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सामाजिक न्याय

कैदियों पर प्रत्यावर्तन अधिनियम (Prison Reform Act), 2003

  • 14 Jul 2018
  • 7 min read

संदर्भ

ऐसे कई मामले हैं जब एक देश के अपराधियों ने अन्य देशों की जेलों में समय काटा है। उदाहरण के लिये भारतीयों ने ब्रिटेन, पाकिस्तान या सऊदी अरब की जेलों में समय बिताया है इसके विपरीत बांग्लादेश, नेपाल या श्रीलंका जैसे देशों के कैदियों ने भी भारतीय जेलों में समय काटा है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसे अपराधियों को अपने देश से दूर होने के कारण 'मानव' नहीं माना जाता है, खासकर जब उन्हें मामूली अपराध में सज़ा सुनाई जाती है।

प्रमुख बिंदु

  • नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध अनुच्छेद 12(4) के तहत कहा गया है कि एक व्यक्ति को उसके अपने देश लौटने का अधिकार है। अपने देश की अपेक्षा अन्य देश में सज़ा काटना कठिन माना गया है।
  • वर्ष 1963 के कॉन्सुलर रिलेशंस पर वियना सम्मेलन के तहत दूसरे देश में गिरफ्तारी, हिरासत और परीक्षण पर कॉन्सुलर संरक्षण का प्रावधान है।
  • विदेशी कैदियों के स्थानांतरण पर संयुक्त राष्ट्र मॉडल समझौता और 1985 के विदेशी कैदियों के उपचार की सिफारिशों के माध्यम से 'विदेशी कैदियों के सामाजिक पुनर्वास' पर उनके घरेलू देशों के प्रारंभिक प्रत्यावर्तन के माध्यम से ज़ोर दिया गया है।
  • सज़ायाफ्ता कैदियों के हस्तांतरण से संबंधित क़ानून युद्ध के बाद मानवतावादी विनिमय (‘पीओयू-युद्ध के कैदी’) में निहित है और वर्ष 2004 के दो संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन अंतर्राष्ट्रीय संगठित अपराध और भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून में निहित है।
  • राज्य कैदियों का आदान-प्रदान करने के लिये द्विपक्षीय या बहुपक्षीय समझौतें करने के लिये स्वतंत्र हैं। यहाँ यह सिद्धांत शामिल है कि 'विदेश में किया गया अपराध स्वयं के देश में भी एक अपराध ही है' बशर्ते कि कैदियों के हस्तांतरण की बातों को उत्तेजित/भड़काया न जाए (जिसमें भारी वृद्धि हुई है)।

भारत में स्थिति 

  • कैदियों प्रत्यावर्तन अधिनियम, 2003 में दो भाग शामिल हैं, जहाँ पहला हिस्सा भारतीय जेलों से अपने संबंधित मूल के देशों में विदेशी कैदियों के हस्तांतरण से संबंधित है, जबकि दूसरा हिस्सा अपने देश में किसी भी विदेशी देश से सज़ायाफ्ता भारतीय नागरिकों को लाने से  संबंधित है।
  • लगभग सभी प्रकार के कैदी प्रत्यावर्तन के योग्य हैं, बशर्ते कि वे इन शर्तों को पूरा करें:
  • वे वापस आने के इच्छुक हो;
  • उन पर किसी भी अदालत में कोई लंबित अपील न हो;
  • अपराध सैन्य कानून के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता हो;
  • मृत्युदंड न दिया गया हो;
  • उन्हें सुनाई गई सज़ा में से कम-से-कम 6 महीने की सज़ा शेष हो;
  • प्रत्यावर्तन के मामले में दोनों देशों की सहमति हो; 

कैदियों के प्रत्यावर्तन से संबंधित अधिनियम भारत के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है:

  • विदेश मंत्रालय के अनुसार मार्च 2018 तक कम-से-कम 7,850 भारतीय नागरिक 78 देशों की जेलों में कैद थे।
  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, वर्ष 2015 में भारतीय जेलों में 6,185 विदेशी नागरिक थे; उनमें से 66% अकेले बांग्लादेश से थे।
  • भारतीयों को सबसे अधिक सज़ा देने वाले देशों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश, चीन, फ्राँस, जर्मनी, इंडोनेशिया,म्याँमार और थाईलैंड शामिल हैं।
  • भारत ने प्रत्यावर्तन से संबंधित 30 द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं तथा विदेश में किये गए अपराधों पर अंतर-अमेरिकी सम्मेलन (the Inter-American Convention on Serving Criminal Sentences Abroad) और सज़ायाफ्ता व्यक्तियों के स्थानांतरण पर यूरोप परिषद के सम्मेलन (Council of Europe’s Convention on the Transfer of Sentenced Persons) के साथ स्थानांतरण समझौता भी किया है।
  • बाद वाले दोनों समझौते कम-से-कम 50 अन्य देशों को भारत के साथ एक सहकारी कानूनी ढाँचे के अंतर्गत लाते हैं।

निष्कर्ष

प्रत्यावर्तन के लिये किये गए विभिन्न प्रयासों और समझौतों के बावजूद वास्तविकता बहुत अधिक भरोसेमंद नहीं है। वर्ष 2015 में भारत से केवल 9 विदेशी कैदियों (6 यूनाइटेड किंगडम से, फ्राँस, ज़र्मनी तथा संयुक्त अरब अमीरात से एक-एक)को वापिस उनके देश में भेजा गया था। इसके अलावा 2003 से मार्च 2018 के बीच भारतीय नागरिकों को स्थानांतरित करने के लिये किये गए 171 आवेदनों में से केवल 63 को स्वीकार किया गया है।

कैदियों का प्रत्यावर्तन अधिनियम भारत के लिये दोनों तरफ से फायदेमंद स्थिति है इसके दो कारण हैं :

  • भारत को विदेशी कैदियों के आवास पर अनावश्यक खर्च करने की ज़रूरत नहीं है।
  • भारतीय कैदियों को अपने देश वापस लाकर भारत विदेशों में स्थित अपने दूतावास संबंधी सेवाओं क्व मामले में काफी बचत कर सकता है।
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