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डेली अपडेट्स

सामाजिक न्याय

भोजन का अधिकार : उपलब्धता, सुलभता लेकिन स्थिरता नहीं

  • 09 Jun 2018
  • 20 min read

संदर्भ

भोजन का अधिकार अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून (International Human Rights) द्वारा स्थापित सिद्धांत है। यह सदस्य राज्य के लिये खाद्य सुरक्षा के अधिकार के सम्मान, संरक्षण और पूर्ति हेतु दायित्व का निर्धारण करता है। खाद्य सुरक्षा के सामान्य सिद्धांत के अंतर्गत चार प्रमुख आयामों यथा - पहुँच, उपलब्धता, उपयोग और स्थिरता को शामिल किया जाता है। सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणापत्र (Universal Declaration of Human Rights) और आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध (International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights) के सदस्य के रूप में भारत पर भूख से मुक्त होने और पर्याप्त भोजन के अधिकार को सुनिश्चित करने का दायित्व है।

अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून

10 दिसंबर, 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ की समान्य सभा द्वारा मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकृत और घोषित किया गया। इस घोषणा से राष्ट्रों को मानवाधिकारों के संबंध में न केवल प्रेरणा और मार्गदर्शन प्राप्त हुआ, बल्कि वे इन अधिकारों को अपने संविधान या अधिनियमों के द्वारा मान्यता देने तथा क्रियान्वित करने के लिये भी अग्रसर हुए। 

  • संयुक्त राष्ट्र के अनुच्छेद 25 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे जीवन स्तर को प्राप्त करने का अधिकार है जो उसे और उसके परिवार के स्वास्थ्य एवं कल्याण के लिये पर्याप्त हो।
  • इसके अंतर्गत खाना, कपड़ा, मकान, चिकित्सा-संबंधी सुविधाएँ और आवश्यक सामाजिक सेवाओं को शामिल किया गया है।
  • सभी को बेकारी, बीमारी, असमर्थता, वैधव्य, बुढ़ापे या अन्य ऐसी किसी परिस्थिति में आजीविका का साधन न होने पर जो उसके काबू के बाहर हो, सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है।
  • इसके अनुसार, जच्चा और बच्चा को खास सहायता एवं सुविधा प्राप्त करने का अधिकार है। प्रत्येक बच्चे को चाहे वह विवाहित माता से जन्मा हो या अविवाहित से, समान सामाजिक संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार है।

उपलब्धता से पहुँच तक

  • भारत में खाद्य सुरक्षा के मुद्दे को दो पीढ़ियों में विभाजित किया जा सकता है। इस संबंध में किया गया सीमांकन सटीकता से बहुत दूर है, जो इस बात को इंगित करता है कि किस प्रकार समय के साथ खाद्य सुरक्षा के विभिन्न तत्त्वों को दिये जाने वाले महत्त्व में परिवर्तन होता गया।
  • जैसा कि हम सभी जानते हैं कि स्वतंत्रता के बाद के वर्ष भारत के लिये बेहद अशांत रहे। जहाँ एक ओर बंगाल अकाल की यादें ताज़ा थी वहीं दूसरी ओर खाद्यान्न की कमी का डर निरंतर बना हुआ था। भूख को अपर्याप्त खाद्य उत्पादन का पर्याय माना जाता था।
  • यही कारण रहा कि वर्ष 1974 में विश्व खाद्य सम्मेलन (World Food Conference-WFC) द्वारा उत्पादन के संदर्भ में खाद्य सुरक्षा को परिभाषित किया गया। डब्लूएफसी के अनुसार, विश्व खाद्य आपूर्ति की हर समय पर्याप्त उपलब्धता ही खाद्य सुरक्षा होती है।
  • स्पष्ट रूप से इन सभी परिस्थितियों ने भारत को खाद्य उत्पादन की दर में बढ़ोत्तरी करने के लिये विवश किया। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये भारत ने हरित क्रांति को शुरू करने का दृढ़ संकल्प लिया। लेकिन इस निर्णय ने तब एक अजीब स्थिति को जन्म दिया, जब यह कार्यक्रम देश के कुछ हिस्सों में चावल और गेहूँ के उत्पादन में नाटकीय वृद्धि हासिल करने में सफल हो गया और इसके विनाशकारी पर्यावरणीय प्रभाव के चलते इसकी बहुत अधिक आलोचना की गई।
  • वर्तमान की खाद्य सुरक्षा की स्थितियों को समझने और उसके संदर्भ में कार्यवाही करने का आधार 1980 और 1990 के दशक की दो घटनाओं ने प्रदान किया। सर्वप्रथम, जब सुप्रीम कोर्ट ने नाटकीय रूप से उन अधिकारों के दायरे में विस्तार करने का निर्णय लिया जो नागरिक को राज्य के खिलाफ दावा करने में सक्षम बनाते हैं।
  • हालाँकि इसके अंतर्गत 'भोजन के अधिकार' को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया तथापि इसमें मानव गरिमा के अभिन्न अंग के रूप में मूल अधिकारों में भोजन का उल्लेख किया गया। दूसरी घटना, पहुँच की समस्या के स्थान पर अब उपलब्धता की समस्या मुख्य मुद्दा बनकर उभरी।

राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013

  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्‍यादेश एक ऐतिहासिक पहल है जिसके ज़रिये जनता को पोषण खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है। खाद्य सुरक्षा विधेयक का खास ज़ोर गरीब-से-गरीब व्‍यक्ति, महिलाओं और बच्‍चों की जरूरतें पूरी करने पर है।
  • इस विधेयक में शिकायत निवारण तंत्र की भी व्‍यवस्‍था है। अगर कोई जनसेवक या अधिकृत व्‍यक्ति इसका अनुपालन नहीं करता है तो उसके खिलाफ शिकायत कर सुनवाई का प्रवधान किया गया है। 
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत गरीबों को 2 रुपए प्रति किलो गेहूँ और 3 रुपए प्रति किलो चावल देने की व्यवस्था की गई है। इस कानून के तहत व्यवस्था है कि लाभार्थियों को उनके लिये निर्धारित खाद्यान्न हर हाल में मिले, इसके लिये खाद्यान्न की आपूर्ति न होने की स्थिति में खाद्य सुरक्षा भत्ते के भुगतान के नियम को जनवरी 2015 में लागू किया गया। 
  • समाज के अति निर्धन वर्ग के हर परिवार को हर महीने अंत्‍योदय अन्‍न योजना में इस कानून के तहत सब्सिडी दरों पर यानी तीन रुपए, दो रुपए, एक रुपए प्रति किलो क्रमशः चावल, गेहूँ और मोटा अनाज मिल रहा है।
  • पूरे देश में यह कानून लागू होने के बाद 81.34 करोड़ लोगों को 2 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से गेहूँ और 3 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से चावल दिया जा रहा है। 
  • 1980 और 1990 के दशक में खाद्य सुरक्षा का एक दूसरा पक्ष सामने आया जिसके अनुसार, खाद्य आपूर्ति में वृद्धि पर ध्यान दिये जाने के बाद भी भूख को कम करने में भारत सफल नहीं हो सका। इस संबंध में प्राप्त आँकड़ों के अनुसार भारत खाद्य घाटे वाले देश से एक खाद्य अधिशेष वाले देश के रूप में परिवर्तित हो गया है, लेकिन भूख की समस्या जस-की-तस बनी हुई है।
  • अमर्त्य सेन जैसे आर्थिक विशेषज्ञों द्वारा किये गए मौलिक शोधों से यह पता चला है कि भूख और खाद्य सुरक्षा मुख्य रूप से ‘पहुँच’ के मुद्दे से संबद्ध थे, अर्थात् पर्याप्त मात्रा में अनाज और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसे विभिन्न सरकारी प्रयासों के बावजूद लोग भुखमरी से मर रहे थे क्योंकि वे शारीरिक रूप से अथवा वित्तीय रूप से (या दोनों) इस भोजन तक पहुँचने में असमर्थ थे।
  • खाद्य सुरक्षा के इस दृष्टिकोण को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिबिंबित किया गया। वर्ष 1996 में आयोजित विश्व खाद्य शिखर सम्मेलन में भी इस मुद्दे पर प्रकाश डाला गया। सम्मेलन में स्पष्ट किया गया कि जब सभी लोगों की हर समय पर्याप्त, सुरक्षित एवं पौष्टिक भोजन तक शारीरिक और आर्थिक पहुँच सुनिश्चित होगी तभी खाद्य सुरक्षा की स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है।
  • वर्ष 2001 में एक मामला प्रकाश में आया जब पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज द्वारा दाखिल एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘भोजन के अधिकार’ के रूप में एक नए मौलिक अधिकार को प्रस्तुत करते हुए इसे संविधान के जीवन के अधिकार के साथ पढ़ा। 
  • इसके बाद कोर्ट द्वारा जारी आदेशों और निर्देशों के परिणामस्वरूप वर्ष 2013 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (National Food Security Act-NFSA) को प्रस्तुत किया गया, जिसके अंतर्गत सभी भारतीयों को मात्रात्मक "भोजन के अधिकार" की गारंटी प्रदान की गई।
  • यहाँ एक और बात पर गौर किये जाने की आवश्यकता है कि NFSA को उस रूप में पेश नहीं किया जा सका जिस रूप में इससे उपेक्षा की गई थी। इसके मसौदे में गंभीर खामियाँ व्याप्त थीं, जो भारत में भोजन के अधिकार को कानूनी रूप देने के अपने उद्देश्य को पूरा करने में कमज़ोर साबित हुईं।

