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फिलिस्तीन के लिये अमेरिका की वित्तीय सहायता

  • 12 Apr 2021
  • 11 min read

चर्चा में क्यों?

संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपनी पूर्ववर्ती नीति में महत्त्वपूर्ण बदलाव करते हुए, फिलिस्तीन के लिये 235 मिलियन डॉलर से संबंधित योजना की बहाली की घोषणा की है।

  • अमेरिकी प्रशासन ने इससे पूर्व भी फिलिस्तीन को कोरोना वायरस राहत सहायता के तौर पर 15 मिलियन डॉलर देने की घोषणा की थी।

प्रमुख बिंदु

वित्तीय सहायता 

  • अमेरिका द्वारा दी जा रही वित्तीय सहायता में 75 मिलियन डॉलर वेस्ट बैंक और गाजा की आर्थिक मदद के लिये, 10 मिलियन डॉलर ‘यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट’ (USAID) के ‘शांति निर्माण’ कार्यक्रमों के लिये और 150 मिलियन डॉलर संयुक्त राष्ट्र राहत और निर्माण एजेंसी (UNRWA) को मानवीय सहायता के लिये प्रदान किये जाएंगे।
    • UNRWA फंड के तहत पश्चिम एशिया में रहने वाले कम-से-कम 5,00,000 फिलिस्तीनी बच्चों के लिये शैक्षिक सहायता शामिल है।
    • पूर्ववर्ती ट्रंप प्रशासन ने वर्ष 2018 में संगठन को दी जाने वाली सभी प्रकार की फंडिंग को समाप्त कर दिया था।
  • संयुक्त राष्ट्र ने अमेरिका के इस कदम का स्वागत किया है और उम्मीद ज़ाहिर की है इससे संयुक्त राष्ट्र को भी अपनी गतिविधियों के लिये अधिक धन मिल सकेगा। ऐसे कई देश हैं, जिन्होंने अमेरिका द्वारा वित्तीय सहायता बंद किये जाने के बाद स्वयं भी UNRWA में योगदान को बंद कर दिया था या कम कर दिया था।
  • फिलिस्तीन के प्रधानमंत्री ने इस कदम का स्वागत किया और इसे एक ‘नए राजनीतिक मार्ग’ के रूप में परिभाषित किया है, जो अंतर्राष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों पर आधारित फिलिस्तीनी लोगों के अधिकारों और आकांक्षाओं को पूरा करता है।
    • हालाँकि इज़राइल ने वित्त सहायता की बहाली को लेकर आपत्ति ज़ाहिर की है।

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद

  • इज़रायल और फिलिस्तीनियों के बीच दशकों पुराना विवाद पवित्र भूमि पर दावों में निहित है, और इस विवाद में सीमा विवाद, येरुशलम, सुरक्षा और फिलिस्तीनी शरणार्थियों आदि से संबंधित विषय शामिल हैं।
    • इज़राइल और फिलिस्तीन के मध्य संघर्ष का इतिहास लगभग 100 वर्ष पुराना है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1917 में उस समय हुई जब तत्कालीन ब्रिटिश विदेश सचिव आर्थर जेम्स बल्फौर ने ‘बल्फौर घोषणा’ (Balfour Declaration) के तहत फिलिस्तीन में एक यहूदी ‘राष्ट्रीय घर’ (National Home) के निर्माण के लिये ब्रिटेन का आधिकारिक समर्थन किया।
    • येरुशलम यहूदियों, मुस्लिमों और ईसाइयों की समान आस्था का केंद्र है। यहाँ ईसाईयों के लिये पवित्र सेपुलकर चर्च, मुस्लिमों की पवित्र मस्जिद और यहूदियों की पवित्र दीवार स्थित है।
  • वर्ष 1967 में हुए ‘सिक्स डे वॉर’ को दोनों देशों के मध्य चल रहे विवाद में एक महत्त्वपूर्ण घटना माना जाता है। इसे तीसरे अरब-इज़राइल युद्ध के रूप में भी जाना जाता है।
    • इज़राइल ने युद्ध के दौरान वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गाजा पट्टी पर कब्ज़ा कर लिया था और उसके बाद से इज़राइल ने इन क्षेत्रों में कई घर और बस्तियाँ बनाई हैं तथा वर्तमान में इन क्षेत्रों में 1 मिलियन से भी अधिक लोग रहते हैं।

अमेरिका की हालिया नीति

  • अमेरिकी दूतावास को येरुशलम में स्थानांतरित करने संबंधी वर्ष 2017 के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्णय की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी आलोचना की गई थी।
  • मध्य पूर्व शांति योजना: इस योजना का अनावरण जनवरी 2020 में तत्कालीन अमेरिकी सरकार द्वारा किया गया था।
    • अमेरिका की शांति योजना के अनुसार, येरुशलम को विभाजित नहीं किया जाएगा और यह ‘इज़राइल की संप्रभु राजधानी’ होगी, साथ ही इज़राइल वेस्ट बैंक के लगभग 30 प्रतिशत हिस्से का अधिग्रहण करेगा।
    • फिलिस्तीन ने इस योजना को अस्वीकार कर दिया था और स्वयं को ओस्लो शांति समझौते के प्रमुख प्रावधानों से भी अलग कर लिया था, जो कि 1990 के दशक में इज़राइल और फिलिस्तीन के बीच हुए समझौतों की एक शृंखला है।
  • वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ‘टू स्टेट सॉल्यूशन’ के लिये संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रतिबद्धता की पुष्टि की है।

