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SARS-CoV-2 का नया रूप

  • 01 Feb 2021
  • 9 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में कई देशों में SARS-CoV-2 का एक नया प्रतिरूप उभरकर सामने आया है। नवीनतम शोध से संकेत मिला है कि वायरस अपनी अवस्था में तेज़ी से उत्परिवर्तन (Mutatition) कर रहा है, जो COVID-19 के लिये वर्तमान में उपलब्ध टीकों को निष्प्रभावी कर सकता है।

  • SARS-CoV-2 वह वायरस है जो COVID-19 नामक बीमारी के लिये उत्तरदायी है।

प्रमुख बिंदु

उत्परिवर्तन का अर्थ:

  • उत्परिवर्तन एक जीव या किसी वायरस की कोशिका के जीनोम में एक परिवर्तन है जो कम या ज़्यादा स्थायी होता है और जिसे कोशिका या वायरस के वंशजों में संचारित किया जा सकता है।
  • जीवों के जीनोम की सभी सरंचनाएँ डीऑक्सी राइबोन्यूक्लिक एसिड (Deoxyribonucleic Acid- DNA) से बनी होती हैं, जबकि वायरल जीनोम की सरंचनाएँ DNA या राइबो न्यूक्लिक एसिड (Ribo Nucleic Acid- RNA) की बनी हो सकती हैं।

RNA उत्परिवर्तन बनाम DNA उत्परिवर्तन:

  • जब कोशिकाएँ वृद्धि करती हैं तो उनके भीतर का DNA कोशिकाओं की नई प्रतियाँ बनाने के लिये प्रतिकृति भी बनाता है। प्रतिकृति निर्माण के दौरान यादृच्छिक त्रुटियों को नए DNA में प्रवेश किया जाता है।
  • RNA वायरस में उत्परिवर्तन प्रायः तब होता है जब स्वयं की प्रतिकृति बनाते समय वायरस से कोई चूक हो जाती है।
    • यदि उत्परिवर्तन/म्यूटेशन के परिणामस्वरूप प्रोटीन संरचना में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होता है तो ही किसी बीमारी के प्रकार में बदलाव हो सकता है।

उत्परिवर्तन का महत्त्व:

  • विकास:
    • अधिकांश उत्परिवर्तन वायरस के लिये हानिकारक होते हैं। परंतु अगर कोई वायरस इस स्थिति में लाभ प्राप्त करता है,  तो वह बेहतर संक्रामकता और संचरण की स्थिति में आ जाता है तथा प्रतिरक्षा विकसित कर चुकी आबादी भी इससे प्रभावित हो सकती है। 
    • उदाहरणार्थ: D614G नामक एक उत्परिवर्तन के कारण जनवरी 2020 में कोरोनोवायरस स्पाइक प्रोटीन के अमीनो अम्ल की स्थिति में परिवर्तन हुआ।
    • इस नए उत्परिवर्तित कोरोनावायरस की वजह से और अधिक संक्रामक वायरस सामने आया। वर्तमान में यह उत्परिवर्तित वायरस ही दुनिया भर में फैलने वाले कोरोनावायरस के 99% से अधिक मामलों के लिये ज़िम्मेदार है।
      • यह कोरोनोवायरस स्पाइक प्रोटीन है जो संक्रमण की प्रक्रिया को शुरू करने के लिये मानव प्रोटीन का प्रयोग करता है।
      • इसमें होने वाले परिवर्तन संभवतः वायरस की संक्रामक क्षमता, गंभीर बीमारी का कारण बनने की क्षमता या टीकों द्वारा विकसित की गई प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया संबंधी क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। 

कोरोनावायरस के RNA जीनोम की विशिष्ट विशेषताएँ:

  • कोरोनावायरस में दो विशिष्ट विशेषताओं के साथ एक RNA जीनोम होता है:
    • सबसे बड़ा जीनोम:
      RNA वायरस के 30,000 न्यूक्लियोटाइड्स (न्यूक्लिक एसिड यूनिट) में सबसे बड़ा जीनोम होता है।
    • स्थिरता:
      कोरोनावायरस में स्थिर जीनोम होते हैं, ये इन्फ्लूएंज़ा वायरस की तुलना में लगभग एक हज़ार गुना धीमी गति से बदलते हैं, जो कि श्वसन रोग के लिये ज़िम्मेदार RNA वायरस भी हैं।

कोरोनोवायरस प्रतिरूप में हालिया RBD उत्परिवर्तन:

