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Covid-19 और व्यवहार विज्ञान

  • 11 May 2021
  • 9 min read

यह लेख 09/05/2021 को Livemint में प्रकाशित “Time has come to bring in necessary reforms in our social behaviour” पर आधारित है। इसमें कोविड-19 महामारी से निपटने के लिये सामाजिक और व्यवहार विज्ञान के उपयोग के संबंध में चर्चा की गई है ।

वर्तमान में यह सामान्य सी बात है कि लोगों की बड़ी सभाएँ खतरनाक कोरोनावायरस के अधिक-प्रसारकर्त्ता के रूप में कार्य कर सकती हैं। इसके बावजूद धार्मिक और राजनीतिक कारकों के कारण हाल के दिनों में कई सामूहिक आयोजन हुए हैं।

उदाहरण के लिये, गुजरात के साणंद के नवापुरा गाँव में जलाभिषेक करने हेतु कलश यात्रा के लिये महिलाओं के फुटेज प्राप्त हुए हैं। इसके अलावा पुलिस संरक्षण में हरिद्वार में महाकुंभ का आयोजन किया गया, जहाँ लाखों लोग गंगा नदी में पवित्र डुबकी लगाते हैं।

इस संदर्भ में कोविड -19 संकट से निपटने के लिये बड़े पैमाने पर व्यवहार परिवर्तन की आवश्यकता है जो व्यक्तियों पर महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाल सकते हैं।

इसलिये, स्वास्थ्य प्रणाली को उन्नत करने के अलावा समय आ गया है जब हमें अपने सामाजिक व्यवहार में आवश्यक सुधारों के बारे में सोचने की आवश्यकता है।

महामारी के व्यवहारपरक आयाम:

  • खतरा: इस महामारी के दौरान मुख्य भावनात्मक प्रतिक्रियाओं में से एक है ‘भय’। मनुष्य, अन्य जानवरों की तरह पारिस्थितिक खतरों का मुकाबला करने के लिये रक्षात्मक प्रणालियों से युक्त है।
    • खतरे से उत्पन्न नकारात्मक भावनाएँ संक्रामक हो सकती हैं और भय को अधिक बढ़ा सकती हैं।
  • आशावादी पूर्वाग्रह (Optimism Bias): जनता में एक आम धारणा है कि बुरी चीजें द्वारा दूसरों की तुलना में स्वयं को प्रभावित करने की संभावना कम है।
    • हालाँकि आशावादी पूर्वाग्रह नकारात्मक भावनाओं से बचने के लिये उपयोगी हो सकता है, यह लोगों को किसी रोग के संक्रमण की संभावना के प्रति उदासीनता को बढ़ा सकता है और सार्वजनिक स्वास्थ्य चेतावनियों को नजरअंदाज़ करने के लिये प्रेरित कर सकता है।
  • पूर्वाग्रह और भेदभाव: भय और खतरे के अनुभव न केवल लोगों को अपने बारे में सोचने के लिये मज़बूर करते है, बल्कि वे दूसरों के बारे में (विशेष रूप से, बाहर के समूहों में) कैसा महसूस करते हैं और प्रतिक्रिया करते हैं, इस संबंध में भी उत्तरदायी बनाते हैं।
    • उदाहरण के लिये, किसी रोग से संक्रमित होने का खतरा प्रायः जातीयता के उच्च स्तर और बाहरी समूहों के प्रति अधिक असहिष्णुता से जुड़ा होता है।
    • यह उन लोगों के साथ सहानुभूति को कम कर सकता है जो सामाजिक रूप से दूर हैं और अमानवीयकरण को बढ़ाते हैं।
  • आपदा और 'आतंक': लोकप्रिय संस्कृति में एक आम धारणा है कि, जब संकट आता है, विशेषकर जनसमुदाय में, तो लोग घबराते हैं।
    • इसलिये ही वे अंधवत् रूप से और आत्म-संरक्षण से बाहर होकर कार्य करते हैं और संभवतः सभी के अस्तित्व को खतरे में डालते हैं।
    • इस विचार का उपयोग वर्तमान कोविड-19 के प्रकोप की प्रतिक्रियाओं को समझाने के लिये किया गया है, जो आमतौर पर संकट उत्पन्न (Panic Buying) करने की धारणा  से संबंधित होता है।
  • सामजिक मानक: लोगों का व्यवहार सामाजिक मानदंडों से प्रभावित होता है।
  • सामाजिक असमानता: संसाधनों तक पहुँच में असमानता न केवल उन लोगों को प्रभावित करती है जिन्हें संक्रमण का ज्यादा खतरा है या जिनमें इसके लक्षण विकसित हो रहे हैं या इसका शिकार हो सकते हैं, बल्कि यह उन लोगों को भी प्रभावित कर सकती है जो संक्रमण के प्रसार को धीमा करने के लिये दिशा-निर्देशों को अपनाने में सक्षम हैं।
  • फेक न्यूज़ और गलत सूचना: कोविड-19 के संबंध में फेक न्यूज़ और गलत सूचना संभावित खतरनाक परिणामों के साथ, सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से फैल रही है।

