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भारतीय राजनीति

मुस्लिम महिलाओं को भरण-पोषण का अधिकार

  • 21 Feb 2024
  • 14 min read

प्रिलिम्स के लिये:

तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण का अधिकार, सर्वोच्च न्यायालय, आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC), मुस्लिम स्त्री (विवाह विच्छेद पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986

मेन्स के लिये:

तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं का भरण-पोषण का अधिकार, सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके डिज़ाइन और कार्यान्वयन से उत्पन्न होने वाले मुद्दे।

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने यह जाँचने का फैसला किया है कि  क्या एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला अपने पूर्व पति के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा करने की हकदार है, जिससे यह बहस फिर से शुरू हो गई है कि क्या धर्मनिरपेक्ष कानूनों को अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों पर प्राथमिकता दी जानी चाहिये।

  • यह विवाद तब उत्पन्न हुआ जब एक मुस्लिम व्यक्ति ने अपनी पूर्व पत्नी को अंतरिम गुज़ारा भत्ता देने के तेलंगाना उच्च न्यायालय के निर्देश को चुनौती दी।
  • तर्क दिया गया है कि इस मामले में भरण-पोषण CrPC की धारा 125 पर प्रचलित मुस्लिम स्त्री (विवाह विच्छेद पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 (1986 अधिनियम) के प्रावधानों द्वारा शासित होगा।

मुस्लिम स्त्री अधिनियम, 1986 कैसे विकसित हुआ है?

  • 1986 से पहले: CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण:
    • मुस्लिम स्त्री (विवाह विच्छेद पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अधिनियमन से पहले, मुस्लिम महिलाएँ अन्य समुदायों की महिलाओं की तरह आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग कर सकती थीं।
    • मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम, 1985 के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से इसकी पुष्टि हुई।
  • 1986 अधिनियम:
    • शाह बानो मामले के जवाब में, भारतीय संसद ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम बनाया, जिससे तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भरण-पोषण का दावा करने के लिये एक विशिष्ट तंत्र प्रदान किया गया।
    • इसने भरण-पोषण की अवधि को इद्दत अवधि तक सीमित कर दिया और राशि को महिला को दिये जाने वाले मेहर या दहेज़ से जोड़ दिया।
      • इद्दत एक अवधि है, आमतौर पर तीन महीने की, जिसे एक महिला को अपने पति की मृत्यु या तलाक के बाद पुनर्विवाह करने से पहले पालन करना होता है।
  • डेनियल लतीफी बनाम भारत संघ मामला, 2001: 
    • सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 1986 के अधिनियम की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा लेकिन मुस्लिम महिला के पुनर्विवाह तक भरण-पोषण पाने का अधिकार बढ़ा दिया। हालाँकि इसने भरण-पोषण की अवधि को घटाकर इद्दत पूरा करने तक कर दिया।
  • वर्ष 2009:
    • वर्ष 2009 में सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएँ CrPC की धारा 125 के तहत इद्दत अवधि के बाद भी गुज़ारा भत्ता का दावा कर सकती हैं, जब तक कि वे पुनर्विवाह नहीं करती हैं।
    • इसने इस सिद्धांत की पुष्टि की कि CrPC प्रावधान किसी भी धर्म पर लागू होता है।
  • वर्ष 2019: 
    • पटना उच्च न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के पास CrPC की धारा 125 और वर्ष 1986 अधिनियम दोनों के तहत गुज़ारा भत्ता मांगने का विकल्प है।
    • यह दोनों कानूनों की समवर्ती प्रयोज्यता को रेखांकित करता है और यह सुनिश्चित करता है कि मुस्लिम महिलाएँ किसी भी प्रावधान के तहत अपने अधिकारों से वंचित न हों।
  • वर्तमान मामला:
    • वर्तमान मामले में अपीलकर्त्ता की अपील शामिल है, जिसकी पूर्व पत्नी ने हैदराबाद में एक पारिवारिक न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसने उसे तलाक दिया था और साथ ही CrPC की धारा 125 के तहत मासिक रखरखाव का दावा किया था।
    • पति ने तर्क दिया कि मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 के प्रावधान, एक विशेष कानून होने के कारण CrPC की धारा 125 पर प्रभावी होंगे।
      • उन्होंने तर्क दिया कि पारिवारिक न्यायालय के समक्ष राहत की मांग नहीं की जा सकती क्योंकि वर्ष 1986 का अधिनियम प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट को महर तथा अन्य निर्वाह के मुद्दे पर निर्णय लेने का अधिकार क्षेत्र प्रदान करता है।
      • उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि पत्नी ने वर्ष 1986 अधिनियम की तुलना में  CrPC प्रावधानों के लिये अपनी प्राथमिकता बताते हुए मजिस्ट्रेट के समक्ष कोई हलफनामा दायर नहीं किया, जैसा कि बाद की धारा 5 के अनुसार आवश्यक था।

मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019:

  • एक मुस्लिम महिला जिसे उसके पति ने तलाक कहकर तलाक दे दिया है, वह मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019 के तहत भरण-पोषण भत्ता मांग सकती है।
    • यह अधिनियम एक मुस्लिम पति द्वारा अपनी पत्नी को मौखिक, लिखित अथवा इलेक्ट्रॉनिक रूप में या किसी भी अन्य तरीके से तलाक की किसी भी घोषणा को शून्य एवं अवैध घोषित करता है।
    • यह अधिनियम एक विशेष कानून है जो आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के प्रावधानों को समाप्त करता है, जो पत्नियों, बच्चों तथा माता-पिता के भरण-पोषण से संबंधित है।
      • हालाँकि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला, अधिनियम द्वारा शासित नहीं होने और किसी अन्य कानून या रिवाज़ के तहत उपलब्ध अन्य उपायों का विकल्प चुन सकती है।

मामले के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ क्या हैं?