  • कोरोनोवायरस के तीन प्रमुख ‘रिसेप्टर-बाइंडिंग डोमेन’ (RBD) उत्परिवर्तन रूप K417N /T, E484K और N501Y दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़ील में पाए गए हैं। 
    • ब्रिटेन के प्रतिरूप में N501Y, P681H उत्परिवर्तन पाया गया है।
  • स्पाइक प्रोटीन के ‘रिसेप्टर-बाइंडिंग डोमेन’ उत्परिवर्तन से बने वायरस में प्राकृतिक संक्रमण या टीकाकरण के परिणामस्वरूप विकसित होने वाले एंटीबॉडी से बचने की सर्वाधिक क्षमता है।
  • ‘रिसेप्टर-बाइंडिंग डोमेन’ उत्परिवर्तन के माध्यम से ‘सेलुलर रिसेप्टर’ वायरस को कोशिकाओं को संक्रमित करने की अनुमति देता है और ‘एंटी-आरबीडी एंटीबॉडी वायरस’ को अप्रभावी करता है।

उभरते हुए प्रतिरूपों के खिलाफ वैक्सीन परीक्षण:

  • प्रयोगशालाओं में अप्रत्यक्ष परीक्षण के माध्यम से यह आकलन किया जाता है कि क्या एक उभरता हुआ प्रतिरूप प्राकृतिक संक्रमण या टीकाकरण के बाद विकसित एंटीबॉडी से बच सकता है।
    • COVID-19 बीमारी से ठीक हुए रोगियों या टीकाकृत लोगों से सीरम (रक्त घटक जिसमें एंटीबॉडी होते हैं) प्राप्त कर मूल वायरस को अप्रभावी करने के लिये ज्ञात की गई एंटीबॉडी का परीक्षण करके यह निर्धारित करने का प्रयास किया जाता है कि क्या ये वायरस प्रतिरूप विकसित एंटीबॉडीज़ से बच जाते हैं।
    • एक सीरम या एंटीबॉडी की प्रभावशीलता ‘निरोधात्मक एकाग्रता’ (आईसी) या ‘प्लेक रिडक्शन न्यूट्रलाइज़ेशन टाइटर’ (PRNT) मूल्य के रूप में व्यक्त की जाती है।
    • IC50 या PRNT50 सीरम या एंटीबॉडी की आपसी सांद्रता का मान है जो नमूने में 50% वायरस को अप्रभावी करता है।

उभरते हुए प्रतिरूप के खिलाफ टीके की प्रभावकारिता:

  • मॉडर्ना और फाइज़र/बायोटेक दोनों इस बात से सहमत हैं कि उनके टीकों ने दक्षिण अफ्रीकी प्रतिरूप के खिलाफ कम सुरक्षा प्रदान की है। कहा जा रहा है इन प्रतिरूपों को कवर करने के लिये दोनों कंपनियाँ नए टीके को विकसित करने पर काम कर रही हैं।
  • दक्षिण अफ्रीका में मूल वायरस के खिलाफ विकसित प्रतिरक्षा के बाद भी नए प्रतिरूपों से संक्रमित होने के मामले सामने आए हैं।

भारत के संदर्भ में:

  • भारत में अब तक केवल यात्रियों में कोरोनावायरस के ब्रिटेन प्रतिरूप के मामले सामने आए हैं। इसके स्थानीय प्रसारण संबंधी मामले सामने नहीं आए हैं।
  • साक्ष्य बताते हैं कि वर्तमान टीके अब भी कोरोनावायरस के ब्रिटेन प्रतिरूप के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करेंगे, भले ही उनकी प्रभावकारिता कम हो।
    • आईसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी और भारत बायोटेक के वैज्ञानिकों ने कोरोनावायरस के ब्रिटेन प्रतिरूप के खिलाफ अपने टीके कोवैक्सिन का परीक्षण किया।
    • इन परिणामों में यह बात सामने आई है कि वैक्सीन ब्रिटेन प्रतिरूप पर समान रूप से काम करेगी।
  • कम हो रहे COVID-19 मामलों के साथ-साथ भारत को मास्क पहनने संबंधी नियमों को सख्ती से लागू करना चाहिये और भीड़-भाड़ को कम करके सक्रियता से ब्रिटेन प्रतिरूप से संक्रमित लोगों की पहचान करनी चाहिये।
  • भारत को अक्तूबर 2020 से दक्षिण अफ्रीका और दिसंबर 2020 से ब्राज़ील की यात्रा करने वाले लोगों की भी पहचान कर लेनी चाहिये।
  • जीनोमिक निगरानी बढ़ाने के लिये एक अंतर-मंत्रालयी समूह ‘इंडियन SARS-CoV-2 जीनोमिक्स कंसोर्टियम’ (INSACOG) की स्थापना इस दिशा में एक अच्छा कदम है।
    • जीनोमिक निगरानी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर रोगजनक संचरण और विकास पर नज़र रखने के लिये जानकारी का एक समृद्ध स्रोत उत्पन्न कर सकती है।

स्रोत-द हिंदू

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