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थ्येनआनमन स्क्वायर: चीनी असंतोष के 30 साल

  • 07 Jun 2019
  • 16 min read

यह Editorial 4 जून को The Hindu में प्रकाशित समाचार 1989 Tiananmen Crackdown: Indian Protests, tanks and official silence तथा अन्य स्रोतों से एकत्रित जानकारी पर आधारित है। इसमें आज से 30 साल पहले चीन में सुलगी लोकतंत्र की पहली चिंगारी तथा उसके बाद चीन सरकार द्वारा चलाए गए दमनचक्र पर चर्चा की गई है।

संदर्भ

वर्ष 1989 में बीजिंग के तियानमेन, तियानअनमेन या थ्येनआनमन चौक (Tiananmen Square) पर शांतिपूर्ण विरोध कर देश में लोकतंत्र की मांग करने वालों पर चीन सरकार ने जो दमनचक्र चलाया, उसकी 30वीं वर्षगाँठ 4 जून को मनाई गई। आधुनिक वैश्विक इतिहास में बहुचर्चित घटनाओं में से इसे एक माना जाता है, जब चीनी सैनिकों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की थी। इस दिन कम्युनिस्ट पार्टी के उदारवादी नेता हू याओबांग की मौत के विरोध में हज़ारों छात्र बीजिंग के थ्येनआनमन चौक पर प्रदर्शन कर रहे थे।

Tiananmen Square Protest

घटनाक्रम (Timeline)

  • 17 अप्रैल: हज़ारों छात्र तथा अन्य लोग कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन शीर्ष नेता तथा प्रमुख सुधारक और भ्रष्टाचार विरोधी नेता हू याओबांग की मृत्यु का शोक मनाने के लिये थ्येनआनमन चौक में इकट्ठा हुए।
  • 18-21 अप्रैल: प्रदर्शनकारियों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी एवं तानाशाही समाप्त करने तथा अधिक स्वायत्तता और स्वतंत्रता देने की मांग भी आंदोलनकारियों के एजेंडे में शामिल हो गई।
  • 27 अप्रैल: एक लाख से अधिक छात्रों ने पुलिस का घेरा तोड़कर थ्येनआनमन चौक की ओर कूच किया।
  • 15 मई: सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव चीन की राजकीय यात्रा पर आए। थ्येनआनमन चौक पर चल रहे विरोध प्रदर्शन की वज़ह से चीन सरकार उनका सार्वजनिक स्वागत कार्यक्रम रद्द करने के लिये मजबूर हुई।
  • 19 मई: कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव झाओ जियांग ने विरोध प्रदर्शन का बचाव करते हुए पुलिस बल का इस्तेमाल न करने के लिये कहा।
  • 20-24 मई : शीर्ष नेता देंग श्याओपिंग ने मार्शल लॉ लागू किया और सेना को कूच करने का आदेश दिया। छात्रों ने बैरिकेड्स लगाकर सैनिकों का आगे बढ़ना रोक दिया तो अधिकारियों ने सेना को वापस बुलाने का आदेश दिया।
  • 29-30 मई: थ्येनआनमन गेट पर लगे माओत्से तुंग के चित्र की ओर मुँह करके गॉडेस ऑफ डेमोक्रेसी प्रतिमा खड़ी की गई।
  • 2 जून: 10,000 सैनिक ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल और संग्रहालय के पीछे इमारतों में चुपचाप छिपे।
  • 3 जून: दो लाख से अधिक सैनिकों का बीजिंग में प्रवेश, मक्सीडी अपार्टमेंट के पास 36 प्रदर्शनकारी मारे गए।
  • 4 जून: प्रतिरोध को कुचलते हुए सेना की टुकड़ियों ने थ्येनआनमन चौक में प्रवेश किया; 'गॉडेस ऑफ डेमोक्रेसी' की प्रतिमा को टैंक से उड़ाया गया; छात्रों ने विरोध किया तो बख्तरबंद वाहनों में बैठे सैनिकों ने गोलियाँ चलाईं और प्रदर्शनकारियों को कुचल दिया; थ्येनआनमन चौक में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे प्रदर्शनकारियों के रिश्तेदारों पर सैनिकों ने गोलियाँ चलाईं।
  • 5 जून: एक अकेला आदमी चांगान एवेन्यू पर टैंकों के सामने खड़ा हुआ, जिसे बाद में 'टैंक मैन' नाम दिया गया। टाइम (TIME) पत्रिका ने बाद में उसे 20वीं शताब्दी के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में से एक माना।

