में अपनी हिस्सेदारी के संबंध में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज कर रहा है।

अपर्याप्त आर्थिक विविधीकरण—निम्न मूल्यवर्द्धित गतिविधियों से उच्च मूल्यवर्द्धित गतिविधियों तक, भारतीय विकास प्रक्षेपवक्र की प्रमुख विफलताओं में से एक रहा है।

ग्रामीण भारत में रोज़गार के आँकड़े क्या कहते हैं?

औद्योगिकीकरण की ओर कुछ देर से आगे बढ़ने वाले जापान, दक्षिण कोरिया और हाल ही में चीन जैसे सफल देशों के विपरीत भारत में अधिकांश कार्यबल निम्न-भुगतान वाली सेवाओं के साथ-साथ कृषि एवं अन्य प्राथमिक गतिविधि क्षेत्रों में निम्न-मूल्य वाले रोज़गार में फँसे रहे हैं।

  • पिछले दो दशकों में ग्रामीण रोज़गार विविधीकरण की स्थिति: यह पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिये घटती कार्य भागीदारी दरों के साथ संपन्न हुआ है। चार्ट 1 दर्शाता है कि कैसे ग्रामीण पुरुषों के लिये रोज़गार दर अत्यंत निम्न है और चार दशकों से आमतौर पर स्थिर या गतिहीन बनी हुई है।

  • महिलाओं के लिये रोज़गार:
    • अस्थिर प्रवृत्ति के साथ कम रोज़गार: ग्रामीण महिलाओं के लिये रोज़गार की दर महज 34 प्रतिशत के निम्न स्तर पर है, जो वर्ष 2017-18 में 17.5 प्रतिशत तक नीचे चली गई थी। वर्ष 2021-22 में मामूली सुधार के साथ यह लगभग 27 प्रतिशत के स्तर पर पहुँची, तो भी चार दशक पहले की दर की तुलना में पर्याप्त कम थी।
      • महिलाओं के चिह्नित रोज़गार में यह भारी गिरावट वर्ष 2011-12 से 2017-18 की अवधि में कुल रोज़गार में चरम गिरावट के लिये ज़िम्मेदार थी।
        • चार्ट 4 कुल ग्रामीण महिला आबादी के अनुपात के रूप में कृषि में कार्यरत महिलाओं की हिस्सेदारी को दर्शाता है। पिछले दशकों में इसमें लगातार गिरावट आई, जो वर्ष 2017-18 में महज 12.8 प्रतिशत के स्तर पर थी। वर्ष 2021-22 में इसमें कुछ सुधार आया और यह 20.2 प्रतिशत के स्तर पर पहुँची, लेकिन यह वृद्धि एक संकटपूर्ण प्रगति अधिक प्रतीत होती है क्योंकि फिर भी पहले के दशकों के स्तर से यह पर्याप्त नीचे है।

  • गैर-मान्यता प्राप्त महिला श्रम: महिला कार्य भागीदारी दर सभी कार्यों को इंगित नहीं करती है, बल्कि यह स्वरोज़गार सहित केवल चिह्नित या मान्यता प्राप्त रोज़गार को ही प्रकट करती है। इसमें घरेलू उपभोग और उत्तरजीविता सुनिश्चित करने वाली गतिविधियों में महिलाओं द्वारा मुख्यतः अवैतनिक रूप में किये जाते कार्य की एक बड़ी मात्रा शामिल नहीं है।
    • अवैतनिक कार्य में केवल घरों में किया जाने वाला अवैतनिक देखभाल कार्य शामिल नहीं है, बल्कि जल एवं ईंधन की लकड़ी लाने, रसोई के लिये सब्जी उगाने, मुर्गी पालन करने जैसी कई अन्य आवश्यक गतिविधियाँ भी शामिल हैं।
  • महिलाएँ, न केवल अवैतनिक कामगारों बल्कि अवैतनिक सहायकों के रूप में: मान्यता प्राप्त महिला कामगारों के एक बड़े भाग को (ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग एक-तिहाई तक) ‘पारिवारिक उद्यमों (विशेष रूप से खेतों में) में अवैतनिक सहायक’ के रूप में वर्णित किया जाता है।