आगे की राह:

महामारी के दौरान वायरल संचरण धीमा करने के लिये व्यवहार में महत्त्वपूर्ण बदलाव की आवश्यकता होती है। इस संदर्भ में:

  • सार्वजनिक संदेश (Public Messages): इस तरह की गलत धारणाओं को सुधारकर व्यवहार में बदलाव को सार्वजनिक संदेशों द्वारा सकारात्मक (उदाहरण के लिये, स्वास्थ्य-संवर्द्धन) मानदंडों को प्राप्त किया जा सकता है।
    • इसके अलावा, संचार रणनीतियों को चिंता और भय जैसी भावनाओं को प्रेरित किये बिना आशावादी पूर्वाग्रह के माध्यम से तोड़ने के बीच एक संतुलन बनाना चाहिये।
  • नज थ्योरी (Nudge Theory): इस सिद्धांत के अनुसार, व्यक्ति को अपने व्यवहार में ज़रूरी सकारात्मक परिवर्तन करने के लिये प्रेरित किया जाता है। साथ ही व्यक्ति के चुनने के अधिकार को भी सुरक्षित रखा जाता है।
    • उदाहरण के लिये, सामाजिक मानदंडों को मज़बूरन लागू करने वाला एक संदेश जैसे- 'आपके समुदाय के अधिकांश लोगों का मानना है कि हर किसी को घर पर रहना चाहिये।'
  • फेक न्यूज़ से निपटना (Fighting Fake News): गलत सूचना से निपटने के लिये एक निवारक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है जिसमें सूक्ष्म संकेत शामिल होते हैं जो लोगों को सटीकता पर विचार करने के लिये प्रेरित करते हैं।
    • उदाहरण के लिये, समय-समय पर उपयोगकर्ताओं को यादृच्छिक रूप से चयनित पदों की सटीकता का आकलन करने के लिये प्रोत्साहित करना।
    • इस प्रक्रिया से प्राप्त आँकड़े गलत सूचना की पहचान के लिये उपयोगी हो सकते हैं।
  • अनुनय (Persuasion): कई संदेशात्मक दृष्टिकोण प्रभावी हो सकते हैं, जिसमें प्राप्तकर्त्ता को लाभ पर ज़ोर देना, दूसरों की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करना शामिल है। उदाहरण के लिये अपने माता-पिता और दादा-दादी की सुरक्षा के लिये अपने हाथ धोएं।
    • इसके अलावा, प्राप्तकर्ता के नैतिक मूल्यों के साथ संचार करने, सामाजिक सहमति या वैज्ञानिक मानदंडों की अपील करने में मदद मिल सकती है।
  • नेतृत्त्व (Leadership): कोविड-19 जैसी महामारी विभिन्न स्तरों (परिवार, कार्यस्थल, स्थानीय समुदाय और राष्ट्र) के समूहों में नेतृत्त्व के लिये एक अवसर पैदा करती हैं।
    • नेतृत्व, लोगों को समन्वित कर सकता है और ऐसे व्यवहारों से बचने में मदद कर सकता है जिन्हें अब सामाजिक तौर पर उत्तरदायी नहीं माना जाता है।

निष्कर्ष

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक हालिया रिपोर्ट ने घोषणा की कि स्वास्थ्य संचार की स्वास्थ्य और कल्याण के लगभग हर पहलू के लिये प्रासंगिकता दिखाई देती है, जिसमें रोग की रोकथाम, स्वास्थ्य संवर्द्धन और जीवन की गुणवत्ता शामिल है।

COVID-19 के संभावित विनाशकारी प्रभावों को कम करने के लिये तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है, जो क्रिया व्यवहार और सामाजिक विज्ञान द्वारा समर्थित हो सकती है।

अभ्यास प्रश्न: महामारी से निपटने के लिये, स्वास्थ्य प्रणाली को उन्नत करने के अलावा, अब समय आ गया है जब हमें अपने सामाजिक व्यवहार में आवश्यक सुधारों के बारे में सोचना चाहिये। टिप्पणी कीजिये।

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