अमेरिकी बयान का विरोध किया चीन ने

थ्येनआनमन चौक पर हुए नरसंहार की 30वीं वर्षगाँठ पर अमेरिका ने जो बयान दिया उस पर चीन ने कड़ी आपत्ति जताई है। अमेरिका ने इस मौके पर चीन को पीड़ितों की जानकारी सार्वजनिक करने और मानवाधिकारों की रक्षा करने की नसीहत देते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि चीन उस बर्बर घटना के पीड़ितों के नाम उजागर करे। इससे लोगों को अपने सवालों के जवाब मिल जाएंगे। यह कदम साबित करेगा कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी लोगों के मानवाधिकार व मौलिक स्वतंत्रता के प्रति वाकई प्रतिबद्ध है। इसके साथ ही अमेरिका ने उइगर मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचारों का ज़िक्र करते हुए कहा कि चीन उस समुदाय के लाखों लोगों को हिरासत में रखकर उनकी संस्कृति को मिटाने की कोशिश कर रहा है। इससे पता चलता है कि चीन में 30 साल पहले की तरह अब भी लोगों के मानवाधिकार सुरक्षित नहीं हैं।

अपनी कार्रवाई को चीन ने सही ठहराया

चीन ने वर्ष 1989 में राजधानी बीजिंग के थ्येनआनमन चौक पर लोकतंत्र समर्थकों के खिलाफ अपनी कार्रवाई को सही ठहराया। सिंगापुर में क्षेत्रीय सुरक्षा फोरम की बैठक में इस मुद्दे पर चीन के रक्षा मंत्री वेई फेंघ ने कहा, 'वह घटना राजनीतिक उथल-पुथल का परिणाम थी। चीन सरकार ने उस संकट को रोकने के लिये जो कदम उठाए, वह सही थे। पता नहीं क्यों आज भी लोग प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई के लिये चीन पर सवाल खड़े करते हैं। मुझे लगता है कि उस समय चीन की नीति सही थी। बीते 30 साल में यह साबित भी हुआ है और तब से चीन में कई बड़े बदलाव हुए हैं।‘

क्यों हुआ था थ्येनआनमन चौक पर विरोध?

दरअसल, अप्रैल 1989 में 10 लाख से अधिक प्रदर्शनकारी राजनीतिक आज़ादी की मांग को लेकर थ्येनआनमन चौक पर इकट्ठा हुए थे। चीन के वामपंथी शासन के इतिहास में इसे सबसे बड़ा राजनीतिक प्रदर्शन कहा जाता है जो डेढ़ महीने तक चला। यह प्रदर्शन कई शहरों और विश्वविद्यालयों तक फैल गया था। प्रदर्शनकारी तानाशाही समाप्त करने और स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र की मांग कर रहे थे। इसके अलावा बढ़ती महँगाई, कम वेतन आदि को लेकर भी लोगों में रोष व्याप्त था।