पुरुष कामगारों के लिये रोज़गार संरचना:

  • कृषि में रोज़गार: पुरुष कामगारों के लिये रोज़गार संरचना में परिवर्तन आए हैं। चार्ट 2 ग्रामीण पुरुष कामगारों के लिये रोज़गार में क्षेत्रीय परिवर्तनों की एक झलक प्रदान करता है। कृषि की हिस्सेदारी वर्ष 1983 में 77.5 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2021-22 में 51 प्रतिशत रह गई है।

  • निर्माण क्षेत्र में रोज़गार: कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी में गिरावट के आधे भाग से अधिक के लिये एक प्रमुख नियोक्ता के रूप में निर्माण क्षेत्र (Construction sector) के उदय को उत्तरदायी माना जाता है जो वर्ष 2021-22 में ग्रामीण पुरुष रोज़गार का 16.6 प्रतिशत प्रदान कर रहा था।
    • विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing sector) की हिस्सेदारी में मामूली परिवर्तन ही आया है जो 7-8 प्रतिशत पर बना रहा है। यह ग्रामीण औद्योगीकरण में किसी भी सार्थक प्रगति की विफलता का संकेत देता है।
  • सेवा क्षेत्र में रोज़गार: ट्रेड होटल एवं रेस्तरां ने पुरुष रोज़गार में अपनी हिस्सेदारी को दोगुने से अधिक कर लिया है और परिवहन सेवाओं में भी वृद्धि हुई है, लेकिन इनका एक बड़ा भाग अपेक्षाकृत निम्न भुगतान वाली गतिविधियाँ ही बनी रही हैं।

महिला कामगारों के लिये रोज़गार संरचना:

  • महिला रोज़गार में अत्यंत सीमित विविधता: ग्रामीण महिलाओं के लिये रोज़गार का विविधीकरण बहुत कम स्पष्ट देखा गया।
    • कृषि क्षेत्र में रोज़गार: कृषि की हिस्सेदारी में गिरावट आई, लेकिन यह गिरावट महज वर्ष 1983 में 87.5 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2017-18 में 73.2 प्रतिशत के रूप में दर्ज हुई और वर्ष 2021-22 में 75.9% के साथ इसमें पुनः वृद्धि दर्ज की गई।
      • अधिकांश महिलाओं ने स्वयं को पारिवारिक कृषि भूमियों में अवैतनिक सहायक के रूप में स्वरोज़गार कार्य में संलग्न क्योंकि मज़दूरी रोज़गार (चाहे नियमित या अनियत) के ‘शरण’ क्षेत्र (refuge sector) होने की संभावना कम होती है।
  • विनिर्माण क्षेत्र में रोज़गार: विनिर्माण रोज़गार ने वर्ष 1983 में 6.4 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं को कार्य दिया था जो वर्ष 2011-12 में बढ़कर 9.8 प्रतिशत हो गया। वर्ष 2021-22 में ग्रामीण महिला मान्यता प्राप्त कामगारों की महज 7.9% हिस्सेदारी के साथ इसमें पुनः गिरावट दर्ज की गई।
  • निर्माण क्षेत्र में रोज़गार: निर्माण क्षेत्र के रोज़गार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई लेकिन अभी भी यह ग्रामीण महिला रोज़गार के केवल 5.3% भाग का निर्माण करता है।
  • सेवा क्षेत्र में रोज़गार: अन्य सेवाओं, मुख्य रूप से सामुदायिक एवं व्यक्तिगत सेवाओं में भी पर्याप्त वृद्धि देखी गई (वर्ष 1983 में 2.8 प्रतिशत से वर्ष 2017-18 में 8.9 प्रतिशत), लेकिन हाल की अवधि के लिये इसमें पुनः 6.8 प्रतिशत तक गिरावट आई।
  • महिलाओं के रोज़गार में कृषि की हिस्सेदारी में हाल का ‘पुनरुद्धार’ (revival) व्यवहार्य रोज़गार अवसरों के मामले में अन्य गतिविधियों की गिरावट को दर्शाता है।

