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सिलिकोसिस और खनन सुरक्षा

  • 11 Oct 2019
  • 5 min read

प्रीलिम्स के लिये:

सहरिया जनजाति, सिलिकोसिस रोग,

मुख्य परीक्षा के लिये:

खनन सुरक्षा से जुड़े मुद्दे, सिलिकोसिस रोग, इसकी रोकथाम से संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

मध्य प्रदेश की सहरिया जनजाति नामक के खननकर्त्ताओं ने तपेदिक (Tuberculosis) के बजाय सिलिकोसिस के इलाज के लिये सरकार से अपील की है।

प्रमुख बिंदु

  • हाल ही में राजस्थान में बलुआ पत्थर खनन उद्योगों में संलग्न मज़दूरों में सिलिकोसिस की बढ़ती घटनाओं के कारण वहाँ पर भारी विरोध देखने को मिला था, इसी के फलस्वरूप मध्य प्रदेश में भी इस रोग से संबंधी स्वास्थ्य देखभाल की मांग की जा रही है।
  • इस रोग में कार्य करने के दौरान सिलिका के कण व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाते है, इससे उम्र बढ़ने के साथ शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है जिससे यह रोग प्रभावी होने लगता है।

सिलिकोसिस क्या है?

  • सिलिकोसिस फेफड़े की एक बीमारी है जो सिलिका के छोटे-छोटे कणों के साँस के माध्यम से शरीर के भीतर प्रवेश से होती है। ध्यातव्य है कि सिलिका एक धातु है जो रेत, चट्टान और क्वार्टज जैसे खनिज अयस्कों का हिस्सा होती है।
  • स्थायी शारीरिक विकलांगता प्रदान करने की क्षमता के कारण सिलिकोसिस को लाइलाज बीमारी के रूप में देखा जाता है।
  • इससे सिलिका धूल के संपर्क में आने वाले व्यक्ति सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, जो प्राय: खनन क्षेत्र, काँच निर्माण, भवन निर्माण उद्योग आदि क्षेत्रों में कार्यरत होते हैं।
  • सिलिकोसिस में साँस लेने में परेशानी होना, खाँसी, बुखार आदि समस्याएँ उत्पन्न हो जाती है।
  • इसके निदान के संदर्भ में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह पता लगाना कठिन हो जाता है कि रोगी तपेदिक (Tuberculosis) से ग्रसित है या सिलिकोसिस से।

सिलिकोसिस की घटनाओं को कम करने और इनकी रोकथाम के लिये भारत सरकार द्वारा निम्नलिखित कदम उठाए गए हैं:

  • चूँकि भारत में 10 मिलियन से अधिक श्रमिकों के सिलिकोसिस से पीड़ित होने का खतरा है। अत: इसे फैक्ट्री अधिनियम और कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत व्यावसायिक रोग की मान्यता दी गई है जो कि नियोक्ता द्वारा पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा देने की अनिवार्यता प्रदान करती है।
  • सिलिकोसिस को खान अधिनियम (Mines Act), 1952 और फैक्ट्री अधिनियम, 1948 के तहत अधिसूचित बीमारी के रूप में शामिल किया गया है।
  • इसके अलावा फैक्ट्री अधिनियम, 1948 के तहत हवादार कामकाजी वातावरण, धूल से सुरक्षा, बुनियादी व्यावसायिक स्वास्थ्य देखभाल के प्रावधान को अनिवार्य किया गया है।

सहरिया जनजाति

  • भारत में सहरिया जनजाति मुख्यत: मध्य प्रदेश में पाई जाते हैं। हालाँकि ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान और असम के मैदानी क्षेत्रों में भी यह जनजाति पाई जाती हैं।
  • ये मुंडा भाषा बोलते हैं जो ऑस्ट्रो-एशियाई भाषा परिवार से संबंधित है।
  • सहरिया जनजाति को उनके पेशे के आधार पर चार उपजातियों में विभाजित किया गया है:
  1. आरसी- ये बुनकर का काम करते हैं।
  2. मुली- ये लौहकार के रूप में प्रचलित हैं।
  3. किंडल- ये टोकरी निर्माण का काम करते हैं।
  4. कुम्बी- ये कुम्हार के रूप में प्रचलित हैं।
  • परंपरागत रूप से ये रामायण की शबरी से अपनी शुरुआत मानते है।
  • इन्हें भील समुदाय के छोटे भाइयों के रूप में भी जाना जाता है (भील मुख्य रूप से पश्चिम भारत में लोगों का एक जातीय समूह है)।

स्रोत: द हिंदू

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