  • 30 साल पहले चीन में आर्थिक बदलाव के बाद राजनीतिक बदलाव की मांग को लेकर 1989 में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया था। यह प्रदर्शन 4 अप्रैल से 4 जून तक चला था।
  • चीन में लोकतंत्र समर्थक छात्रों के नेतृत्व में किये गए विरोध प्रदर्शनों का मुख्य केंद्र थ्येनआनमन चौक ही था।
  • छात्रों के नेतृत्व में हुए इस प्रदर्शन में चीन के लगभग 400 शहरों-कस्बों के लोग शामिल हुए थे, जो कम्युनिस्ट नेताओं से इस्तीफा चाहते थे।
  • साथ ही देश में लोकतंत्र की स्थापना, सामाजिक समानता, प्रेस और बोलने की आज़ादी दिलाना भी इस प्रदर्शन के उद्देश्यों में शामिल था।
  • इस दौरान अनगिनत प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी तथा 10 हज़ार को गिरफ्तार भी किया गया था। 

माओत्से तुंग की ‘सांस्कृतिक क्रांति’

निस्संदेह इसकी शुरुआत बतौर छात्र आंदोलन हुई थी जो बढ़ते-बढ़ते जन-आंदोलन बना और फिर जनतंत्र की प्राप्ति के लिये संघर्ष में तब्दील हो गया। इसके पीछे चीन के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक हालात थे। चीन की पंचवर्षीय योजनाओं और कार्यक्रमों का जो हश्र हुआ, वह दुनिया वालों से छिपा नहीं था। हर स्तर पर अराजकता का बोलबाला था और हर व्यापारिक और सामाजिक प्रतिष्ठान पर सरकार की पकड़ थी। ऐसे में चीन की साम्यवादी सरकार के मुखिया माओत्से तुंग ने ‘सांस्कृतिक क्रांति’ की शुरुआत कर दी, जिसके तहत देश में से ‘जनतांत्रिक’ विचारधारा के लोगों को अलग-थलग करके उन्हें निशाना बनाया जाने लगा था। बचे-खुचे व्यापारिक माहौल को खत्म करके समाज पर तमाम प्रतिबंध लगा दिये गए थे।

चीन में शुरू हुए आर्थिक सुधार

इस सबका नतीजा यह हुआ कि चीन की अर्थव्यवस्था बेहाल हो गई। माओ के बाद 1978 में सत्ता सँभालने वाले देंग शियाओपिंग ने अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिये कम्युनिस्ट विचारधारा में से आर्थिक सुधारों का सिरा पकड़ा। उनके सुधार कार्यक्रमों की वजह से चीन की अर्थव्यवस्था ने रफ्तार पकड़ ली और समाज में आर्थिक संपन्नता आने लगी।

जैसा कि हर प्रगतिशील समाज में देखने को मिलता है कि संपन्नता के साथ-साथ भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद भी बढ़ जाता है। खुली अर्थव्यवस्था के साथ मुद्रास्फीति, रोज़गार पर संकट, संसाधनों पर एकाधिकार जैसी समस्याएँ जन्म ले लेती हैं। चीन में भी यही सब हुआ और प्रेस और अभिव्यक्ति की पाबंदी ने समाज में आग में घी का काम किया। इसी दबाव का परिणाम था 1986-87 का छात्र आंदोलन। यह आंदोलन भौतिकशास्त्री और यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी के वाइस प्रेसीडेंट फांग लिजी के जनतंत्र समर्थक विचारों से प्रेरित था। इसका परिणाम यह हुआ कि लगभग अँधेरे में रहने वाले चीनी समाज ने इस खुलेपन की अवधारणा को अपने यहां लाने के प्रयास शुरू कर दिये। 1989 के आते-आते असंतोष तेज़ी से फैलने लगा और अप्रैल और मई तक चीन के समाज पर इसका प्रभाव स्पष्ट महसूस किया जाने लगा था। स्थिति को नियंत्रण से बाहर होता देख चीन में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया और बड़े स्तर पर छात्र नेताओं और उनके रहनुमाओं की धरपकड़ चालू हो गई। इससे माहौल और बिगड़ गया।