भारत का पक्ष

  • भारत ने वर्ष 1950 में इज़राइल को मान्यता दी थी, हालाँकि उस समय दोनों देशों में औपचारिक राजनीतिक संबंध स्थापित नहीं हुए थे, साथ ही भारत पहला गैर-अरब देश था, जिसने वर्ष 1974 में फिलिस्तीनी जनता के एकमात्र और कानूनी प्रतिनिधि के रूप में फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन को मान्यता प्रदान की थी।
    • भारत वर्ष 1988 में फिलिस्तीन को राज्य का दर्जा देने वाले प्रारंभिक देशों में से एक है।
  • वर्ष 2014 में, भारत ने गाजा में इज़राइल द्वारा किये जा रहे मानवाधिकार उल्लंघनों की जाँच के लिये UNHRC के प्रस्ताव का समर्थन किया था, हालाँकि जाँच में समर्थन करने के बावजूद, भारत ने वर्ष 2015 में UNHRC में इज़राइल के विरुद्ध मतदान से स्वयं को अलग कर लिया था।
  • अपनी ‘लिंक वेस्ट पॉलिसी’ के हिस्से के रूप में, भारत ने वर्ष 2018 में अपनी विदेश नीति के तहत इज़राइल और फिलिस्तीन को परस्पर स्वतंत्र रूप से परिभाषित करने के प्रति प्रतिबद्धता ज़ाहिर की थी।
  • जून 2019 में, भारत ने संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC) में इज़राइल द्वारा पेश किये गए एक प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था, जिसमें फिलिस्तीन के गैर-सरकारी संगठन को परामर्शात्मक दर्जा देने पर आपत्ति जताई गई थी।
  • अभी तक भारत ने आत्मनिर्भर फिलिस्तीन के लिये अपने ऐतिहासिक समर्थन बनाए रखने और इज़राइल के साथ सैन्य, आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को मज़बूत करने के माध्यम से संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया है।

नोट

  • वेस्ट बैंक: वेस्ट बैंक इज़राइल और जॉर्डन के मध्य अवस्थित है। इसका एक सबसे बड़ा शहर ‘रामल्लाह’ (Ramallah) है, जो कि फिलिस्तीन की वास्तविक प्रशासनिक राजधानी है। 
    • इज़राइल ने वर्ष 1967 के युद्ध में इस पर अपना नियंत्रण स्थापित किया।
  • गाजा पट्टी: यह इज़राइल और मिस्र के मध्य स्थित है। इज़राइल ने वर्ष 1967 में गाजा पट्टी का अधिग्रहण किया था, किंतु गाजा शहर के अधिकांश क्षेत्रों के नियंत्रण तथा इनके प्रतिदिन के प्रशासन पर नियंत्रण का निर्णय ओस्लो समझौते के दौरान किया गया था। 
    • वर्ष 2005 में इज़राइल ने इस क्षेत्र से यहूदी बस्तियों को हटा दिया यद्यपि वह अभी भी इस क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय पहुँच को नियंत्रित करता है।
  • गोलन हाइट्स: गोलन हाइट्स एक सामरिक पठार है जिसे इज़राइल ने वर्ष 1967 के युद्ध में सीरिया से छीन लिया था। 
    • अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर येरुशलम और गोलान हाइट्स को इज़राइल का एक हिस्सा माना है।
  • फतह: 1950 के दशक के अंत में यासिर अराफात द्वारा स्थापित, ‘फतह’ सबसे बड़ा फिलिस्तीनी राजनीतिक गुट है। 
    • हमास के विपरीत, फतह एक धर्मनिरपेक्ष आंदोलन है, और इसने आंशिक तौर पर इज़राइल को मान्यता दी है, और शांति प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लिया है।
  • हमास: अमेरिका की सरकार द्वारा हमास को एक आतंकवादी संगठन माना जाता है। वर्ष 2006 में, हमास ने फिलिस्तीनी प्राधिकरण के विधायी चुनाव जीते थे।
    • इसने वर्ष 2007 में गाजा से ‘फतह’ को हटा दिया था, साथ ही इसने फिलिस्तीनी आंदोलन को भौगोलिक रूप से विभाजित कर दिया है।

Israel

आगे की राह

  • इज़राइल-फिलिस्तीन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण: शांतिपूर्ण समाधान के लिये संपूर्ण वैश्विक समुदाय को एक साथ आने की आवश्यकता है, हालाँकि एक शांतिपूर्ण समाधान के प्रति इज़राइल सरकार और अन्य सभी हितधारकों की अनिच्छा ने इस मुद्दे को और अधिक जटिल बना दिया है।
    • इस प्रकार एक संतुलित दृष्टिकोण अरब देशों और इज़राइल के साथ बेहतर संबंध बनाए रखने में मदद करेगा।
  • अब्राहम समझौते: इज़राइल और संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, सूडान तथा मोरक्को के बीच हाल ही में हुए सामान्यीकरण समझौते, जिसे अब्राहम समझौते के रूप में जाना जाता है,को शांति स्थापित करने की दिशा में सही कदम माना जा सकता है।
    • सभी क्षेत्रीय शक्तियों को अब्राहम समझौते के अनुरूप दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने का प्रयास करना चाहिये।

स्रोत: द हिंदू

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