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खाद्य सुरक्षा अधिनियम का आकलन एवं इसमें निहित समस्याएँ

  • आश्चर्यजनक रूप से एनएफएसए भोजन के सार्वभौमिक अधिकार की गारंटी नहीं देता है। इसके बजाए यह कुछ मानदंडों के आधार पर पहचाने गए लोगों के लिये भोजन के अधिकार को सीमित करता है।
  • साथ ही, इसके अंतर्गत यह भी निर्दिष्ट किया गया है कि यह अधिनियम "युद्ध, बाढ़, सूखा, आग, चक्रवात या भूकंप" की स्थिति में लागू नहीं होगा (विशेष रूप से, यह केंद्र सरकार के अनुमोदन के अंतर्गत आता है कि वह ऐसी किसी स्थिति के होने की घोषणा करे)।
  • यह देखते हुए कि उपरोक्त परिस्थितियों में भोजन का अधिकार सबसे अधिक मूल्यवान हो जाता है, यह संदिग्ध प्रतीत होता है कि यह अधिनियम उस अधिकार की गारंटी देने में प्रभावी है या नहीं।
  • एनएफएसए का एक और समस्याग्रस्त पहलू यह है कि इसके अंतर्गत कुछ ऐसे उद्देश्यों को शामिल किया गया है जिनके संबंध में प्रगतिशील रूप से कार्य किया जाना चाहिये। 
  • इन उद्देश्यों अथवा प्रावधानों में कृषि सुधार, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और विकेंद्रीकृत खरीद को शामिल किया गया है, लेकिन इन उद्देश्यों अथवा प्रावधानों में हमारी कृषि प्रणालियों के बारे में मौलिक धारणाओं पर पुनर्विचार करने और खाद्य सुरक्षा को अधिक व्यापक तरीके से देखने की आवश्यकता का कोई जिक्र नहीं किया गया है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली

  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सस्ता खाद्यान्न आम लोगों तक पहुँचाया जाता है, जो केंद्र और राज्य दोनों सरकारों की संयुक्त ज़िम्मेदारी है।
  • भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली खाद्यान्न वितरण के लिये विश्व में सबसे बड़ा नेटवर्क है।
  • केंद्र सरकार सस्ता खाद्यान्न उपलब्ध कराती है और उसका वितरण स्थानीय स्तर पर राज्य सरकारों द्वारा आवंटित उचित दर की दुकानों (राशन की दुकान) के द्वारा किया जाता है।