  • मई, 1989 में सोवियत रूस की कम्युनिस्ट सरकार के मुखिया मिखाइल गोर्बाचेव चीन की यात्रा पर गए। उस समय गोर्बाचेव रूस में ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका जैसे सुधार कार्यक्रम लागू कर रहे थे, जो समाज को आज़ादी देने और अर्थव्यवस्था को गति देने से संबंधित थे।
  • चीन को थ्येनआनमन चौक पर होने वाला उनका सार्वजनिक अभिनंदन कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा था।
  • ऐसे माहौल में बीजिंग के थ्येनआनमन चौक पर हुए बर्बर दमनचक्र ने दुनियाभर में चीन को विलेन बना दिया।
  • इस दमनचक्र के बाद चीन के संबंध बाकी दुनिया से काफी हद तक बिगड़ गए और कई देशों ने उस पर राजनैतिक और आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये।
  • कालांतर में चीन के बड़े बाज़ार और तेज़ आर्थिक प्रगति ने सारे समीकरण बदलकर रख दिये। इस दमनचक्र के बाद भी चीन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेज़ी से उभरा और आज वह एक वैश्विक ताकत बन गया है।

चीन की सामाजिक-आर्थिक क्रांति

1978 में जिस आर्थिक क्रांति की शुरुआत चीन में हुई थी, उसे आज 41 साल हो गए हैं। चीन में आर्थिक क्रांति लाने का श्रेय देंग श्याओपिंग को दिया जाता है, जिसे वर्तमान में शी जिनपिंग बखूबी आगे बढ़ा रहे हैं। इस आर्थिक सुधार कार्यक्रम के बाद ही चीन ने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपना नाम लिखवाया।

  • आज चीन के पास विश्व में सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार (3.210 खरब डॉलर) है।
  • 14.2 खरब डॉलर (अनुमानित) की GDP के साथ इस मामले में चीन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है।
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने में चीन दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है।
  • चीन में जब 1978 में आर्थिक सुधार शुरू हुए थे तो दुनिया की अर्थव्यवस्था में चीन का हिस्सा केवल 1.8 फीसदी था जो 2017 में 18.2 फीसदी हो गया।

थ्येनआनमन चौक पर जो बर्बर दमनचक्र चला था, उसे चीन में तो कतई नहीं, लेकिन शेष सारी दुनिया में याद किया जाता रहा है। चीन सरकार ने इस हत्याकांड को इतिहास से बाहर करने की वे तमाम कोशिशें की हैं, जो कम्युनिस्ट व्यवस्थाओं का तरीका रहा है। चीन में उस घटना का ज़िक्र तक करना अपराध है, इसलिए नई पीढ़ी को मालूम तक नहीं है कि ऐसी कोई घटना घटी भी थी।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश के है संभव उपाय आज भी उस उस देश में अपनाए जा रहे हैं, जहाँ की अर्थव्यवस्था इस उदारवादी भूमंडलीकृत विश्व व्यापार में सबसे तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से है। यह विरोधाभास आश्चर्यजनक है कि एक मुक्त पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का तालमेल इस प्रकार एक बंद साम्यवादी राजनैतिक तंत्र के साथ है।

पहले लोग यह मान रहे थे कि चीन ने जब से अर्थव्यवस्था में पूंजीवादी व्यवस्था को बड़े पैमाने पर अपनाया है तो राजनैतिक व्यवस्था में भी खुलापन आना बहुत दूर नहीं है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। चीन की आर्थिक सफलता का जो मॉडल है और वहाँ जो कम्युनिस्ट राजनीति है, कई बार उसके बीच टकराव की भी स्थिति बन जाती है, लेकिन इसे दरकिनार कर शी जिनपिंग अर्थव्यवस्था को खोलने और आर्थिक सुधार जारी रखने जैसे कदमों को ही आगे बढ़ा रहे हैं।

अभ्यास प्रश्न: लोकतंत्र के मामले में चीन भारत के सामने कहीं नहीं ठहरता, लेकिन आर्थिक विकास के मामले में चीन भारत से मीलों आगे है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारत के लिये चीनी आर्थिक विकास मॉडल अपनाने की संभावनाओं पर चर्चा कीजिये।

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