  • NFHS-5 के अनुसार महिला रोज़गार: 15-49 आयु वर्ग के लगभग 75% किशोर और पुरुष वर्तमान में कार्यरत हैं, जबकि समान आयु वर्ग की केवल 25% किशोरियाँ एवं महिलाओं के पास रोज़गार है।
    • 15-49 कामकाजी आयु वर्ग में लगभग 32% महिलाएँ कार्यरत हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि 15% कामकाजी महिलाओं को उनके कार्य के लिये भुगतान नहीं किया जाता है।

ग्रामीण क्षेत्र में विविधता की कमी के क्या कारण हैं?

  • कृषि-केंद्रित अर्थव्यवस्था: ग्रामीण अर्थव्यवस्था कृषि पर अत्यधिक निर्भर है (जहाँ 50 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है)। कृषि क्षेत्र अप्रत्याशित मानसून पर निर्भर है और सूखे एवं बाढ़ के लिये प्रवण है। इससे किसानों और कृषि श्रमिकों के लिये निम्न एवं अनिश्चित आय की स्थिति बनती है।
    • लघु जोत, आधुनिक तकनीकों की कमी और अपर्याप्त अवसंरचना जैसे कारकों के कारण किसानों को प्रायः निम्न उत्पादकता और आय अस्थिरता का सामना करना पड़ता है।
  • गैर-कृषि रोज़गार अवसरों की कमी: ऋण, बीमा एवं बचत जैसे वित्तीय संसाधनों तक पहुँच का अभाव ग्रामीण लोगों की उत्पादक गतिविधियों में निवेश करने, आघातों से निपटने और अपनी आजीविका में विविधता लाने की क्षमता को सीमित करता है।

उद्योग और व्यवसाय शहरी क्षेत्रों में केंद्रित होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों में विविधतापूर्ण आर्थिक गतिविधियों की कमी होती है।

अपर्याप्त अवसंरचना: सड़क, बिजली, सिंचाई, दूरसंचार, आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे पर्याप्त अवसंरचना का अभाव गैर-कृषि क्षेत्रों के विकास में बाधा डालता है और बाज़ारों, सेवाओं एवं अवसरों तक पहुँच को सीमित करता है।

शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण तक सीमित पहुँच: ग्रामीण लोगों के बीच शिक्षा और कौशल का निम्न स्तर श्रम बाज़ार में उनकी रोज़गार-योग्यता एवं गतिशीलता को सीमित करता है। कई ग्रामीण बच्चे निर्धनता, स्वच्छता सुविधाओं की कमी, अल्पायु विवाह या घरेलू कार्य के कारण स्कूल छोड़ देते हैं।

शैक्षिक और व्यावसायिक अवसरों की कमी नए आर्थिक क्षेत्रों के विकास में बाधा उत्पन्न करती है।

  • सामाजिक और सांस्कृतिक कारक: जाति, लिंग, धर्म या जातीयता पर आधारित सामाजिक असमानताएँ भी ग्रामीण लोगों के आर्थिक अवसरों और परिणामों को प्रभावित करती हैं। महिलाओं, अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों, अल्पसंख्यकों और अन्य वंचित समूहों को भेदभाव, अपवर्जन एवं हिंसा का सामना करना पड़ता है जो उनकी आर्थिक क्षमता को सीमित करता है।
  • ऋण और वित्तीय सेवाओं तक सीमित पहुँच: ग्रामीण समुदायों को प्रायः ऋण (क्रेडिट) और वित्तीय सेवाओं तक पहुँच में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इससे उद्यमियों और लघु व्यवसायों के लिये अपना परिचालन शुरू करना या उसका विस्तार करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। वित्तीय सहायता की कमी विविधतापूर्ण आर्थिक गतिविधियों के विकास को बाधित करती है।

ग्रामीण भारत में रोज़गार विविधता लाने के लिये कौन-से कदम उठाये गए हैं?