प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण 

  • मूल रूप से यह योजना उस धन का दुरुपयोग रोकने के लिये है, जिसे किसी भी सरकारी योजना के लाभार्थी तक पहुँचने से पहले ही बिचौलिये तथा अन्य भ्रष्टाचारी हड़पने की जुगत में रहते हैं।
  • प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण से जुड़ी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी बिचौलिये का कोई काम नहीं है और यह योजना सरकार एवं लाभार्थियों के बीच सीधे चलाई जा रही है।
  • इस योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार लाभार्थियों को विभिन्न योजनाओं के तहत सब्सिडी का भुगतान सीधे उनके बैंक खाते में कर देती है। लाभार्थियों को भुगतान उनके आधार कार्ड के ज़रिये भी किया जा रहा है।
  • यह तर्कसंगत है कि "प्रगतिशील प्राप्ति" का मुद्दा खाद्य सुरक्षा में सुधार को अवरुद्ध करता है। ऐसा इसलिये है क्योंकि इसके तहत वर्णित कुछ तत्त्व पहले से ही राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कानूनों और नीतियों में शामिल हैं।
  • उन्हें "प्रगतिशील प्राप्ति" के दायित्व के रूप में वर्णित करने से विपरीत परिणाम सामने आएंगे, इसके परिणामस्वरूप जहाँ एक ओर राज्य एनएफएसए में वर्णित आवश्यक कार्यवाहियों को करने से बचेंगे वहीं, दूसरी ओर जिस उद्देश्य के साथ इस अधिनियम को लाया गया है उसे प्राप्त करना और अधिक कठिन हो जाएगा।
  • विचारणीय पक्ष यह है कि एनएफएसए को यदि केवल नागरिकों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिये सरकारी प्रतिबद्धता के रूप में स्थापित किया जाता है तो यह अदालतों की कार्रवाई को सीमित कर सकता है।
  • ऐसे में अधिनियम के तहत नागरिक अधिकारों को किस सीमा तक विस्तृत किया जा सकता है यह चिंता का विषय है। हाल ही में स्वराज अभियान के मामलों में यह डर सामने आया जब भारत में लगातार सूखे की स्थिति से निपटने में सरकारी विफलताओं के प्रभाव स्पष्ट हुए।
  • हालाँकि एनएफएसए के प्रावधानों को लागू करने के लिये अदालत ने कार्यकारी को आदेश भी जारी किया, लेकिन नागरिकों को क्या दिया जाना चाहिये इस सबका निर्धारण न्यायालय द्वारा नहीं किया जा सकता है।
  • यह देखते हुए कि एनएफएसए में मुख्य रूप से चावल और गेहूँ का उल्लेख किया गया है जो कि केवल कुछ नागरिकों के लिये ही है, इस चिंता को बढ़ावा प्रदान करता है।

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"तीसरी पीढ़ी" का खाद्य सुरक्षा कानून

  • अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि जब एनएफएसए के अंतर्गत पहुँच, उपलब्धता और यहाँ तक कि सामंजस्यपूर्ण रूप से उपयोग के मुद्दों को गहनता से संबोधित किया गया है, तो भी इसके अंतर्गत खाद्य आपूर्ति की स्थिरता के मुद्दे पर काफी कुछ किये जाने की आवश्यकता है।
  • वस्तुतः हमें एक "तीसरी पीढ़ी" के खाद्य सुरक्षा कानून को बनाने की आवश्यकता पर बल देना चाहिये जिसके अंतर्गत प्राकृतिक आपदाओं तथा जलवायु अनुकूलन सहित बहुत-से अन्य मुद्दों को शामिल करते हुए खाद्य सुरक्षा की समस्या को हल किया जाना चाहिये।
  • इस तरह का ढाँचा सभी चार आयामों में देश की खाद्य सुरक्षा का सामना करने वाली चुनौतियों का समाधान करेगा और इस तरह की विशेषता वाले छोटे-छोटे प्रयास करने की बजाय एक समन्वित प्रयास के तहत इन समस्याओं का हल किया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत बहुत से अन्य मुद्दे जैसे-असमानता, खाद्य विविधता, स्वदेशी अधिकार और पर्यावरण न्याय भी सम्मिलित होते हैं। कृषि और खाद्य सुरक्षा में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिये हर महीने अनाज की विशेष मात्रा प्रदान करने की बजाय इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिये कि गाँव खुद अपनी अवश्यकताओं की पूर्ति करें, जिससे भोजन के अभाव को दूर करने में सहायता मिलेगी। पूर्वोत्तर भारत को खाद्य उत्पादन में सक्षम बनाने के लिये रणनीतिक योजनाएँ और उनके समुचित कार्यान्वयन की आवश्यकता है। यह काम समेकित अनुसंधान और कार्यक्रम विस्तार के ज़रिये ही संभव होगा।

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