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SEBI में नियामक क्षमता का निर्माण

  • 04 Sep 2018
  • 7 min read

संदर्भ

हाल ही में टी.के. विश्वनाथन कमेटी द्वारा जारी रिपोर्ट ने सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) को सफ़ेदपोश अपराध (white-collar crimes) रोकने के लिये व्यापक शक्तियाँ देकर कॉर्पोरेट शासन के बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। कई कारणों से, चाहे वह कॉर्पोरेट, राजनीतिक या सामाजिक हो, शासन ने अक्सर प्रभावी कानूनों के अधिनियमन पर कम ध्यान दिया है। हालाँकि, शासन न केवल कानूनी रूप से बल्कि कानून के वास्तविक पहलुओं से भी संबंधित है। इस प्रकार कानून जो लिखित रूप में है, मुख्य रूप से कार्यान्वयन के तरीके के माध्यम से अपनी शक्तियाँ प्राप्त करता है और इसके लिये संस्थागत क्षमता की आवश्यकता होती है। दरअसल, पूंजी बाज़ार के नियामक और प्रबंधक के रूप में इसकी भूमिका सफ़ेदपोश अपराधों के लिये विशेष महत्त्व रखती है। यह लेख SEBI के क्षमता निर्माण के लिये आवश्यक विभिन्न चरणों पर केंद्रित है।

SEBI के क्षमता निर्माण की आवश्यकता क्यों है?

  • पूंजी बाज़ारों में छोटे निवेशकों के कमज़ोर विश्वास को नुकसान पहुँचाकर, सफेदपोश अपराध भी पूंजी निर्माण की प्रक्रिया में बाधा डालते हैं।
  • साथ ही भारतीय पूंजी बाज़ारों में समय-समय पर होने वाले घोटाले भी शेयर बाज़ारों पर हानिकारक प्रभावों को स्पष्ट करते हैं।

SEBI

  • यह एक बाज़ार नियामक तथा भारत में प्रतिभूति और वित्त का नियामक बोर्ड है।
  • इसकी स्थापना  अधिनियम, 1992 के तहत 12 अप्रैल, 1992 में की गई थी।
  • इसका मुख्यालय मुंबई में है तथा नई दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और अहमदाबाद में इसके क्षेत्रीय कार्यालय हैं।

इसके प्रमुख कार्य –

  • प्रतिभूति बाज़ार का नियमन करना तथा उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक विषयों का प्रावधान करना।
  • प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले निवेशकों के हितों का संरक्षण करना।
  • प्रतिभूति बाज़ार के विकास का उन्नयन करना।
  • अतः इक्विटी पूंजी बाज़ारों के विनियमन के लिये सफेदपोश अपराधियों को अनुमान के आधार पर दंडित करने और ऐसे अपराधों की वास्तविक पहचान, निगरानी और प्रवर्तन की आवश्यकता होती है।
  • इस प्रकार, कई उच्चस्तरीय समितियों द्वारा की गई अनेक उत्कृष्ट सिफारिशों की प्रभावकारिता मुख्य रूप से  SEBI की प्रवर्तन क्षमताओं पर निर्भर करती है।
  • हाल के दिनों में, SEBI के कई प्रवर्तन आदेशों के बावज़ूद ये क्षमताएँ सुर्ख़ियों में रहीं, अतः इन अनियमितताओं का पता लगाने के लिये SEBI को स्वयं को सशक्त बनाने की आवश्यकता है।
  • गौरतलब है कि दुनिया भर में नियामक संगठन एक तरफ अपने उच्च गुणवत्ता वाले कर्मियों को प्रौद्योगिकी शक्ति संपन्न मानते हैं और दूसरी तरफ आउटसोर्सिंग के साथ-साथ अन्य क्षमताओं में भीड़ को बढ़ावा देते हैं।

SEBI की यूएस सिक्योरिटीज मार्केट वॉचडॉग, सिक्योरिटीज एक्सचेंज कमीशन (SEC) से तुलना 

SEBI1

  • वर्ष 2017 में अमेरिका में 3,616 सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनियाँ थीं, जबकि 5,818 कंपनियाँ बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध थीं। 2017 तक SEC के पास 4,554 कर्मचारी, जबकि इसके पास केवल 780 कर्मचारी ही थे।
  • यदि कर्मचारियों की गुणवत्ता के संदर्भ में देखें तो यह असमानता चौंकाने वाले आँकड़े प्रदर्शित करती  है।
  • SEC के 4,554 कर्मचारी 3,616 सूचीबद्ध कंपनियों की निगरानी करते हैं और इस प्रकार अमेरिका में प्रत्येक सूचीबद्ध कंपनीयों की औसत रूप से 1.26 कर्मचारियों द्वारा निगरानी की जाती है।
  • इसके विपरीत, भारत में 780  कर्मचारी 5,818 सूचीबद्ध कंपनियों की निगरानी करते हैं और इस प्रकार भारत में प्रत्येक SEBI कर्मचारी 7.45 सूचीबद्ध कंपनियों पर नज़र रखता है।
  • भले ही सूचीबद्ध फर्मों में कॉरपोरेट गवर्नेंस की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले अन्य सभी कारक भारत और अमेरिका में समान रहते हैं, लेकिन SEBI में 780 कर्मचारियों में से प्रत्येक को निगरानी कार्य करने में सक्षम होने के लिये और अति मेहनती होना होगा।

आगे की राह 

  • इस प्रकार कर्मचारियों की संख्या और गुणवत्ता की मात्रा में पर्याप्त भिन्नताएँ विद्यमान हैं अतः दुर्लभ मानव संसाधनों का लाभ उठाने के लिये विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का उपयोग करना और कम संवेदनशील निगरानी कार्यों के लिये आउटसोर्सिंग संसाधनों का रणनीतिक उपयोग किया जा सकता है।
  • विशेष रूप से निगरानी कार्य के पूरक के रूप में व्हिसलब्लोअर पर विचार करना भी महत्त्वपूर्ण साबित होगा।
  • भले ही अन्य देशों की एजेंसियों से सीखना कोई दूरदर्शी विचार न लगता हो किंतु अमेरिका के लगभग दो सौ वर्ष पुराने लोकतंत्र द्वारा बनाए गए क़ानून शासन के नियंत्रण और संतुलन बनाए रखने के लिये भारत हेतु एक अच्छा बेंचमार्क प्रदान करते हैं।
  • भारत में सफेदपोश अपराधों को कम करने के लिये सेबी को और शक्तियाँ उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।
  • हालाँकि, सेबी में अत्याधुनिक विनियामक क्षमता का निर्माण सर्वोपरि है।
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