  • वर्ष 1986 अधिनियम की धारा 3 की व्याख्या:
    •   न्यायालय के अनुसार वर्ष 1986 के अधिनियम की धारा 3 में एक गैर-अस्पष्ट खंड है (तत्समय लागू किसी भी अन्य कानून में कुछ भी शामिल होने के बावजूद) यह दर्शाता है कि यह CrPC की धारा 125 जैसे अन्य कानूनों के तहत वैकल्पिक उपचारों पर रोक नहीं लगाता है।
  • एमिकस क्यूरे/न्याय मित्र प्रस्तुतीकरण:
    • एमिकस क्यूरे/न्याय मित्र ने न्यायालय की टिप्पणी से सहमति व्यक्त की और इस बात पर एक आधिकारिक घोषणा की आवश्यकता पर ज़ोर दिया कि क्या वर्ष 1986 का अधिनियम CrPC की धारा 125 के तहत अधिकार को समाप्त कर देता है।
      • एमिकस क्यूरे/न्याय मित्र वह व्यक्ति या संस्था है जो मामले में पक्षकार नहीं है लेकिन न्यायालय को निर्णय लेने में सहायता करने के लिये विशेषज्ञता या जानकारी प्रदान करता है।
  • संवैधानिक सिद्धांत:
    • न्यायाधीशों ने इस बात पर प्रकाश डाला कि वर्ष 1986 के अधिनियम की व्याख्या यह सुनिश्चित करने के लिये की जानी चाहिये कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएँ देश में अन्य तलाकशुदा महिलाओं के लिये उपलब्ध सभी भरण-पोषण के अधिकारों की हकदार हैं।
    • उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं के साथ कम अनुकूल/प्रतिकूल व्यवहार करना अनुच्छेद 14, 15 और 21 सहित संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।
  •  विधायी आशय:
    • याचिकाकर्त्ता के इस तर्क को खारिज़ करते हुए कि वर्ष 1986 के अधिनियम का उद्देश्य मुस्लिम महिलाओं को CrPC की धारा 125 के तहत राहत की मांग करने से रोकना था, न्यायालय ने कहा कि यदि ऐसा विधायी आशय था, तो अधिनियम में इसका स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया होगा।
    • ऐसी स्पष्ट भाषा की अनुपस्थिति का अर्थ है कि मुस्लिम महिलाओं पर धारा 125 के तहत राहत की मांग करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

संबंधित पूर्व न्यायिक उदाहरण क्या हैं?

  • अर्शिया रिज़वी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामला, 2022, रज़िया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामला, 2022 और शकीला खातून बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामला, 2023 जैसे फैसलों में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला के दावे के अधिकार की पुष्टि की है कि इद्दत अवधि पूरी होने के बाद भी CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण/निर्वहन का प्रावधान है, जब तक कि वह विवाह/निकाह नहीं कर लेती
  • मुजीब रहमान बनाम तस्लीना मामले, 2022 में केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने निर्णय किया कि 1986 अधिनियम की धारा 3 के तहत अनुतोष प्राप्त न होने तक एक विच्छिन्न विवाह/तलाकशुदा मुस्लिम महिला CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग कर सकती है।
    • यह आदेश तब तक क्रियान्वित रहता है जब तक कि धारा 3 के तहत संबद्ध व्यक्ति द्वारा देय राशि का भुगतान नहीं कर दिया जाता।
  • नौशाद फ्लोरिश बनाम अखिला नौशाद, केस 2023 में केरल उच्च न्यायालय ने निर्णय किया कि एक मुस्लिम पत्नी जिसने खुला (पत्नी के कहने पर और उसकी सहमति से तलाक) की घोषणा करके तलाक लिया था, वह CrPC की धारा 125 के तहत अपने पति से भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती है।
    • CrPC की धारा 125(4) के अनुसार, एक पत्नी की अपने पति के साथ रहने की अनिच्छा अनिवार्य रूप से उससे मुक्त होने के लिये खुला के माध्यम से तलाक के लिये दाखिल करने के समान है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न: भारत के संविधान का कौन-सा अनुच्छेद अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने के किसी व्यक्ति के अधिकार को संरक्षण देता है? (2019) 

(a) अनुच्छेद 19
(b) अनुच्छेद 21
(c) अनुच्छेद 25
(d) अनुच्छेद 29

उत्तर: (b) 

व्याख्या: 

  • विवाह का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक घटक है, जिसमें कहा गया है कि "कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा"।
  • लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में वर्ष 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विवाह के अधिकार को जीवन के अधिकार के एक घटक के रूप में देखा।

अतः विकल्प (b) सही उत्तर है।


मेन्स:

प्रश्न: रीति-रिवाज़ों एवं परंपराओं द्वारा तर्क को दबाने से प्रगतिविरोध उत्पन्न हुआ है। क्या आप इससे सहमत हैं? (2020)

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