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एकल-उपयोग प्लास्टिक

  • 21 May 2021
  • 8 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में यह विवरण दिया गया था कि एकल-उपयोग प्लास्टिक (single-use plastic) को कौन निर्मित करता है और इससे आय अर्जित करता है तथा पिछली गणना के अनुसार प्रतिवर्ष 130 मिलियन टन उत्पादन किया जाता है।

  • इस रिपोर्ट का प्रकाशन ऑस्ट्रेलिया में स्थित एक गैर-लाभकारी संगठन मिंडेरू (Minderoo) ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और स्टॉकहोम पर्यावरण संस्थान के शैक्षणिक (Academics) विभागों के साथ किया था।

प्रमुख बिंदु 

प्रमुख उत्पादक:

  • विश्व में उत्पादित एकल-उपयोग प्लास्टिक का 50%  20 बड़ी कंपनियों द्वारा बनाया जाता है।
    • इसके उत्पादन में दो अमेरिकी कंपनियों के पश्चात् एक चीनी स्वामित्व वाली पेट्रोकेमिकल्स कंपनी और दूसरी बैंकॉक-स्थित कंपनी का स्थान है।

प्रमुख निवेशक:

  • उत्पादन को बैंकों सहित वित्तीय सेवा कंपनियों द्वारा वित्तपोषित किया जाता है।
  • इस उद्योग में सरकारें भी बड़ी हितधारक हैं। सबसे बड़े एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक निर्माताओं में से लगभग 40% आंशिक रूप से सरकारों (चीन और सऊदी अरब सहित) के स्वामित्व में किया जाता है।

वृद्धि :

  • एकल-उपयोग वाला प्लास्टिक एक कुशल व्यवसाय के रूप में प्रस्थापित है तथा  इसके जारी रहने का अनुमान है। अगले पाँच वर्षों में इसकी उत्पादन क्षमता में 30% वृद्धि होने का अनुमान है।

उपयोग:

  • इस मामले में अमीर और गरीब देशों के बीच सर्वाधिक असमानता है:
    • प्रत्येक वर्ष औसतन एक अमेरिकी द्वारा 50 किलोग्राम सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का उपयोग करके फेंक दिया जाता है, जबकि औसतन एक भारतीय एक अमेरिकी के बारहवें हिस्से से भी कम का उपयोग करता है।

चिंताएँ:

  • न्यून पुनर्चक्रण:
    • अमेरिका में प्लास्टिक के केवल लगभग 8% हिस्से  का पुनर्चक्रण किया जाता  है। पुनर्नवीनीकृत प्लास्टिक की तुलना में नए उत्पादित प्लास्टिक से वस्तुओं को निर्मित करना अधिक किफायती है।
  • सीमित प्रयास:
    • राज्य  सरकार और नगरपालिकाओं को प्लास्टिक किराना बैग, फोम कप और पीने के पाइप (straws) जैसी कुछ वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाने में सफलता मिली है लेकिन अब तक इसके उत्पादन को कम करने के प्रयास सीमित रहे हैं।
    • उपभोक्ताओं द्वारा प्लास्टिक के न्यूनतम उपयोग हेतु  किये गए प्रयास विफल रहे हैं।

वैश्विक पहल:

  • यूरोपीय संघ ने वर्ष 2025 तक उपभोक्ता ब्रांडों को प्लास्टिक की बोतलों में कम-से-कम 30% पुनर्नवीनीकरण सामग्री का उपयोग करने का निर्देश जारी किया।

भारतीय पहल:

  • वर्ष 2019 में केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 तक भारत को एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक से मुक्त करने हेतु देश भर में एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक के उपयोग को हतोत्साहित करने के लिये एक बहु-मंत्रालयी योजना तैयार की थी।
  • प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के अनुसार, उत्पादों से उत्पन्न कचरे को उनके उत्पादकों और ब्रांड मालिकों को इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।

एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक (Single-Use Plastics)

परिचय:

  • एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक या डिस्पोज़ेबल प्लास्टिक (Disposable Plastic) ऐसा प्लास्टिक है जिसे फेंकने या पुनर्नवीनीकरण से पहले केवल एक बार ही उपयोग किया जाता है।
    • एकल उपयोग वाले प्लास्टिक उत्पाद जैसे- प्लास्टिक की थैलियाँ, स्ट्रॉ, कॉफी बैग, सोडा और पानी की बोतलें तथा अधिकांशतः खाद्य पैकेजिंग के लिये प्रयुक्त होने वाला प्लास्टिक।
  • प्लास्टिक बहुत ही सस्ता और सुविधाजनक होने कारण इसने पैकेजिंग उद्योग से अन्य सभी सामग्रियों को परिवर्तित कर दिया है, लेकिन प्लास्टिक धीरे-धीरे विघटित होता है जिसमें सैकड़ों साल लग जाते हैं।
    • यह एक गंभीर समस्या है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, भारत में प्रत्येक वर्ष  उत्पादित 9.46 मिलियन टन प्लास्टिक कचरे में से 43% सिंगल यूज़ प्लास्टिक है।

उपयोग:

  • एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक उत्पाद संक्रमणकारी रोगों के प्रसार को भी रोकते हैं। 
    • सिरिंज, एप्लिकेटर, ड्रग टेस्ट, बैंडेज और वार्प जैसे उपकरणों को अक्सर डिस्पोज़ेबल बनाया जाता है।
  • इसके अलावा खाद्य-अपशिष्टों के खिलाफ लड़ाई में भी एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक उत्पादों को सूचीबद्ध किया गया है, जो भोजन और पानी को अधिक समय तक ताज़ा रखता है और संदूषण की क्षमता को कम करता है।

समस्याएँ:

  • पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक बायोडिग्रेडेबल नहीं होता है और आमतौर पर यह लैंडफिल में इस्तेमाल किया जाता है जहाँ यह भूमि एवं जल में प्रवेश कर धीरे-धीरे सागर में घुल जाता है।
  • विघटन की प्रक्रिया में यह ज़हरीले रसायनों (प्लास्टिक को आकार देने और सख्त करने के लिये इस्तेमाल होने वाले एडिटिव्स) को निष्काषित करता है जो हमारे भोजन और पानी की आपूर्ति में अपना स्थान बना लेता है।

Single-Use-Plastic

आगे की राह  

  • आर्थिक रूप से किफायती और पारिस्थितिक रूप से अनुकूलित विकल्पों की ज़रूरत है जो संसाधनों पर बोझ नहीं डालते हैं और समय के साथ उनकी कीमतें भी कम हो जाएंगी तथा मांग में वृद्धि होगी।
    • कपास, खादी बैग और बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक जैसे विकल्पों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। 
    • सतत् रूप से अनुकूलित विकल्पों को तलाशने के लिये अधिक अनुसंधान एवं विकास (R&D) के साथ-साथ वित्त की आवश्यकता है।
  • नागरिकों को अपने व्यवहार में परिवर्तन लाकर कचरे को फैलने से रोकने के साथ -साथ कचरा पृथक्करण और अपशिष्ट प्रबंधन में मदद करना होगा।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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