  • दीनदयाल अन्त्योदय योजना - राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवारों को लाभकारी स्वरोज़गार और कुशल मजदूरी रोज़गार अवसरों तक पहुँच बनाने में सक्षम करना है, जिसके परिणामस्वरूप उनके लिये संवहनीय और विविधतापूर्ण आजीविका विकल्प उपलब्ध होते हैं। मिशन की आधारशिला है इसका ‘समुदाय-संचालित’ दृष्टिकोण, जिसने महिला सशक्तीकरण के लिये सामुदायिक संस्थानों के रूप में एक वृहत मंच प्रदान किया है।
    • मिशन ने गरीब और कमज़ोर समुदायों की कुल 8.7 करोड़ महिलाओं को 81 लाख स्व-सहायता समूहों (SHGs) में सक्रिय किया है।
  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा/MGNREGS): यह योजना महिलाओं को सुरक्षित रोज़गार के साथ अकुशल कार्यबल को गारंटीकृत रोज़गार प्रदान करने के लिये है।
    • योजना के तहत किये गए कार्यों का कृषि उत्पादकता, उत्पादन-संबंधी व्यय और प्रति परिवार आय पर महत्त्वपूर्ण सकारात्मक प्रभाव देखा गया है; साथ ही प्रवास के साथ नकारात्मक संबंध और ऋणग्रस्तता (विशेष रूप से गैर-संस्थागत स्रोतों से) में कमी आई है।
  • दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY): यह योजना अकुशल युवाओं को विभिन्न गैर-कृषि क्षेत्रों में रोज़गार हेतु कौशल प्रदान करती है।
  • महिला सशक्तीकरण: ग्रामीण क्षेत्रों में NRHM (ASHA), आंगनवाड़ी (PM-POSHAN), बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंस-सखी (BC-Sakhi) जैसे विभिन्न गैर-कृषि क्षेत्रों में रोज़गार देकर महिला सशक्तीकरण। 
  • ग्रामीण अवसंरचना: प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 7,23,893 किमी लंबी ग्रामीण सड़कों का निर्माण किया गया है।
  • श्यामा प्रसाद मुखर्जी रुर्बन मिशन (Shyama Prasad Mukherji Rurban Mission): यह योजना ग्रामों के ऐसे संकुल को विकसित करने के लिये शुरू की गई है जो समता एवं समावेशिता पर ध्यान केंद्रित रखते हुए ग्रामीण सामुदायिक जीवन के सार को संरक्षित एवं संपोषित करते हैं, जबकि ऐसी सुविधाओं के साथ कोई समझौता नहीं करते जो अनिवार्य रूप से शहरी प्रकृति की मानी जाती हैं; इस प्रकार शहरी ग्रामों के एक संकुल का सृजन करते हैं।

आगे की राह 

विद्यमान चुनौतियों से निपटने के लिये एक बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें आधारभूत संरचना, शिक्षा एवं कौशल विकास में निवेश करना, ऋण एवं वित्तीय सेवाओं तक पहुँच बढ़ाना और ग्रामीण क्षेत्रों में विविधीकरण एवं समावेशी विकास को बढ़ावा देने वाली नीतियों का कार्यान्वयन करना शामिल है।

