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सामाजिक न्याय

संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व

  • 28 Oct 2022
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

अंतर-संसदीय संघ, ECI, सामाजिक गतिशीलता, विधानसभा सदस्य, अनुच्छेद 243D, PRI

मेन्स के लिये:

संसद में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व का कारण।

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में न्यूज़ीलैंड में संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 50% का आँकड़ा पार कर गया है। 

  • अंतर-संसदीय संघ के अनुसार, न्यूज़ीलैंड दुनिया के ऐसे आधा दर्जन देशों में से एक है जो वर्ष 2022 तक संसद में कम-से-कम 50% महिला प्रतिनिधित्व का दावा कर सकता है।
  • वर्ष 1893 में न्यूज़ीलैंड महिलाओं को वोट देने की अनुमति देने वाला पहला देश बना।
  • अन्य देशों में क्यूबा, मेक्सिको, निकारागुआ, रवांडा और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।
  • विश्व स्तर पर लगभग 26% सांसद महिलाएँ हैं।

भारतीय परिदृश्य: 

  • अंतर-संसदीय संघ (Inter-Parliamentary Union- IPU), जिसका भारत भी एक सदस्य है, द्वारा संकलित आँकड़ों के अनुसार, विश्व भर में महिलाएँ लोकसभा के कुल सदस्यों के 14.44% का प्रतिनिधित्व करती हैं।  
  •  भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India- ECI) के नवीनतम आँकड़े के अनुसार:   
    • अक्तूबर 2021 तक महिलाएँ संसद के कुल सदस्यों के 10.5% का प्रतिनिधित्व कर रही थीं।  
    • भारत में सभी राज्य विधानसभाओं को एक साथ देखें तो महिला सदस्यों (विधायकों) की स्थिति और भी बदतर है, जहाँ राष्ट्रीय औसत मात्र 9% है।  
    • आज़ादी के पिछले 75 वर्षों में लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10 प्रतिशत तक भी नहीं बढ़ा है।
  • चुनावी प्रतिनिधित्व के मामले में भारत, अंतर-संसदीय संघ की संसद में महिला प्रतिनिधियों की संख्या के मामले में वैश्विक रैंकिंग में कई स्थान नीचे आ गया है जिसमें वर्ष 2014 के 117वे स्थान से गिरकर जनवरी 2020 तक 143वे स्थान पर आ गया।
  • भारत वर्तमान में पाकिस्तान (106), बांग्लादेश (98) और नेपाल (43) से पीछे एवं श्रीलंका (182) से आगे है। 

कम प्रतिनिधित्व का कारण:

  • लिंग संबंधी रूढ़ियाँ: 
    • पारंपरिक रूप से घरेलू गतिविधियों के प्रबंधन की भूमिका महिलाओं को सौंपी गई है।
    • महिलाओं को उनकी रूढ़ीवादी भूमिकाओं से बाहर निकलने और देश की निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में भाग लेने हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।  
  • प्रतिस्पर्द्धा: 
    • राजनीति किसी भी अन्य क्षेत्र की तरह प्रतिस्पर्द्धा का क्षेत्र है। अंततः महिला राजनेता भी प्रतिस्पर्द्धी ही मानी जाती हैं।  
    • कई राजनेताओं को भय है कि महिला आरक्षण लागू किये जाने पर उनकी सीटें बारी-बारी से महिला उम्मीदवारों के लिये आरक्षित की जा सकती हैं, जिससे स्वयं अपनी सीटों से चुनाव लड़ सकने का अवसर वे गँवा सकते हैं।  
  • राजनीतिक शिक्षा का अभाव: 
    • शिक्षा महिलाओं की सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करती है। शैक्षिक संस्थानों में प्रदान की जाने वाली औपचारिक शिक्षा नेतृत्व के अवसर पैदा करती है और नेतृत्व को आवश्यक कौशल प्रदान करती है।  
    • राजनीति की समझ की कमी के कारण वे अपने मूल अधिकारों और राजनीतिक अधिकारों से अवगत नहीं हैं।  
  • कार्य और परिवार: 
    • पारिवारिक देखभाल उत्तरदायित्वों के असमान वितरण का परिणाम यह होता है कि महिलाएँ घर और बच्चों की देखभाल में पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक समय देती हैं। 
    • एक महिला को न केवल गर्भावस्था और प्रसव के दौरान अपना समय देना पड़ता है, बल्कि यह तब तक जारी रहता है जब तक कि बच्चा देखभाल के लिये माता-पिता पर निर्भर न रह जाए।  
  • राजनीतिक नेटवर्क का अभाव: 
    • राजनीतिक निर्णय-निर्माण में पारदर्शिता की कमी और अलोकतांत्रिक आंतरिक प्रक्रियाएँ सभी नए प्रवेशकों के लिये चुनौती पेश करती हैं, लेकिन महिलाएँ इससे विशेष रूप से प्रभावित होती हैं, क्योंकि उनके पास राजनीतिक नेटवर्क की कमी होती है।    
  • संसाधनों की अल्पता:
    • भारत की आंतरिक राजनीतिक दल संरचना में उनके कम अनुपात के कारण, महिलाएँ अपने राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्रों के पोषण के लिये संसाधन और समर्थन इकट्ठा करने में विफल होती हैं।
    • महिलाओं को चुनाव लड़ने के लिये राजनीतिक दलों से पर्याप्त वित्तीय सहायता नहीं मिलती है।
  • सामाजिक शर्तें: 
    • उन्हें अपने ऊपर अधिरोपित हुक्मों को स्वीकार करना होगा और समाज का भार उठाना होगा।
    • सार्वजनिक दृष्टिकोण न केवल यह निर्धारित करता है कि आम चुनाव में कितनी महिला उम्मीदवार विजयी होती हैं, बल्कि यह भी प्रभावित करती है कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कितनी महिला उम्मीदवारों को कार्यालय के लिये उचित माना और नामांकित किया जाता है।
  • अमैत्रीपूर्ण वातावरण:
    • कुल मिलाकर राजनीतिक दलों का माहौल भी महिलाओं के अनुकूल नहीं है, उन्हें पार्टी में अपनी जगह बनाने के लिये कड़ा संघर्ष करना पड़ता है और कई स्तर पर अनेकों समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
    • राजनीति में हिंसा बढ़ती जा रही है। अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, असुरक्षा में उल्लेखनीय वृद्धि ने महिलाओं को राजनीतिक क्षेत्र से बाहर कर दिया है।

सरकार के प्रयास:

  • महिला आरक्षण विधेयक 2008:
    • यह भारत की संसद के निचले सदन, लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं में कुल सीटों में से महिलाओं के लिये 1/3 सीटों को आरक्षित करने हेतु भारत के संविधान में संशोधन करने का प्रस्ताव करता है।
  • पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिये आरक्षण:
    • संविधान का अनुच्छेद 243डी पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करता है, जिसमें प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा भरी जाने वाली सीटों की कुल संख्या और पंचायतों के अध्यक्षों के पदों की संख्या में से महिलाओं के लिये कम से कम एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य है।
  • महिला अधिकारिता पर संसदीय समिति:
    •  महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिये संसद की 11वीं लोकसभा के दौरान 1997 में पहली बार महिला अधिकारिता समिति का गठन किया गया था।
    • समिति के सदस्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे सभी पार्टी संबद्धताओं में महिलाओं के शसक्तीकरण के लिये मिलकर काम करें।

आगे की राह

  • भारत जैसे देश में मुख्यधारा की राजनीतिक गतिविधियों में समाज के सभी वर्गों की समान भागीदारी होना समय की मांग है, इसलिये इसे बढ़ावा देने के लिये आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिये।
  • सभी राजनीतिक दलों को आम सहमति पर पहुँचना होगा और महिला आरक्षण विधेयक को पारित करवाना सुनिश्चित करना होगा, जिसमें संसद तथा सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिये 33% सीटें आरक्षित करने का आह्वान किया गया है।
  • महिलाओं का एक पूल है जो तीन दशकों की अवधि में स्थानीय स्तर पर शासन के अनुभव के साथ सरपंच और स्थानीय निकायों के सदस्य रहे हैं।
  • वे राज्य विधानसभाओं और संसद में बड़ी भूमिका निभाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
  • मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के लिये राज्य विधानसभा और संसदीय चुनावों में महिलाओं हेतु न्यूनतम सहमत प्रतिशत सुनिश्चित करने के भारत के चुनाव आयोग (ECI) के प्रस्ताव को लागू करने की आवश्यकता है, ताकि उन्हें चुनाव आयोग से राजनीतिक दलों के रूप में मान्यता बनाए रखने की अनुमति मिल सके।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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