  • अवसंरचना विकास: व्यवसायों और निवेश को आकर्षित करने के लिये ग्रामीण क्षेत्रों में परिवहन, संचार एवं अन्य अवसंरचना में सुधार करना।
  • उद्यमिता को समर्थन: प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम (Prime Ministers Employment Generation Programme- PM-EGP) जैसी योजनाओं का बेहतर कार्यान्वयन सुनिश्चित कर उद्यमिता को प्रोत्साहित करें और ग्रामीण उद्यमियों को सहायता प्रदान करें।
  • उद्योग विविधीकरण: एकल क्षेत्र (कृषि) पर निर्भरता कम करने के लिये ग्रामीण क्षेत्रों में विविध उद्योगों (जैसे खाद्य प्रसंस्करण, पारंपरिक सामान और सेवाएँ, ग्रामीण पर्यटन, आदि) के विकास को बढ़ावा देना। इसमें ऐसे क्षेत्रों की पहचान करना और उनका संपोषण करना शामिल हो सकता है जिनमें विकास की क्षमता है और जो स्थानीय संसाधनों के साथ संरेखित हैं, जैसे कृषि, पर्यटन, नवीकरणीय ऊर्जा, विनिर्माण या प्रौद्योगिकी।
  • कौशल विकास और शिक्षा: शहरी उद्योगों में व्यावसायिक प्रशिक्षण एवं इंटर्नशिप के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल विकास कार्यक्रमों तक पहुँच बढ़ाना।
  • दूरस्थ कार्य और टेलीकम्यूटिंग के लिये सहायता देना: ऐसी अवसंरचना और संसाधनों में निवेश किया जाए जो ग्रामीण क्षेत्रों में दूरस्थ कार्य एवं टेलीकम्यूटिंग के अवसरों को सक्षम बनाए। इसमें इंटरनेट कनेक्टिविटी में सुधार लाना, को-वर्किंग स्पेस स्थापित करना और स्थानीय व्यवसायों के साथ टेलीकम्यूटिंग पहल को बढ़ावा देना शामिल हो सकता है।
  • क्षेत्रीय सहयोग और भागीदारी: ग्रामीण क्षेत्रों, सरकारी एजेंसियों, निजी क्षेत्र के संगठनों एवं गैर-लाभकारी संस्थाओं के बीच संसाधनों को जुटाने, ज्ञान साझा करने और निवेश को आकर्षित करने के लिये सहयोग एवं सहकार्यता को प्रोत्साहित करें जो निवेश आकर्षित करने और रोज़गार अवसरों का सृजन करने पर लक्षित हों।
  • सामुदायिक संलग्नता और भागीदारी: ग्रामीण विकास से संबंधित योजना-निर्माण और निर्णयन प्रक्रियाओं में सामुदायिक संलग्नता एवं भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है कि कार्यान्वित पहल स्थानीय निवासियों की आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं को परिलक्षित करती है और उनमें विकास प्रक्रिया के प्रति स्वामित्व की एक भावना उत्पन्न करती है।
  • महिलाओं के अवैतनिक कार्य को मान्यता देना: यदि इस तरह के अवैतनिक कार्य को मान्यता दी जाए तो भारत में 85 प्रतिशत से अधिक महिलाएँ ‘आर्थिक’ गतिविधि में सक्रिय रूप से संलग्न हैं।
    • अवैतनिक कार्य की मान्यता कामगारों को विकल्प प्रदान करेगी और बाज़ार में मांग एवं आपूर्ति के अनुरूप तथा रुचि एवं क्षमताओं के अनुसार (न कि विवशता के रूप में) कार्य करने की इच्छा पैदा करेगी। यह आगे महिलाओं के बीच कार्यबल के अधिक औपचारीकरण और राष्ट्र निर्माण में उनके आर्थिक योगदान को सुगम बनाएगी।

अभ्यास प्रश्न: भारतीय कृषि नारीकरण से लेकर रोज़गार विविधता की कमी तक,विविध समस्याओं का सामना कर रही है। उपर्युक्त कथन के संदर्भ में भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में व्याप्त बाधाओं की चर्चा करते हुए सुधारात्मक उपायों को सुझाइये।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न(PYQ)  

मुख्य परीक्षा 

प्रश्न. ऐसे विभिन्न आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक बलों पर चर्चा कीजिये, जो भारत में कृषि के बढ़ते हुए महिलाकरण को प्रेरित कर रहे हैं। (2014)

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